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नई दिल्ली, जेएनएन। प्रशासकों की समिति (सीओए) ने सुप्रीम कोर्ट से लोढ़ा समिति के सुधारों का पालन नहीं करने के लिए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) के कार्यवाहक अध्यक्ष सीके खन्ना, कार्यवाहक सचिव अमिताभ चौधरी और कोषाध्यक्ष अनिरुद्ध चौधरी को हटाने के लिए निर्देश मांगा है।

विनोद राय और डायना इडुलजी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर पांचवीं स्टेटस रिपोर्ट में बोर्ड का चुनाव नहीं होने तक न्यायालय से 'बोर्ड का शासन, प्रबंध और प्रशासन' उनके हाथ में सौंपने की मांग की है। इसके साथ ही मुख्य कार्यकारी अधिकारी राहुल जौहरी के नेतृत्व में काम करने वाले पेशेवर समूह को भी उन्होंने अपने अधिकार में लेने की मांग की है।

सीओए की 26 पृष्ठों की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि खन्ना, अमिताभ और अनिरुद्ध को उसी तरह से हटाया जाए जैसे बीसीसीआइ के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और सचिव अजय शिर्के को हटाया गया था। उन्हें लोढ़ा सुधारों को लागू करने में नाकाम रहने पर बाहर कर दिया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, 'यह सही होगा कि मौजूदा पदाधिकारियों के साथ उसी तरह का व्यवहार किया जाए जैसे कि पहले के अधिकारियों से किया गया था, क्योंकि इन अधिकारियों ने जो शपथ पत्र दिया था उसके बाद अतिरिक्त छह माह बीत जाने के बाद भी न्यायालय के निर्देशों के अनुसार सुधारों को लागू नहीं किया गया। इससे यह साफ है कि मौजूदा पदाधिकारी इस स्थिति में नहीं है कि वे न्यायालय के निर्देशों को लागू करवा पाएं।'

सीओए ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि न्यायालय के 24 जुलाई के निर्देशों का 'गलत तरीके से उल्लेख कर' 26 जुलाई को हुई विशेष आम बैठक (एसजीएम) से जौहरी और दूसरे प्रशासनिक अधिकारियों तथा कानूनी टीम को बैठक से बाहर जाने को कह दिया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) के प्रशासक न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) विक्रमजीत सेन ने भी एसजीएम में कहा था कि बीसीसीआइ लोढ़ा समिति की रिपोर्ट के विपरीत काम कर रहा है। 

लोकपाल नियुक्त करने में असफल

रिपोर्ट में सितंबर, 2016 में न्यायमूर्ति एपी शाह का कार्यकाल समाप्त होने के बाद लोकपाल नियुक्त करने में बीसीसीआइ की असफलता का भी जिक्र किया गया है। सीओए ने कहा कि बीसीसीआइ को छह सेवानिवृत जजों के नाम देने के बावजूद पदाधिकारियों ने इस पर फैसला नहीं किया। इसके अलावा हितों के टकराव के नए नियमों को स्वीकार करने में नाकाम रहने का भी रिपोर्ट में जिक्र किया गया है।

हमारे पास सीमित अधिकार

हालांकि बोर्ड के पदाधिकारियों का कहना है कि सीओए ने तो हमारे अधिकार ही सीमित कर रखे हैं। जब अनुराग और शिर्के अधिकारी थे तो उनके पास अधिकार थे, हम तो सीओए के नेतृत्व में काम कर रहे हैं। जब सीओए और जौहरी के बिना एक बिल फाइनल नहीं हो सकता तो लोढ़ा समिति की सिफारिश लागू कराने में वे कैसे चूक रहे हैं। ये तो सीओए की असफलता है। एक जनसंपर्क (पीआर) एजेंसी को साल भर का ठेका देने का फैसला सीओए बैठक के एक दिन पहले कर लिया जाता है तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने में तेजी क्यों नहीं दिखाई जाती।

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Posted By: Bharat Singh

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