नई दिल्ली, अभिषेक त्रिपाठी।  बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव आदित्य वर्मा ने एक बार फिर प्रशासकों की समिति (सीओए) के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाया है। वर्मा के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित लोढ़ा समिति की सिफारिशों को बीसीसीआइ में लागू होने की राह में सीओए का हितों का टकराव रोड़ा बन रहा है।

एक बोर्ड, दोहरी नीति 

वर्मा ने कहा कि बीसीसीआइ के कामकाजों की देखरेख और उसमें पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सीओए की नियुक्ति हुई थी। कई मुद्दे रहे हैं जिन पर सीओए ने कई कर्मचारियों के लिए अलग-अलग नियम लागू किए जिसकी उम्मीद समिति का गठन करते समय सुप्रीम कोर्ट को नहीं थी। 

बीसीसीआइ (60 वर्ष) के कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु पर सीओए द्वारा इसकी नीति को ताक पर रखकर समझौता किया गया। बोर्ड के एक महाप्रबंधक को 60 साल का होने की वजह से हटा दिया गया था, लेकिन 60 साल की आयु के पार होने के बावजूद प्रोफेसर रत्नाकर शेट्टी के कार्यकाल का विस्तार किया गया और उनके अनुभव को बीसीसीआइ के लिए अहम बताया गया। सवाल उठता है कि क्या नियमों को पसंद के कर्मचारियों को बचाए जाने के लिए ही बदला जाता है।

क्यों नहीं बढ़ा नीरज कुमार का करार 

वर्मा ने भ्रष्टारोधी इकाई (एसीयू) के पूर्व प्रमुख नीरज कुमार का उदाहरण देकर बीसीसीआइ के कामकाज पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एसीयू प्रमुख पद के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवारों की आयुसीमा 65 वर्ष तक बढ़ा दी गई थी जबकि बीसीसीआइ की नीति के मुताबिक यह 60 वर्ष थी। 

अगर सेवानिवृत्ति की उम्र 65 साल तक बढ़ी थी तो नीरज कुमार को 65 साल की उम्र तक उनके कार्यकाल के लिए एक विस्तार दिया जा सकता था। हालांकि, इसके बावजूद बीसीसीआइ के एसीयू प्रमुख पद के लिए सीओए ने आवेदन मंगाए थे। सीओए के दोहरे मानकों को कैसे न्यायसंगत बनाया जा सकता है।

एक तरफ उन्होंने प्रोफेसर शेट्टी की सेवानिवृत्ति की तारीख को अपने अनुभव की ताकत पर बढ़ा दिया, लेकिन एसीयू प्रमुख की नियुक्ति के मामले में इसका पालन क्यों नहीं किया गया। पूरे भारत में नीरज कुमार के बारे में लोग जानते हैं, लेकिन यह सीओए को ही अच्छे से पता होगा कि उसने नीरज कुमार के करार क्यों नहीं बढ़ाया।

हितों का टकराव का मामला 

 उन्होंने कहा कि जब हितों के टकराव की बात आती है तब भी दोहरे मानक देखने को मिलते हैं। डॉ. श्रीधर को इस आधार पर इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा कि उन्होंने हैदराबाद क्रिकेट संघ से जुड़े अपने क्लबों के बारे में जानकारी नहीं दी थी लेकिन मयंक पारिख के मामले में भी यही नियम लागू नहीं हुआ जो मुंबई क्रिकेट संघ से जुड़े छह क्लबों के मालिक हैं।

बीसीसीआइ ने कैसे उन्हें पांच दिनों की मोहलत दी। बोर्ड के एक अनुभवी प्रशासक के मुताबिक देश में समाचार पत्र सीओए से बेहतर काम कर रहे हैं जो बोर्ड में गलत घटनाओं को उजागर करते हैं। प्रशंसकों को सब कुछ जानने का अधिकार है, चाहे वह सेवानिवृत्ति की आयु का विस्तार हो या फिर हितों में टकराव का मामला हो या फिर वेतन निर्धारण या प्रचार का प्रबंधन हो। मयंक पारिख का मसला साफ होना चाहिए। 

सब कुछ हो सार्वजनिक 

साथ ही वर्मा ने बीसीसीआइ की वेबसाइट पर सब कुछ सार्वजनिक करने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सीओए बोर्ड के कामकाजों में पारदर्शिता को दिखाने के लिए बीसीसीआइ की वेबसाइट पर अपनी बैठक के बारे में बताता है लेकिन अगर वह गंभीर है तो उन्हें मयंक पारिख पर की गई कार्रवाई के बारे में भी जानकारी देनी चाहिए। 

अनुभवी प्रशासक ने कहा कि सीओए और सीईओ मयंक की रक्षा करने में सफल हो सकते हैं लेकिन बीसीसीआइ के सही हाथों में जाने के बाद उस पर कड़ी कार्रवाई हो सकती है। उन सही हाथों में जिन पर कभी दोहरे मानक के आरोप नहीं लगे।

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Posted By: Lakshya Sharma