(अपडेट-शास्त्री का कॉलम)

चेन्नई में साल का वह समय है जब आपके वातानुकूलित कमरों के बाहर दिन और रात दोनों बहुत लंबे होते हैं। यहां की गर्मी बेचैनी पैदा करती है। लेकिन जब मैं मुंबई और चेन्नई की भिड़ंत के बाद स्टेडियम से लौट रहा था तो मेरे दिमाग में गर्मी की बजाए कुछ और ही बातें चल रही थीं।

हार्दिक पांड्या को मैन ऑफ द मैच चुना गया था। उन्हें वे लोग जरूर धन्यवाद दे रहे होंगे, जो चाहते थे कि मैच जल्द से जल्द खत्म हो जाए, ताकि वे अपने-अपने घर को लौट सके। उन्होंने करीब 20 रन बनाए और तीन छक्के लगाए। उनसे पहले पहली पारी में पवन नेगी ने भी आकर्षक पारी खेली। इन दोनों ने कुछ ऐसी पारी खेली, जो इस सत्र में ज्यादा बार नहीं देखी गई।

टी-20 क्रिकेट को लेकर एक गलतफहमी है कि यह प्रारूप केवल शुरुआती चार बल्लेबाजों के लिए है। शायद इस कारण ही क्रिस गेल, डिविलियर्स और कोहली का नाम शुरुआती तीन बल्लेबाजों में रहता है। शायद इस वजह से ही डेविड वार्नर और शिखर धवन पारी का आगाज करते हैं। लेकिन उन टीमों पर नजर डालिए, जो इस 'चार बल्लेबाज' के सिद्धांत को नहीं मानते। फॉकनर, धौनी, रसेल, पोलार्ड। ये चारों मैच विनर बल्लेबाज हैं। इस कारण ही इनकी टीमें आइपीएल की सर्वश्रेष्ठ टीमों में शुमार है। आखिरी ओवरों में बनाए गए 20-30 रन भी टीम की तकदीर बदलने के लिए काफी होते हैं। आखिरी ओवरों में आप इतना ही कर सकते हैं।

नजदीकी रोमांचक मुकाबलों के स्कोरकार्ड उठा कर आप देख लीजिए, उसमें आखिरी में आपको मैच फिनिश करने वाले की पांड्या और नेगी जैसे बल्लेबाज मिल जाएंगे। लेकिन जीत का श्रेय इन्हें कभी नहीं मिलता है, ये सुर्खियां नहीं बटोर पाते हैं। इस कारण ही जब शुक्रवार की रात पांड्या को मैन ऑफ द मैच का पुरस्कार मिला तो मैं बहुत खुश हुआ। रन तो उन्होंने ज्यादा नहीं बनाए, लेकिन मैच में उनका असर सबसे ज्यादा रहा। ज्यूरी ने उनके द्वारा बनाए गए रनों की संख्या की बजाए उनकी गुणवत्ता को महत्व दिया।

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Posted By: sanjay savern

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