(कॉलम गावस्कर) 

पिच की स्थिति में अचानक आए बर्ताव के बारे में आखिरी बार 1969 में सुनने को मिला था। उस समय बिल लॉरी के नेतृत्व में ऑस्ट्रेलियाई टीम भारत आई थी। फिरोजशाह कोटला में टेस्ट मैच खेला जा रहा था और दूसरी पारी में ऑस्ट्रेलिया को कम स्कोर पर आउट करने के बाद भारत को चौथी पारी में 190 के करीब का लक्ष्य हासिल करना था। भारतीय स्पिनर गेंद को बहुत ज्यादा टर्न करा रहे थे और प्रतिभा व जज्बे के मिलन से ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज बहुत ही साधारण दिख रहे थे। ऑस्ट्रेलिया की टीम में एश्ले मैलेट और जॉन ग्लेसन थे और स्पिन के साथ ग्राहम मैकेंजी व एलेन कोनोली की तेज गेंदबाजी से भारत के लिए मुश्किलें खड़ी होने की संभावनाएं जताई जा रही थीं। मगर हुआ इसके ठीक उलट, भारत ने सिर्फ तीन विकेट गंवाकर यह मैच जीत लिया। मैलेट को बमुश्किल ही टर्न मिली और स्पिन को अच्छे से खेलने वाले भारतीय बल्लेबाज स्पिन के खिलाफ विफल नहीं हुए।

वांडरर्स में चौथे दिन सुबह के सत्र ने दिल्ली के मैच की ही याद ताजा कर दी। एक दिन पहले ही पिच को लेकर काफी चर्चा हो चुकी थी, लेकिन अगले दिन यह सोती हुई दिखी। गेंद मुश्किल से ही गलत तरीके से उठी और लंच से पहले तक भारतीय गेंदबाजों को एक भी विकेट नहीं मिला। अमला और एल्गर दोनों ने गजब का धैर्य दिखाया और विकेट के बीच अच्छी दौड़ लगाई। गेंदबाजों को दाएं और बाएं हाथ के बल्लेबाज को गेंद कराने में संघर्ष करना पड़ा।

इस पिच पर अमला ने दोनों पारियों में अर्धशतक बनाया, जो कि एक बड़ी उपलब्धि है। उनकी पारी बताती है कि आखिर उन्हें कितना कम आंका जाता है। एल्गर हमेशा से ही एक जुझारू खिलाड़ी रहे हैं और वह अपनी सीमाओं के साथ बल्लेबाजी करते रहे। उन्होंने अमला के साथ मिलकर साझेदारी को आगे बढ़ाया। चाय से पहले अमला और डिविलियर्स के विकेट ने भारत के जोश को बढ़ाने के लिए एक तरह से टॉनिक का काम किया। वह मैदान में वापसी कैसे करते हैं, इसी पर सम्मानजनक जीत या हार के साथ दक्षिण अफ्रीका को वाइटवाश की खुशी देने के बीच अंतर पैदा करेगा। 

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By Sanjay Savern