नई दिल्ली, अभिषेक त्रिपाठी। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) की ओर से टीम इंडिया के चयन के लिए जरूरी किए गए यो-यो टेस्ट को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। भारतीय टीम के एक बड़े क्रिकेटर सहित बीसीसीआइ के एक पदाधिकारी ने ही इसे कटघरे में खड़ा कर दिया है। यही नहीं बाकी लोग दबी जुबान में इस पर बात कर रहे हैं। फिटनेस के लिए बेंगलुरु स्थित नेशनल क्रिकेट अकादमी (एनसीए) में होने वाले इस टेस्ट की पारदर्शिता और उपयोगिता पर सवाल पहले से ही उठ रहे हैं।

मुंबई में मंगलवार को बीसीसीआइ पदाधिकारियों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त प्रशासकों की समिति (सीओए) की बैठक से पहले एक पदाधिकारी ने इस पर आपत्ति जताई। इस टेस्ट के कर्ता-धर्ता टीम इंडिया के फिटनेस और कंडीशनिंग कोच वासू पर भी सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में भारतीय टीम में वापसी करने वाले दिनेश कार्तिक कभी वासू के ही जिम में जाया करते थे और उनके कंडीशनिंग कोच बनने के बाद कार्तिक की टीम में वापसी हो गई है। अब यह संयोग है या कुछ और ये तो टीम प्रबंधन ही बता सकता है।

सूत्रों के मुताबिक बीसीसीआइ के एक पदाधिकारी ने मंगलवार को बैठक से पहले सीईओ राहुल जौहरी से पूछा कि आखिर ये यो-यो टेस्ट किस आधार पर टीम में चयन का आधार बन गया तो जवाब मिला टीम प्रबंधन और चयनकर्ता चाहते थे कि ऐसा हो। पदाधिकारी ने कहा कि चयनकर्ता का काम चयन करना है न कि नीति निर्धारण करना। अगर लगातार शानदार प्रदर्शन करने वाला खिलाड़ी यो-यो टेस्ट पास नहीं कर पाएगा तो क्या उसे टीम में नहीं लिया जाएगा? ऐसा होता तो वीवीएस लक्ष्मण भारत को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दोहरा शतक मारकर जीत ही नहीं दिला पाते, क्योंकि वह यो-यो टेस्ट पास नहीं कर सकते थे। यही नहीं करियर के आखिरी तीन वर्षो में तो सचिन तेंदुलकर भी यो-यो टेस्ट पास नहीं कर पाते तो उनका करियर तीन साल पहले ही खत्म हो जाता। मनीष पांडे यो-यो टेस्ट पास करके आए हैं लेकिन उनके प्रदर्शन से टीम को जीत नहीं मिल रही है।

38 के नेहरा टेस्ट पास कर लेते हैं पर युवी व रैना नहीं

बीसीसीआइ के एक अन्य पदाधिकारी ने कहा कि यो-यो टेस्ट चयन का नहीं बल्कि चयन न करने का टेस्ट दिखाई देने लगा है। इस टेस्ट को 38 साल के आशीष नेहरा पास कर लेते हैं लेकिन युवराज सिंह और सुरेश रैना फेल हो जाते हैं। वहीं एक वरिष्ठ क्रिकेटर ने भी इस टेस्ट की प्रक्रिया में पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। युवराज सिंह ने इस टेस्ट को पास करने के लिए अभी तक घरेलू क्रिकेट में बल्ला भी नहीं उठाया है। वह इसे पास करने के लिए कई महीनों से एनसीए में अभ्यास कर रहे हैं। हालांकि इसके बावजूद कप्तान विराट कोहली और कोच रवि शास्त्री चाहते हैं कि टीम में चयन के लिए यो-यो टेस्ट बना रहे। बीसीसीआइ की सत्ता बदलने के बाद टीम इंडिया में जगह के लिए यो-यो टेस्ट की अनिवार्यता होने के नए नियम की विदाई तय है।

यो-यो के साइड इफेक्ट

फिलहाल यो-यो टेस्ट कुछ लोगों के हाथों की कठपुतली बन गया है। बीसीसीआइ को इसमें पारदर्शिता लानी चाहिए। इस साल 13 अगस्त को जब श्रीलंका में वनडे सीरीज के लिए टीम का ऐलान हुआ तो इसने कई लोगों को चौंका दिया। इस टीम में युवराज और रैना का नाम नहीं था। इसके बाद बोर्ड की तरफ से कहा गया कि इन दोनों के चयन न होने के पीछे की वजह उनका प्रदर्शन नहीं बल्कि यो-यो टेस्ट में फेल होना है। यह भी कहा गया कि 2019 विश्व कप को देखते हुए शास्त्री, कोहली और चयन समिति के अध्यक्ष एमएसके प्रसाद किसी तरह की कोताही बरतने के मूड में नहीं हैं। इन तीनों ने बोर्ड से भी साफ कह दिया है कि कितना भी बड़ा नाम क्यों न हो उसकी फिटनेस से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

यो-यो बीप टेस्ट क्या होता है?

फुटबॉल, रग्बी और क्रिकेट में ‘यो-यो बीप टेस्ट’ किसी खिलाड़ी के दमखम का परीक्षण करने के लिहाज से सबसे अहम माना जाता है। यही कारण है कि दुनिया भर की टीमों ने इसे अनिवार्य बना रखा है। इस टेस्ट में कई ‘कोंस’ की मदद से 20 मीटर की दूरी पर दो पंक्तियां बनाई जाती हैं। खिलाड़ी रेखा के पीछे अपना पांव रखकर शुरुआत करता है और निर्देश मिलते ही दौड़ना शुरू करता है। उसे 20 मीटर की दूरी पर बनी दो पंक्तियों के बीच लगातार दौड़ना होता है और जब बीप बजती है तो मुड़ना होता है। हर एक मिनट या तय किए गए समय में खिलाड़ी को अपने दौड़ने की गति को तेज करना होता है। अगर वह समय पर रेखा तक नहीं पहुंचे तो दो और ‘बीप’ के बाद उसे तेजी पकड़नी पड़ती है। अगर इसके बाद भी खिलाड़ी दो छोरों पर मानकों के मुताबिक तेजी हासिल नहीं कर पाता तो उसका परीक्षण रोक दिया जाता है।

ये पूरी प्रक्रिया सॉफ्टवेयर पर आधारित होती है जिसमें नतीजे रिकॉर्ड किए जाते हैं। यो-यो टेस्ट में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर सबसे आगे माने जाते हैं। इस टेस्ट में उनका औसतन स्कोर 21 होता है। भारतीय टीम में जगह बनाने के लिए हर खिलाड़ी को कम से कम 16 का स्कोर करना पड़ता है। इससे पहले तक यह सिर्फ एक पारंपरिक बीप टेस्ट ही हुआ करता था और इसमें खिलाड़ी के स्कोर को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था। तब यह टीम में चयन का मानक भी नहीं था। 90 के दशक में मुहम्मद अजहरुद्दीन, रॉबिन सिंह और अजय जडेजा को छोड़कर कोई अन्य भारतीय खिलाड़ी इस टेस्ट में 16.5 से बेहतर का स्कोर नहीं बना पाता था। वर्तमान कप्तान कोहली और रवींद्र जडेजा ने इसमें सर्वश्रेष्ठ 21 का स्कोर किया है।

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Posted By: Pradeep Sehgal

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