सुनील गावस्कर का कॉलम। आइपीएल के शुरुआती मैच काफी करीब जाकर खत्म हुए। केवल चेन्नई और पंजाब का मैच ही एकतरफा ही हुआ। मैच केवल छह मैदानों पर आयोजित हो रहे हैं और टीमों के पास इन पिचों पर अभ्यस्त होने का मौका है और उम्मीद के मुताबिक, वे इन पिचों पर एक से अधिक मैच खेलेंगे।

मुंबई में मैच के दौरान काफी छक्के लगे हैं क्योंकि गेंद बल्ले पर अच्छे से आ रही है और काफी उछाल भी देखने को मिल रहा है लेकिन चेन्नई में कहानी दूसरी है जहां फरवरी में इंग्लैंड के खिलाफ दो टेस्ट मैचों के लिए इस पिच का इस्तेमाल किया गया था और संभवत: ठीक होने का समय नहीं मिल पाया इसलिए वानखेड़े की तुलना में कम उछाल है इसलिए मुंबई में तेज गेंदबाजों को फायदा हुआ और कई विकेट चटकाए। वहीं, चेन्नई में स्पिनरों ने ज्यादातर विकेट लिए।

हमेशा की तरह नजरें बहुत अधिक भुगतान किए गए खिलाड़ियों पर हैं। ये सभी दबाव में हैं और अगर वह उम्मीदों पर नहीं उतरे तो उनकी आलोचना होगी। विडंबना यह है कि जो लोग इतनी मोटी रकम में खरीदने की सलाह देते हैं, उनसे कभी सवाल नहीं पूछा जाता और वे ऐसा करते हैं जैसे उनकी कोई गलती नहीं हो। वे खुद उन्हें कम आंकते हैं। टीम मालिक डाटा विशेषज्ञों के द्वारा चलते हैं इसलिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से वे खिलाड़ी टीम में कायम भी नहीं रहते हैं। डाटा विशेषज्ञ सिर्फ अपना काम करते हैं।

अब तक ग्लेन मैक्सवेल और क्रिस मॉरिस ने अच्छी शुरुआत की है और मुझे विश्वास है वे टूर्नामेंट के दौरान बेहतर करेंगे। कुछ अन्य लोग संघर्ष कर रहे हैं, विशेषकर तेज गेंदबाज जो भारतीय पिचों पर गेंदबाजी कर चुके हैं। वानखेड़े की पिच पर थोड़ा ज्यादा बाउंस है और पंजाब किंग्स के तेज गेंदबाज मेरेडिथ ने चेन्नई सुपरकिंग्स के बल्लेबाज सुरेश रैना और अंबाती रायुडू को अतिरिक्त पेस और बाउंस से परेशान किया था। पिछले साल भी, संयुक्त अरब अमीरात में कठिन पिचों पर कुछ बड़े स्कोर बने थे और बल्लेबाज तेज गेंदबाजों के खिलाफ उनकी गेंद की लाइन के पीछे नहीं गए थे।

20 ओवरों का प्रारूप ऐसा है जिसमें डॉट गेंदों की संख्या जितनी कम हो जाती है तो उतना ही अधिक दबाव खुद पर बन जाता है। जिस क्षण में डॉट गेंद फेंकी जाती है, तो उसके बाद बल्लेबाज व्याकुल होता है और बड़े शॉट की तलाश में रहता है। हालांकि समस्या ये है कि यह हर समय सफल नहीं होता है। चतुर गेंदबाज यह जानता है कि बल्लेबाज अपने जोन से बाहर निकलना चाहता है और एक अच्छी गेंद उसका बड़ा शॉट खराब कर देती और बल्लेबाजा आउट हो जाता है।

टीवी पर लाखों लोग द्वारा देखा जा रहा आइपीएल बल्लेबाज को बड़ा शॉट खेलने के लिए प्रेरित करता है। कोलकाता का मुंबई से हारना एक उदाहरण है। हैदराबाद की टीम ने कोलकाता से कुछ नहीं सीखा और अगले दिन उन्होंने भी ऐसा ही किया और दोनों टीमें मैच हार गईं जबकि उन्हें आसानी से जीतना चाहिए था। बल्लेबाज यह आसानी से जानते हैं कि अगर वह किसी एक मैच में नहीं चल पाए तो उन्हें बल्ले से और अधिक खेलने का मौका मिलेगा। जब प्लेऑफकी बात आती है, तो ये बल्लेबाज अक्सर लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं क्योंकि उन्होंने इसे लीग चरण में अभ्यास नहीं किया होता है और अब जानते हैं कि अगर उन्हें प्लेऑफ में गड़बड़ की तो उन्हें एक और मौका नहीं मिलेगा। दबाव आखिरी में आता है और जो इसे अच्छी तरह से अपनी प्रतिभा के साथ संभाल लेते हैं।

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