रायपुर राजनांदगांव के आगाज नाम की संस्था एक ऐसी शुरुआत करने जा रही है, जिससे गणेशोत्सव में पर्यावरण को नुकसान नहीं होगा। इससे नौकरीपेशा युवा जुड़े हुए हैं और वे खुद मिट्‌टी के तकरीबन 100 गणेश की प्रतिमा बना रहे हैं। इसे उन्होंने मिट्‌टी के साथ फूलों के बीजों से तैयार किया है और इसमें वाटर कलर का इस्तेमाल किया जा रहा है। विसर्जन के लिए प्लास्टिक का गमला और खाद का पैकेट फ्री में दिया जा रहा है।

संगठन के सदस्य इसे न्यूनतम शुल्क लेकर बेच रहे हैं और अपील कर रहे हैं कि घर में ही गणेश का विसर्जन करें और पर्यावरण को नुकसान से बचाएं। इस गणेश की प्रतिमा में कासमॉस, गेंदा, थिथौनिया समेत कई फूलों के बीज डाले गए हैं। 3 सितंबर से इनका प्रदर्शन भी फौव्वारा चौक में किया जाएगा। आगाज फाउंडेशन के अध्यक्ष अमित सोनी का कहना है कि प्रतिमा काली मिट्टी, रेत और कपास से बन रही हैं। विसर्जन के समय गमले में पहले रेत और मिट्टी की एक परत डालने के बाद उसमें इतना पानी भरेंगे कि प्रतिमा डूब जाए। धीरे-धीरे जब मूर्ति घुल जाएगी तो ऊपर लगा बीज मिट्टी की पतली परत के नीचे दब जाएगा। इसके बाद उसमें खाद डालेंगे। इस तरह पौधे के रूप में गणेश जी स्थापित होंगे। ये ऐसे बीज हैं जो किसी भी मौसम में उग सकते हैं।

डिप्टी कलेक्टर-इंजीनियर खुद बना रहे मूर्तियां
इस फाउंडेशन में काम करने वाला कोई डिप्टी कलेक्टर है तो कोई इंजीनियर। पर्यावरण के लिए काम करने वाले आगाज फाउंडेशन के सभी सदस्य नौकरीपेशा हैं। अध्यक्ष अमित सोनी पॉलिटेक्निक कॉलेज खैरागढ़ में लेक्चरर हैं। उनके अलावा कवर्धा के डिप्टी कलेक्टर अभिषेक दीवान, राजनांदगांव को-आपरेटिव इंस्पेक्टर मनोज तारम, रेलवे के जूनियर इंजीनियर अशोक देवांगन, आरएमएस मनीष बोस, ठेकेदार मनिंदर सिंह आदि 36 मेंबर शामिल हैं।

इसलिए शुरू किया इको फ्रैंडली प्रतिमा बनाना

ग्रुप मेंबर लोकेश नंदनवार ने बताया कि उनके घर में पिछले 22 सालों से गणपति की स्थापना की जा रही है। जब इको फ्रैंडली गणेश और मिट्टी के गणेश स्थापित करने पर जोर दिया तो पिछले साल ऐसी प्रतिमाएं तलाशीं, लेकिन कोई भी प्रतिमा शत-प्रतिशत इको फ्रैंडली नहीं मिली, इसलिए फाउंडेशन ने अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखकर मूर्तियां बनाने का निर्णय लिया।

ज्योतिषाचार्य के मुताबिक, धर्म और कर्म दोनों में मिट्टी के गणेश की स्थापना उत्तम है। ईश्वर प्रतिमा के आकार से नहीं, मन के भाव के आकार से प्रसन्न होते हैं। इसके लिए सर्वोत्तम पूजा यह है कि पूजित सामग्री का अपमान न हो। यह एक ऐसी विधि है जिससे पूजित सामग्री में जीवंतता आती है। यह श्रेष्ठ पूजा हैै।

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