रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधिः शहर में सुरक्षा, यातायात, गुणवत्ता युक्त शिक्षा, बेहतर चिकित्सा और जल-वायु प्रदूषण आज भी चुनौती बनी हुई हैं। इन सभी के अपने मानक हैं, मानकों को सीमा में रखने के नियम-कानून भी बने हुए हैं। मगर सवाल वही है कि नीति-नियम सबकुछ लेकिन राजनीतिक, प्रशासनिक इच्छा शक्ति कमजोर है। इसकी वजह से इनका पालन नहीं हो पा रहा है।

विभागों में समन्वय का अभाव है, यहां तक कि आम नागरिक अपनी जिम्मेदार नहीं समझ रहा। सख्ती से नियमों का पालन करवाया जा सकता है लेकिन इसके लिए सोच में बदलाव लाने की जरुरत है। शहर में अच्छी यातायात व्यवस्था हो, उच्च स्तरीय शिक्षा हो और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हों इसके लिए सिर्फ एक बार एक मंच पर बैठकर शहर हित, राष्ट्रहित में सोचने की जरुरत है। छोटे-छोटे बदलाव से ही व्यवस्था में सुधार संभव है। जागरण समूह के माय सिटी माय प्राइड की राउंड टेबल कांफ्रेंस में अतिथियों और विशेषज्ञों ने बेबाक होकर अपनी राय रखी। नई दुनिया कार्यालय में हुई इस कांफ्रेंस का संचालन रायपुर नगर निगम के पूर्व मेयर सुनील सोनी ने किया, जो हर मुद्दे की गहराई से वाकिफ थे। इस दौरान माय सिटी माय प्राइड के सर्वे के परिणामों पर भी चर्चा की गई।

 

हम सब मिलकर काम करें, राजनीतिक दबाव डालने वाले कम हैं
मैं मानता हूं कि शहर में सभी विभाग मिलकर काम करें तो हर समस्या का निदान संभव है। हां, कई बार बात आती है कि राजनीतिक दबाव की वजह से कई काम नहीं हो पाते। ट्रैफिक पुलिस ने किसी पर कार्रवाई की तो नेताओं के फोन आते हैं, मैं दोहराता हूं कि ऐसा करने वाले कुछ ही लोग होंगे। इनसे डरने की जरुरत नहीं है। जहां तक सवाल सुरक्षा का है तो इसमें काम करने की जरूरत है, ट्रैफिक नियमों का पालन करें। पॉलीथिन आज सबसे बड़ी समस्या है, एक समय था जब शहर में अखबारों से बने बैग बिका करते थे। लोगों को रोजगार भी मिलता था और एक फीसद भी प्रदूषण का खतरा नहीं था। मगर आप पॉलीथिन बैग ने आर्थिक रूप से हमारी कमर तोड़ दी है। अगर कुछ अच्छा करने के लिए पुरानी व्यवस्था लागू कर दी जाए तो कोई बुराई नहीं है।
-सुनील सोनी, पूर्व महापौर

मूलभूत चीजें स्कूली पाठ्यक्रम में हों
मेरा मानना है कि हमें आने वाली पीढ़ी को सर्वप्रथम मूलभूत बातों का ज्ञान देना जरूरी है। साफ-सफाई, यातायात नियमों का पालन... जैसे बहुत कुछ। क्योंकि अगर वे इन बातों को समझेंगे तो सही दिशा में देश आगे बढ़ेगा। आज एक बड़ी समस्या है कि लोगों की पैदल चलने की आदत खत्म हो गई है। निगम ने मल्टीलेवल पार्किंग बना दी, लेकिन गाड़ियां आज भी मालवीय रोड और गोलबाजार में जाती हैं। जब तक सख्ती नहीं होगी तब तक सुधार नहीं होगी। मैं 'नई दुनिया" फोरम के माध्यम से स्पष्ट कहना चाहता हूं कि व्यापारी ही सड़क पर कब्जा करते हैं, लोगों को जगह देते हैं और उनसे किराया लेते हैं। सड़कों पर जाम की वजहों में से एक यह भी है। जोन सात में मैंने अभियान चलाकर पाटे तोड़े, दबाव भी आया लेकिन कार्रवाई नहीं रूकी। नीति-नियमों का पालन करवाने के लिए इच्छा शक्ति की जरुरत है। इसलिए हर तबके को मिलकर ही काम करना होगा।
-संतोष पांडेय, जोन आयुक्त 7, नगर निगम

दुकानों के बाहर लगाएं व्यापारी कैमरे
शहर की चौकसी के लिए जरूरी है कि प्रत्येक चौक-चौराहों पर कैमरों की संख्या बढ़ाई जाए। अभी देखने में यह आया है कि दुकानदार दुकानों के अंदर कैमरे लगाते हैं, जबकि बाहर भी लगाएं। अपराधियों के भागने के हर एक मूवमेंट इसमें कैद होंगे। हेलमेट पर चालान करने की कार्रवाई से अच्छा है कि लोगों को कहा जाए कि वे हेलमेट खरीदकर लाएं, तभी गाड़ी छोड़ेंगे। इसके दो बड़े फायदे हैं। पहला व्यक्ति के पास हेलमेट हो जाएगा जो वह खरीदना नहीं चाहता था, दूसरा वह हमेशा इसे लगाकर चलेगा। अभी आम लोगों की सुरक्षा को लेकर डॉयल 112 लांच किया गया है, मेरा अनुरोध है कि सभी इस नंबर का इस्तेमाल करें। ताकि अपराध को रोका जा सके, सड़क हादसों में तत्काल घायल को अस्पताल पहुंचा जा सके।
-अभिषेक माहेश्वरी, डीएसपी क्राइम

सिविक सेंस डेवपल करने की जरूरत
आप लाख कोशिश कर लें कि सख्ती करके लोगों से नियमों का पालन करवा लें लेकिन यह कुछ दिनों के लिए ही होगा। जहां कार्रवाई बंद तो फिर नियम टूटने शुरू हो जाएंगे, इसलिए जरूरी है कि सोच बदलने की। सिविक सेंस डेवपल हो जाएगा तो सब-कुछ सुधर जाएगा। मैं इंग्लैंड और पोलैंड गया, वहां लोग बखूबी अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। नियमों का पालन करते हैं। उन्हें बताने-समझाने की जरूरत नहीं होती। दूसरा देश की बड़ी समस्या है तेजी से बढ़ती जनसंख्या, कई समस्याओं की जड़ यही है। इस पर नियंत्रण के प्रयास हो रहे हैं लेकिन प्रतिशत कम ही है। तीसरी बात कहना चाहूंगा मोबाइल फोन... इसने समाज को ध्वस्त कर दिया है। यह भी सच है कि आज इसके बिना आप खुद को अधूरा पाते हैं लेकिन इस्तेमाल हो एक सीमा तक।
-विजय खंडेलवाल, प्राचार्य, शासकीय दानी स्कूल

शिक्षकों का उपयोग अध्यापन कार्य में ही हो
किसी भी देश, शहर का वास्तविक आंकलन शिक्षा से होता है। मेरा मानना है कि प्राथमिक शिक्षा पर काफी काम करने की जरुरत है, दीघकालीन प्लान की जरुरत है। एक कक्षा, एक रूम और एक शिक्षक कांसेप्ट से चलना होगा। आज हम पाते हैं कि एक शिक्षक पांच-पांच कक्षा एक साथ लेता है, ऐसे में क्या विकास होगा, आप समझ सकते हैं। सरकार को चाहिए कि जिस पर प्रकार सीएसआर फंड से चौक-चौराहों का निर्माण कार्य करवाया जाता है, उसी फंड को स्कूलों में खर्च किया जाए। आज गुणवत्ता युक्त शिक्षा की दरकार है। शिक्षक का उपयोग सिर्फ अध्यापन कार्य में हो न की दीगर। अगर अन्य कार्यों में ड्यूटी लगाई जाएगी तो फिर आप उनसे अपेक्षा नहीं कर सकते कि वे अच्छे से पढ़ा पाएंगे।
-यशवंत सिंह वर्मा, प्रतिनिधि, छत्तीसगढ़ शिक्षक संघ

पुलिस से सिर्फ पुलिसिंग ही करवाई जाए
शहर में जितना स्टाफ थानों में है उससे हम थाना क्षेत्र की सभी अपराधों पर लगाम कस सकते हैं, लेकिन इन्हीं पुलिसवालों को आप लॉ-एंड-ऑर्डर में लगाएंगे, उन्हीं से धरना गाय-बैल भी हकवाएंगे तो हर काम संभव नहीं होगा। इससे पुलिस के मूल काम नहीं हो पाएंगे, विवेचनाएं लंबित रहेंगी। दूसरा अपराध की बात करूं तो पैटर्न बदला है। 10 साल पहले के अपराध और आज के अपराध में जमीन-आसमान का अंतर है। अब सोशल वॉर हो रहा है। सोशल साइट्स हैक करवाने वाले, उसमें गंदे मैसेजेस करने वाले कोई और नहीं बल्कि 14-18 साल के लड़के हैं। मैं मानता हूं कि बल कम है, बावजूद इसके राजधानी पुलिस बेहतर से बेहतर काम करने की कोशिश कर रही है। हम साइबर क्राइम के अपराधियों तक पहुंच रहे हैं।
-चेतन दुबे, सहायक सब इंस्पेक्टर, क्राइम ब्रांच

सख्ती से पालन की जरूरत है
पॉलीथिन आज सबसे बड़ी समस्या है, इसे कैसे नष्ट किया जाए और कैसे इसका इस्तेमाल हो, क्या हैं नियम-कानून इसे लेकर अहमदाबाद जाने वाले दल में मैं भी था। वहां नियमों का अक्षर-सा पालन करवाया जा रहा है। सख्ती है इसलिए कोई हिमाकत भी नहीं करता कि वह प्रतिबंधित पॉलीथिन का इस्तेमाल करे। वहां से लौटकर हमने निगमायुक्त को प्रस्ताव दिया है, जिसे शासन को भेजा गया है। रायपुर नगर निगम सख्ती से आने वाले दिनों में कार्रवाई करेगा। हां, हमारे पास पॉलीथिन जब्ती के बाद रखने की व्यवस्था नहीं है इसलिए कार्रवाई निरंतर नहीं होती, लेकिन हम अब उसे रि-साइकिल करेंगे। निगम के इस प्रयास में जनता को भी साथ देना होगा। हम बाजार जाते हैं तो पॉलीथिन में कोई सामान देता है तो तत्काल मना करें, निगम को सूचना दें। जिम्मेदार नागरिक बनने की जरुरत है।
-विवेकानंद दुबे, राजस्व अधिकारी नगर निगम एवं अपशिष्ट प्रभारी

बच्चों के लिए समय निकालें
आज परिवार में किसी के लिए किसी के पास वक्त नहीं है। माता-पिता बच्चों को समय नहीं दे पा रहे,वे कभी यह नहीं पूछते कि आज स्कूल में क्या हुआ, उन्हें कोई परेशानी तो नहीं है। हां, बेटा को पैसा चाहिए, तुरंत दे देते हैं। पैसा ही सब-कुछ हो गया है,रिश्ते नहीं। अपराध बढ़ने की वजह भी यही है। बच्चे डिप्रेशन में चले जाते हैं और फिर अपराध में संलिप्त होते चले जाते हैं। पैसा देकर हम उनकी आदतें बिगाड़ रहे हैं। कभी भी दादी-नानी ने यह नहीं सोचा होगा कि वे वृद्धाश्रम जाऊंगी, पर आज हमें सोचना पड़ रहा है। जब से एकल परिवार टूट रहे हैं , तब से यह स्थिति खड़ी हुई है। हमें संयुक्त परिवार की तरफ लौटना होगा, जहां बुजुर्गों से परिवार की रौनक रहती है, वे संस्कार देते हैं और उनका डर भी रहता है। अच्छे-बुरे का ज्ञान देते हैं, टोकते-रोकते हैं। एकल परिवार में समझाने वाला कोई नहीं होता। सबसे पहली पाठशाला स्कूल नहीं, घर है। यहां से ही एक ज्ञान मिलता है।
-पी. अनुराधा राव, सब इंस्पेक्टर, महिला थाना

यातायात के लिए और चाहिए पुलिस बल
मैं आपको 10 साल पहले की बात बताना चाहता हूं कि स्व. राठौर साहब ने मुझे मुंबई भेजा। लॉ एंड ऑर्डर, ट्रैफिक मैनेजमेंट, क्राइम इंवेस्टीगेशन में मुंबई पुलिस कैसे काम करती है। वहां मेरी आंखें खुली की खुली रह गईं। आप जानिए उनके पास हर एक चीज के लिए स्पेशिफिक बिंग है। लॉ एंड ऑर्डर, अपराध और ट्रैफिक के लिए अधिकारी-जवान अलग-अलग। एक का दूसरे से कोई संबंध नहीं। इसलिए व्यवस्था दुरुस्त है। राजधानी के लिए आज 2500 ट्रैफिक पुलिसवालों की भर्ती तत्काल होनी चाहिए। ट्रैफिक का अपना एसपी हो, डीएसपी हो। अब बात आती है प्रशिक्षण की तो जवानों को पुणे भेजें, वे सीखकर आएं। मैं मानता हूं कि पुलिस को पुलिसिंग करने दो...। आप पुलिस वालों से सड़क पर बैठे गाय-बैल को हटवाओगे...। अगर व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो आने वाले 10 साल में रायपुर बिहार बन जाएगा, अपराध पर लगाम नहीं लग पाएगी। अंत: में इतना करूंगा कि राजनीतिक दबाव के कारण राजधानी की पुलिस परेशान है।
-बीएस जागृत, सेवानिवृत्त, सीएसपी, रायपुर पुलिस

टुरिस्ट स्पॉट बढ़ाएं और शहर के तालाबों को बचाएं
मल्टीनेशनल कंपनियों से आप तरह-तरह के विकास के काम करवाते हो तो सीएसआर फंड से क्यों नहीं शिक्षा को बेहतर बनाने का प्रयास करते। कौन है जो शिक्षा पर खर्च नहीं करना चाहेगा, सरकार उन्हें एप्रोच करे। जहां तक बात स्वास्थ्य की है तो जब तक अंडर ग्राउंड सिवरेज सिस्टम नहीं बनता तब तक शहर ऐसे ही पीलिया, डेंगू और अन्य महामारी से पीड़ित रहेगा। प्रदेश में अंडर ग्राउंड ड्रेनेज कहीं पर नहीं है। दूसरी बात शहर को कंक्रीट का जंगल न बनने दें, इस दिशा में विचार किया जाना चाहिए। अब तालाब ही ले लो, एक समय पर 700 तालाब हुआ करते थे, अब 50 रह गए हैं। मैं ट्रेवल्स सेक्टर से हूं तो कहूंगा कि शहर में 10 ऐसे स्पॉट विकसित करने की जरुरत है जो पर्यटन के लिहाज से अंतरराष्ट्रीय मानकों पर हों। पर्यटन बढ़ेगा तो रोजगार बढ़ेगा।
-कीर्ति व्यास, संचालक, व्यास ट्रैवल्स

रायपुर को चाहिए मोहल्ला क्लीनिक कांसेप्ट
आंबेडकर अस्पताल और एम्स में सर्दी- खांसी का इलाज क्यों हो? क्यों सरकार मोहल्ला स्तर पर ऐसे क्लीनिक नहीं खोल सकती जहां छोटी बीमारियों का इलाज हो और गंभीर बीमारियों के लिए मरीज को टर्सरी केयर हॉस्पिटल्स रेफर किया जाए। बड़े अस्पतालों का भार ही कम नहीं हो रहा, इसलिए गुणवत्ता युक्त चिकित्सा नहीं मिल पा रही है। मेरा मानना है कि दिल्ली सरकार का मोहल्ला क्लीनिक कांसेप्ट एक प्रयास इसी दिशा में है। आज जो बीमारियां फैल रही हैं वे संक्रामक ही हैं, इसलिए जरूरी है कि अच्छी गुणवत्ता का खाद्य पदार्थ, स्वच्छ पेयजल, अच्छा वातावरण लोगों को मिले। हम सब के लिए गर्व की बात है कि हमारा रायपुर देश के 100 शहरों में सातवें पायदान पर है जहां रहना आसान है। लेकिन हमें यहीं ठहर नहीं जाना है, इसे और बेहतर बनाने की जरुरत है। हम सबको मिलकर काम करना होगा।
-डॉ. संजय शुक्ला, स्वास्थ्य विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक, शासकीय आयुर्वेद कॉलेज रायपुर

आंकड़ों पर जाना चाहिए, क्योंकि ये इंडिकेटर्स होते हैं
स्वास्थ्य के क्षेत्र में सूचना तंत्र का मजबूत होना सबसे ज्यादा जरूरी है। कहीं से भी सूचना आती है कि एक मरीज मिला है तत्काल वहां पर निगम-स्वास्थ्य अमला सक्रिय हो जाए। बीमारी को वहीं खत्म करने की जरूरत है। भिलाई में डेंगू फैलाने की वजह भी यही है कि शुरूआत में जानकारी होने का बावजूद मैनेजमेंट नहीं हो सका, या यूं कहें कि नजर-अंदाज किया गया। आंकड़े हमारे पास होते हैं, आंकड़े ही इंडीकेट्र्स हैं। अगर हमारा शहर स्लम फ्री हो तो ठीक, न हो तो सफाई व्यवस्था होना जरूरी है।
-डॉ. आशीष सिन्हा, विशेषज्ञ, पब्लिक हेल्थ एवं असिस्टेंट प्रोफेसर, पं. जेएनएम मेडिकल कॉलेज

पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा इस्तेमाल हो
आज मालवीय रोड, गोलबाजार में चार पहिया गाड़ियां धड़ल्ले से जाती हैं उन्हें रोकने वाला कोई नहीं होता। इनसे ही यातायात जाम की स्थिति बनती है। आप देखिए किसी समय में एक परिवार में एक गाड़ी हुआ करती थी,आज एक परिवार में जितने लोग उतनी गाड़ियां या उससे अधिक। हम पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल नहीं करना चाहते। इस कल्चर को बढ़ाने की जरुरत है। एक समय आएगा कि गाड़ियां रेंगती हुई सड़क पर चलेंगी। मैं कारोबारी हूं, तो हर दुकानदार को चाहिए कि वह स्वच्छता को लेकर निगम का सहयोग करे।
गिरीश रेलवानी, थोक व्यापारी रायपुर

'नईदुनिया" के पांच सवालों पर जानकारों, अफसरों के जवाब-
0 सवाल- सड़क, सुरक्षा और ट्रैफिक जाम के मामले में अपने शहर को कैसे आंकते हैं?
-जवाब- स्थिति बेहतर नहीं है, बहुत काम करने की आवश्यकता है।
0 सवाल- अवैध अतिक्रमण की समस्या पर आपके शहर की स्थिति कैसी है?
-जवाब- अतिक्रमण हर जगह है। दुकानदारों से लेकर मकान मालिक, सबने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर रखा है। सख्ती से कार्रवाई की जरुरत है।
0 सवाल- आप अपने शहर के लोगों की ट्रैफिक नियमों के पालन करवाने की प्रवृत्ति को कैसा मानते हैं?
- जवाब- नियमों की जानकारी है, लेकिन पालन नहीं होता।
0 सवाल- आप अपने शहर के सरकारी स्कूलों की सफाई व्यवस्था को कैसे आंकते हैं?
-जवाब- स्थिति में सुधार हुआ है।
0 सवाल- रिहाइशी, परिवहन और खान-पान के मामले में आपका शहर सस्ता है या फिर मंहगा।
- जवाब- अपेक्षाकृत अन्य शहरों के यहां खान-पान सस्ता है।

ये सुझाव आए...
पालन करें सभी-
हर चीज सरकार पर न डालें- नागरिकों ने ही जनप्रतिनिधियों को चुना,सरकार बनी लेकिन हर चीज सरकार पर थोप देना उचित नहीं है। जिम्मेदार नागरिक होने के नाते नियम-कानूनों का पालन करें, स्व:अनुशासित रहें तो किसी को कोसने की जरुरत नहीं होगी।

खत्म हो 8वीं तक पास करवाने वाला सिस्टम
'नईदुनिया" के माय सिटी, माय प्राइड कांफ्रेंस में सभी विशेषज्ञों, शिक्षाविद, अधिकारियों ने यह माना कि स्कूलों में 8वीं तक पास करवाने वाला सिस्टम खत्म होना चाहिए। इससे बच्चों का बौद्धिक विकास नहीं हो पा रहा है। 8वीं का बच्चा नाम तक नहीं लिख पा रहा है।

गुपचुप ठेलों की अभियान चलाकर जांच हो
शहर में बीमारियां फैलने की सबसे बड़ी वजह है कि खुले में बिकने वाली खाद्य सामग्री, जैसे गुपचुप। इस पर निगम और खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग दोनों को मिलकर काम करना चाहिए। एक-एक ठेलों की जांच करनी चाहिए, सैंपल लेना चाहिए। आप देखिए मिलावटखोरी ऐसी है कि इमली की जगह एसिड तक इस्तेमाल में लाया जाता है।

मवेशी मालिकों को जेल भेजो
पूर्व सीएसपी बीएस जागृत ने कहा कि अगर मवेशी मालिकों को जेल भेजना शुरू कर दिया जाए तो कोई अपने जानवरों को आवारा नहीं छोड़ेगा। राजनीतिक दबाव आएगा,आए लेकिन व्यवस्था तो बन जाएगी। डर पैदा हो जाएगा।

 

 

By Gaurav Tiwari