रायपुर। नईदुनिया प्रतिनिधि 

जनता संसद से लेकर विधानसभा, नगरीय निकायों की संसद यानि नगर निगम तक अपने मताधिकार से चुने जनप्रतिनिधियों को भेजती है। संसद ही देश के विकास में नीतियां बनाती है, जबकि निगम स्थानीय स्तर पर। निगम में बैठे जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा सिर्फ इतनी ही होती है कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई में कोई कोताई न बरतें। शहर का अच्छा विकास करें, लेकिन जन समस्याएं कुछ हद तक ही दूर हो पाती हैं और फिर जनता की कोई सुध नहीं ली जाती है। क्या सांसद, विधायकों, पार्षदों के लिए तय निधियों के साथ-साथ 'जनता निधि" भी होना चाहिए, जिसमें इतनी राशि हो कि जनता के प्रस्तावों पर निर्णय लेते हुए उन्हें साकार किया जा सके।

'नईदुनिया" के 'माय सिटी माय प्राइड' अभियान के तहत शनिवार को राउंड टेबल कांफ्रेंस का आयोजन किया गया। इसमें पार्षदों को आमंत्रित किया गया। सवाल था कि 'स्थानीय निकाय का कुछ बजट का खर्च वार्ड के नागरिकों पर खर्च किया जाए। उनकी मांग या सहमति के आधार पर आवश्यक काम किया जाए। इससे बजट की नीति में जनता की भागीदारी होगी और विकास कार्य के प्रति जनता की रुचि बढ़ेगी।' इस पर हर एक जनप्रतिनिधि ने अपनी सहमति दी।

एमआइसी सदस्य एजाज ढेबर ने कहा- मैं खुद 'जनता निधि' का प्रस्ताव एमआइसी में रखूंगा, नेताप्रतिपक्ष रमेश सिंह ठाकुर बोले- सामान्य सभा में में 'जनता निधि' पर चर्चा करूंगा। अब एक शुरुआत हो चुकी है, जो बड़े बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रही है।

 

'नई दुनिया' की जनता से अपील
शहर में होने वाले किसी भी विकास कार्य में अगर कोई गड़बड़ी की आशंका है तो आवाज उठाएं। क्योंकि यह आपका अधिकार है। शिकायत करें, जनप्रतिनिधि से लेकर निगम के अफसरों से, क्योंकि कोई भी विकास कार्य आपके अपने जमा किए गए कर (टैक्स) की राशि से ही होता है। इसलिए चुप न रें, सवाल पूछने की आदत डालें।

जानें क्यों जरूरी है 'जनता निधि'- इस निधि से जनता की मांग के अनुरूप काम होगा, इसलिए जनता अपनी जिम्मेदारी समझेगी और होने वाले काम का सम्मान भी करेगी। वह किसी भी तरह के भ्रष्टाचार होने पर सीधे अंगुली उठा सकेगी, सवाल कर सकेगी।

रायपुर नगर निगम बन सकता है एक मिशाल
देश, प्रदेश में कहीं भी 'जनता निधि' के नाम से कोई बजट नहीं है। अगर रायपुर नगर निगम, राज्य शासन इस प्रस्ताव पर अमल करता है तो रायपुर निगम राष्ट्रीय मिसाल बन जाएगा। अन्य राज्य भी इसका अनुसरण करेंगे। इसके लिए ठोस नीति बनाने की जरूरत है।

तात्यापारा-फूल चौक सबसे बड़ी समस्या
वर्तमान में रायपुर के सामने खड़ी बड़ी समस्याओं में से एक है फूल चौक-तात्यापारा चौड़ीकरण। 10 साल से यह समस्या जस की तस है। अभी इस चौड़ीकरण के प्रोजेक्ट के लिए 43.20 करोड़ रुपये चाहिए। नगरीय प्रशासन मंत्री अमर अग्रवाल की घोषणा के बाद की राशि स्वीकृत कर दी जाएगी, तब से फाइल मंत्रालय में है। नया रायपुर से नगर निगम का मुख्यालय महज 26 किमी है, फाइल यहां तक चलने में छह महीने का समय बीत चुका है।

जनता को करना होगा अधिकारों के प्रति जागरूक
भारत के संविधान ने जनता को कई अधिकार दिए हैं, लेकिन जनता को इसकी जानकारी नहीं है। वह हमेशा ही ठगी जाती है। इसलिए जरूरत है उसे उसके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की। किसी भी प्रोजेक्ट का एक प्रजेंटेशन जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ जनता के बीच हो, उनकी अपनी भाषा में हो।

ये समस्याएं भी आई सामने
अंडर ग्राउंड ड्रेनेज- रायपुर शहर की सबसे बड़ी समस्या है अंडर ग्राउंड ड्रेनेज सिस्टम। नगर निगम के पास कोई प्लान है न ही रायपुर स्मार्ट सिटी के पास। जबकि हर बरसात में आधा शहर पानी में डूबा रहता है। इस बार तो हालात और भी बदतर थे। शहर की प्रमुख सड़कों पर घुटनों-घुटनों पानी था। बिना योजना के बसाहट भी पानी भरने की बड़ी वजह है। कई ऐसी नालियां हैं, जिनका चौड़ीकरण सिर्फ प्रस्तावित है।

खाली प्लाट वालों पर कार्रवाई- बड़ी-बड़ी जमीनों को काट-काटकर बिल्डरों ने प्लाटिंग कर दी और लोगों ने निर्माण नहीं किया, जिसकी वजह से बरसात में इनमें पानी भरता है और फिर डेंगू,मलेरिया के मच्छर पनपते हैं। हालात बिगड़ते जा रहे हैं। निगम के पास ऐसे प्लाट मालिकों के विरुद्ध कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है।

निगम में स्टाफ की भारी कमी- निगम के किसी भी विभाग में पर्याप्त स्टाफ नहीं है। बतौर उदाहरण राजस्व विभाग, इसमें लगातार कर्मचारी-अधिकारी सेवानिवृत्त होते जा रहे हैं और फिर नई नियुक्तियां नहीं हो रही हैं। स्थिति यह है कि क्लास थ्री कर्मचारियों को राजस्व निरीक्षक बनाकर रखा गया है। यही हाल स्वास्थ्य विभाग का है। कई जोन के स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर तक नहीं हैं।

कई जगह उखड़ी हुई हैं सड़क- बरसात थमते ही सड़कों में भ्रष्टाचार की पोल खुल जाती है, इस बार भी यही हुआ। हर सड़क उखड़ गई है, बजरी सड़कों पर है और धूल से वाहन चालकों गाड़ी चलाने में समस्या आ रही है। तेलीबांधा सड़क को लेकर 'नईदुनिया' ने प्रमुखता से मुद्दा उठाया तो आयुक्त रजत बंसल ने ठेकेदार को जमकर फटकार लगाई और आदेश दिया कि जल्द से जल्द इसे दुरुस्त करें, नहीं तो कार्रवाई के लिए तैयार रहें। प्रत्येक पार्षद ने इस समस्या को गंभीरता से उठाया।

जनप्रतिनिधि, अफसर के बीच तालमेल नहीं
जनप्रतिनिधियों ने 'नईदुनिया" के मंच पर दो टूक कह कि निगम के अफसर उनकी नहीं सुनते। अफसर अपनी मर्जी से काम करते हैं यही वजह है कि व्यवस्थित काम दिखाई नहीं देता। तालमेल के अभाव में नुकसान सीधे जनता का हो रहा है। पार्षद यहां तक कहते हैं कि जोन अफसरों को मुख्यालय के अफसरों की शह है। सवाल यह है कि आखिर इसका कोई समाधान है भी या फिर नहीं? क्योंकि यह राग बरसों, वर्ष से जस का तस है। जनप्रतिनिधि अफसरों पर आरोप लगाते हैं, अफसर कहते हैं जनप्रतिनिधि काम करने नहीं देते।

पार्षद निधि इतनी कम कि 100 मीटर नाली बनाना भी मुश्किल
प्रत्येक पार्षदों का दर्द है कि पार्षद निधि बहुत कम है। चार लाख रुपये से होता क्या है? एक पार्षद ने फोरम यहां तक कह दिया कि इस राशि से 100 मीटर सड़क बना पाना भी मुश्किल है, महंगाई बढ़े तो 50 मीटर भी। जबकि पार्षद ही एक ऐसा शख्स है जो सीधे तौर पर जनता से जुड़ता है, उनकी हर एक व्यवहार का सामना करता है।

निगम चलाने के लिए आइएएस नहीं, एक्सपर्ट चाहिए
मेरे कार्यकाल में वार्ड समितियों का गठन किया गया था। समिति में प्रबद्धजन थे, जनप्रतिनिधि। इससे वार्डों की आवश्यकताएं और आम लोगों को होने वाली परेशानियां निकलकर सामने आती थी। इसके बाद में इनका गठन नहीं हुआ। इन्हें पुर्नजीवित करने की आवश्यकता है। 'जनता निधि' जिसकी चर्चा आज इस फोरम में हुई, उस राशि का कहां इस्तेमाल हो, यह समिति तय करे। यह सेल्फ डिसिजन बॉडी बने।मेरा शासन को यह भी प्रस्ताव था कि जैसे आइपीएस, आइएएस, आइआरएस, आइएफएस कैडर होता है ठीक वैसे ही नगरीय निकायों के संचालन के लिए कैडर बनाए जाए। अभी आप देखिए जो आइएएस निगमायुक्त बनकर आता है उसे नियम समझने में ही महीनों लग जाते हैं। धीरे-धीरे उसे निगम की कार्यशैली समझ आती है। निगम चलाने के लिए आइएएस नहीं एक्सपर्ट चाहिए। 

डॉ. किरणमयी नायक, पूर्व महापौर नगर निगम (इन्होंने माय सिटी माय प्राइड आरटीसी का संचालन किया)

जनता की बढ़ेगी भागेदारी
पार्षद जनता का प्रतिनिधितत्व नगर निगम में करता है। जनता के सुझावों पर प्रस्ताव लेकर आता है, उन्हें निगम के समझ रखता है। अब परेशानी यहीं से शुरू होती है, क्योंकि प्रस्तावों पर अमल नहीं हो पाता। होते भी हैं तो उनमें लंबा वक्त लगता है। अफसरशाही हावी है। जनता के कार्यों के लिए जो सीधे उनकी तरफ से आते हैं उसके लिए अलग से निधि का होना अति-आवश्यक है। मैं इसका समर्थन करता हूं। बहुत ऐसे भी काम हैं जिनके लिए हम पार्षदों के लिए बजट नहीं होता। अगर जनता निधि बन जाए और उसके क्रियान्वयन के लिए समिति तो समस्याएं खत्म हो सकती हैं। जनता को कोई शिकायत नहीं होगी। जनता जवाबदेह तो होगी, उसकी भागेदारी बढ़ेगी।
रमेश सिंह ठाकुर, पार्षद, वामन राव लाखे वार्ड एवं उप नेता प्रतिपक्ष, निगम

वार्ड समितियां का हो पुनर्गणना
वार्ड के नागरिक समस्याएं बताते हैं, कई समस्याओं को वे जोन और निगम मुख्यालय के अफसरों तक लेकर जाते हैं लेकिन समाधान नहीं होता। चक्कर काटने पड़ते हैं, मैं यह कहूं तो कतई गलत नहीं होगा कि पार्षदों को भी अफसर चक्कर लगवाते हैं। आज आप देखिए डेंगू का कहर है, लेकिन वार्डों में छिड़काव का केमिकल नहीं है। कई अस्पतालों में दवाएं नहीं हैं। पूर्व महापौर के कार्यकाल में वार्ड समितियों का गठन हुआ था, आज समितियां नहीं हैं। ऐसे में जनता तो पूरी तरह से कट गई, उसका शहर के विकास कार्य में कोई योगदान ही नहीं बचा। इसलिए मेरा मानना है कि योजनाओं जनता भागीदार बने, साथ ही साथ एक निधि भी तय की जाए जिससे जनता के बताए काम किए जा सकें।
सतीष जैन, पार्षद, सदर बाजार वार्ड

पार्षद तो चक्कर काटते रहते हैं
हम पार्षद सिर्फ कहने को हैं, आप देखिए कि बजट पर अधिकारियों पर निर्भर हैं। अब उनकी मर्जी वे कैसे काम करें, कैसे नहीं। एक महीने टेंडर, एक और महीने वर्कआर्डर जारी करने में लगा देते हैं। काम पूरा कब होगा भूल जाओ। अब काम नहीं होता तो जनता पार्षद का गला पकड़ती है, अफसरों का नहीं। इसलिए जरूरी है कि हर प्रोजेक्ट में जनता जुड़े। मैं यह मानता हूं कि जनता निधि से बगैर किसी टेंडर कागजी पचड़े में फंसेसीधे काम हो, क्योंकि यह चोरी नहीं है। खुलकर बोलता हूं कि एक बार का जो पार्षद होता है उसके कामों को करने में अफसर टाल-मटोल करते हैं, जो तीन-चार बार के पार्षद होते हैं उनके काम प्राथमिकता से होते हैं। यह प्रशासनिक व्यवस्था का बहुत ही खराब पहलू है।
मिलिंद गौतम, पार्षद, गुरू गोविंद सिंह वार्ड

लेकर आऊंगा एमआइसी में प्रस्ताव
विधायक और सांसद से भी ज्यादा जनता के करीब पार्षद होता है। वह बजट इसलिए लाता है जनता के काम हों और उनकी भागीदारी बढ़े। आज में इस मंच के माध्यम से यह घोषणा करता हूं कि मैं एमआइसी में 'जनता निधि' का प्रस्ताव लेकर आऊंगा। यह एक अच्छे काम की शुरुआत है। जनता निधि से जो भी काम होगा, जनता का उससे लगाव होगा। वह उसका रख-रखाव करेगी, सम्मान करेगी। वह यह भी देखेगी की काम गुणवत्ता से हो रहा है या फिर नहीं। निर्माण करवाने वाली एजेंसी से लेकर ठेकेदारों के अंदर भय रहेगा कि गुणवत्ता विहीन काम हुआ तो गर्दन मेरी फंस जाएगी। शायद ही कहीं 'जनता निधि" हो, अगर सफल हुए तो बाकि निकाय भी उसका अनुसरण कर सकेंगे।
एजाज ढेबर, पार्षद मौलाना अब्दुल रऊफ वार्ड एवं एमआइसी सदस्य राजस्व विभाग

अतिरिक्त बजट आएगा तो अच्छा होगा
अभी पार्षद निधि बेहद कम है। अगर एक अन्य निधि जुड़ती है तो यह राशि भी वार्ड में ही खर्च होगी, जो एक अच्छी शुरुआत होगी। हालांकि इसमें एक व्यावहारिक दिक्कत यह भी होगी कि जनता से आने वाले प्रस्तावों की लाइन लग जाएगी तो इसका फिल्टरेशन कैसे होगा? बिल्कुल, इसके लिए भी एक समिति बनाई जाए,जैसे पूर्व में वार्ड समितियां हुआ करती थीं। निगरानी भी। आज मेरे वार्ड सबसे बड़ी समस्या खाली प्लॉट की है। प्लाट में पानी भरा हुआ है, जिसकी वजह से डेंगू फैलने का खतरा है। अगर वार्ड समिति हो तो ठोस निराकरण की बात हो, क्योंकि जोन आयुक्त को कह-कहकर थक जाते हैं कि समस्या खत्म नहीं हो पाती। हमें जनता को भी अधिकार देने की अब जरूरत आ पड़ी है, सवाल पूछने की आजादी देने के लिए मंच देने की जरूरत है।
मीनल चौबे, पार्षद, डीडीनगर वार्ड

जनता की जरूरतें पूरी करने वाली निधि हो
अभी आप देखिए अगर वार्ड में किसी परिवार में किसी शख्स की मृत्यु हो जाती है और उसके पास अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं होते तो उसे कर्ज लेना होता है। ऐसे कई काम हैं जिनके लिए तत्काल पैसों की जरूरत होती है। जनता निधि अगर तय होती है तो उसमें ऐसे ही इमरजेंसी चीजों को करवाने का प्रावधान हो। इसका इस्तेमाल निर्माण जैसे कार्यों में न हो। दूसरा यह पार्षद निधि को सरकार किसी क्राइटेरिया में बांधे न? यह बात सच है कि हमें जितनी राशि पार्षद निधि में मिलती है वह बहुत कम है, समस्याएं बहुत। तीसरा एक महत्वपूर्ण बिंदु यह भी है कि जनप्रतिनिधियों को अतिरिक्त शक्तियां दी जाएं, अभी चाहकर भी हम कुछ नहीं कर सकते।
सतनाम सिंह पनाग, पार्षद, श. बिग्रेडियर उस्मान वार्ड एवं एमआइसी सदस्य

 

By Krishan Kumar