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बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए बेटे को घर से बेदखल कर सकता है मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

Published: Sun, 19 Jul 2026 04:52 AM (GMT+05:30)

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल को बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए बेटे या रिश्तेदार को घर से बेदखल करने का अधिकार है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट।

डिजिटल डेस्क, रायपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल को बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए बेटे या रिश्तेदार को घर से बेदखल करने का पूरा अधिकार है।

ट्रिब्यूनल को यह शक्ति माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम-2007 के तहत मिली है। अदालत ने कहा कि यह कानून सिर्फ भरण-पोषण भत्ता दिलाने के लिए नहीं, बल्कि बुजुर्गों को सुरक्षित और सम्मान के साथ रहने का अधिकार देने के लिए बनाया गया है।

जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने रायगढ़ जिले के निवासी रामदयाल साहू की याचिका को खारिज करते हुए मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय प्राधिकरण के आदेश को सही ठहराया।

याचिकाकर्ता ने ट्रिब्यूनल के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अपनी मां हेमकुंवर के नाम पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने मकान को खाली करने का निर्देश दिया गया था।

मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल ने 12 नवंबर 2021 को बुजुर्ग मां को मकान का कब्जा वापस दिलाने के आदेश दिए थे। इसके लागू नहीं होने पर ट्रिब्यूनल ने 15 मई 2024 को फिर आदेश जारी किया। रामदयाल साहू ने इसके विरुद्ध अपील की, लेकिन सात अगस्त 2024 को अपीलीय प्राधिकरण ने ट्रिब्यूनल का आदेश बरकरार रखा।

साथ ही रामदयाल साहू और उनके दो भाइयों को अपनी मां को 1,500-1,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का भी आदेश दिया। इस आदेश को रामदयाल साहू ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उसने कोर्ट में कहा कि संपत्ति पैतृक है और उसके बंटवारे का मामला सिविल कोर्ट में लंबित है।

हाई कोर्ट ने तर्क किया खारिज

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल संपत्ति के मालिकाना हक का फैसला नहीं करता, बल्कि वह बुजुर्ग की सुरक्षा और रहने के अधिकार की रक्षा करता है। इसलिए सिविल कोर्ट में लंबित मुकदमे से ट्रिब्यूनल की कार्रवाई प्रभावित नहीं होती। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति के मालिकाना हक और हिस्सेदारी का अंतिम फैसला सिविल कोर्ट ही करेगा।