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छत्तीसगढ़: बस्तर में माओवाद का अंत, सिर्फ 10 माओवादी बचे; एक साल में ढह गया लाल गलियारा

Published: Sat, 14 Mar 2026 02:25 PM (GMT+05:30)

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की समयसीमा के बाद बस्तर में माओवादी हिंसा में कमी आई है। चार साल पहले ...और पढ़ें

HighLights

  1. बस्तर में अब केवल 10 शीर्ष माओवादी सक्रिय हैं।

  2. 108 माओवादियों ने जगदलपुर में समर्पण किया।

  3. ग्रामीण इंद्रावती नदी पर अस्थायी पुल बनाकर विकास कर रहे।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब चार साल पहले माओवादी हिंसा के समूल अंत की समयसीमा तय की थी, तब इसे लेकर संशय था कि क्या ऐसा सच में संभव है, क्योंकि जंगलों के भीतर दशकों से जमे माओवादी नेटवर्क का खत्मा करना आसान नहीं था।

माओवादियों ने भी गृह मंत्री की इस घोषणा को चुनौती की तरह लिया था, लेकिन हालात तेजी से बदले, जिसे माओवादी भी ठीक से समझ नहीं पाए।

माओवादियों ने किया समर्पण

चार साल पहले कई जिलों में फैला माओवादी प्रभाव अब बस्तर के सीमित जंगलों तक सिमटता दिखाई दे रहा है। बसव राजू से लेकर हिड़मा तक मारे गए। भूपति-देवजी जैसे माओवादी भी समर्पण कर चुके हैं और अब सिर्फ 10 माओवादी बचे हैं।

समर्पण कर चुकी माओवादी पदमी बताती हैं कि 2022 में अबूझमाड़ के भीतर शीर्ष माओवादी जैसे बसव राजू, भूपति, देवजी, रुपेश ने बड़ी सभाएं की थीं। सभा से बड़ी संख्या में युवाओं को संगठन में शामिल किया गया। वह भी उन्हीं में से एक थी।

Chhattisgarh Maoist (1)

बस्तर में सिर्फ 10 माओवादी बचे

जगदलपुर में दो दिन पहले 108 माओवादियों के सामूहिक समर्पण ने बस्तर के स्थिति और साफ कर दिया। अब बस्तर में सक्रिय शीर्ष माओवादियों की संख्या 10 रह गई है।

इनमें सुकमा-दंतेवाड़ा सीमा क्षेत्र में सक्रिय दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी (डीकेएसजेडसी) सदस्य तथा दक्षिण सब जोनल ब्यूरो का सचिव पापाराव, हिडमा की बटालियन से जुड़ा डीकेएसजेडसी सदस्य सोढ़ी कैसा, डिविजनल कमेटी सदस्य (डीवीसीएम) हेमला विज्जा, चंदर कतलाम, प्रकाश माड़वी और एरिया कमेटी सदस्य किशोर, रुपी, मंगेश व मनीषा कोर्राम व माड़वी नंद कुमार के नाम प्रमुख हैं।

एक साल में ढहा नेतृत्व

इन माओवादियों को भर्ती के बाद प्रशिक्षण दिया गया और जल्द ही हाथ में बंदूक थमाकर जंगलों में उतार दिया गया। माओवादी नेतृत्व को भरोसा था कि नई भर्ती से संगठन और मजबूत होगा, लेकिन बसव राजू के अबूझमाड़ में मारे जाने के बाद चार दशक पुराना लाल गलियारा आखिरकार ढह गया।

सुरक्षा बल ने एक साल में शीर्ष माओवादी बसव राजू, विवेक मांझी, सहदेव सोरेन, कोसा, गुडसा उसेंडी, चलपति, जी. रेणुका, सुधाकर, गजराला रवि, एम. बालकृष्ण, हिड़मा व जोगा राव को मारकर संगठन को गहरा आघात दिया।

इनके अलावा भूपति, देवजी, मल्लाजी रेड्डी, रुपेश, दामोदर, गोपन्ना, सुजाता जैसे शीर्ष माओवादियों के समर्पण से रीढ़ ही टूट गई।

माओवादी बना रहे अस्थायी पुल

बीजापुर जिले के भैरमगढ़ के इतामपार घाट पर ग्रामीण बदलते बस्तर की नई कहानी लिख रहे हैं। जहां कभी बंदूक और बारूदी सुरंगों का साया था, वहीं अब इंद्रावती नदी पर रेत के बोरों से अस्थायी पुल बनाया जा रहा है।

तीन साल पहले इसी घाट के करीब उस नदी में माओवादियों ने बोट संचालकों से नाव छीन ली थी, ताकि कोई भी नदी पार कर अबूझमाड़ में प्रवेश न कर सके। मगर अब हालात बदल गए हैं।

अबूझमार के आठ-10 गांवों के करीब 300 ग्रामीण रोज नदी में रेत के बोरे डालकर अस्थायी पुल तैयार कर रहे हैं। इसमें बुधरुराम और जग्गाराम जैसे पूर्व माओवादी भी सहयोग कर रहे हैं।

ग्रामीणों के मुताबिक, पुल बनने से बैल, धरमा, उतला, काकीलोड़, बुड़गा, झिल्ली और आंगामेटा सहित कई गांवों तक पहुंच आसान हो जाएगी।

ग्राम पंचायत सचिव कोमल निषाद ने बताया कि प्रशासन इन गांवों में सड़क, प्रधानमंत्री आवास और स्कूल शुरू करने की तैयारी कर रहा है। निर्माण सामग्री पहुंचाने में नदी सबसे बड़ी बाधा थी, इसलिए ग्रामीणों ने खुद ही अस्थायी पुल बनाने की पहल की।

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