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छत्तीसगढ़: भंगाराम जात्रा में देवताओं की अदालत, थाने में हाजिरी देते हैं देवी-देवता; आस्था का अद्भुत नजारा

Published: Sun, 13 Sep 2026 04:00 AM (IST)

बस्तर की केशकाल घाटी में अनोखी भंगाराम जात्रा शुरू हुई, जहां देवी-देवता क्षेत्र की शांति के लिए थाने में हाजिरी देते हैं।

थाने में हाजिरी देते हैं देवी-देवता (जागरण)

थाने में हाजिरी देते हैं देवी-देवता (जागरण)

HighLights

  1. केशकाल घाटी में भंगाराम जात्रा का अनूठा आयोजन शुरू हुआ।

  2. देवी-देवता क्षेत्र की शांति हेतु थाने में हाजिरी देने पहुंचे।

  3. पुलिस अधिकारियों ने श्रद्धापूर्वक देवी-देवताओं का स्वागत कर आशीर्वाद लिया।

डिजिटल डेस्क, रायपुर। बस्तर की धरती पर आस्था की कई कहानियां हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में केशकाल घाटी की भंगाराम जात्रा (पूजा विधान) सबसे अलग है।

यहां देवी-देवता दर्शन देने नहीं, खुद थाने में हाजिरी देने आते हैं। शनिवार को इसी अद्भुत परंपरा के साथ प्रसिद्ध भंगाराम जात्रा की शुरुआत हुई।

मान्यता है कि जात्रा शुरू होने से पहले देवता थाने में हाजिरी देते हैं और क्षेत्र की शांति की अनुमति लेते हैं। इसे देखने बस्तर ही नहीं प्रदेश के दूसरे क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचे हैं।

बस्तर की विलक्षण आदिवासी संस्कृति

बस्तर की विलक्षण आदिवासी संस्कृति की इस अनूठे उत्सव का आयोजन हर साल भादो मास में होता है। दो दिन चलने वाले भंगाराम जात्रा में अंचल के नौ परगना के देवी-देवता शामिल होते हैं।

पहले दिन जात्रा की सबसे खास परंपरा के अनुसार, सभी देवी-देवताओं को सबसे पहले केशकाल थाना परिसर ले जाया गया। जैसे ही सैकड़ों भक्तों की भीड़ के साथ देवी-देवता (प्रतीक चिह्न) थाना पहुंचे, पुलिस विभाग ने पूरी श्रद्धा के साथ उनका स्वागत किया।

अनुविभागीय अधिकारी पुलिस अरुण नेताम, नगर निरीक्षक विकास बघेल सहित सभी पुलिस अधिकारियों और जवानों ने देवताओं को माला पहनाई, प्रणाम किया और आशीर्वाद लिया। थाने से लौटकर भंगाराम बाबा के स्थल में देवी-देवता ठहरे हैं। रविवार को यहां देवी-देवताओं की अदालत लगेगी।

देवताओं की अदालत से पहचान

भंगाराम जात्रा बस्तर की उन गिनी-चुनी जात्राओं में से है, जहां नौ परगना के देवी-देवता एक ही जगह एकत्रित होते हैं। यह सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक महापंचायत भी है।

दूर-दराज के गांवों के लोग यहां आकर एक-दूसरे से मिलते हैं, सुख-दुख बांटते हैं। इस जात्रा की पहचान देवताओं की अदालत है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, साल भर में देवी-देवताओं से जुड़े विवाद, परंपरा टूटने या किसी गांव की समस्या का फैसला इसी अदालत में होता है।

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