बिलासपुरहाईकोर्ट ने एक अहम आदेश में कहा है कि संविधान में सामाजिक न्याय के उद्देश्य से एससी, एसटी व ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई है। वहीं, दिव्यांगों को आरक्षण का मूल उद्देश्य सरकारी नौकरियों में अवसर देना है। दोनों आरक्षण का उद्देश्य अलग-अलग है। हाईकोर्ट ने पीएससी के नियम 7 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

याचिकाकर्ताओं ने आरक्षित कोटे की तरह छूट की मांग की थी

दरअसल, याचिकाकर्ताओं ने नियम में 3 फीसदी सीटें आरक्षित होने का हवाला देते हुए अनारक्षित वर्ग की जगह आरक्षित कोटे की तरह छूट की मांग की थी। पीएससी की परीक्षाओं में प्रारंभिक या स्क्रीनिंग परीक्षा पास करने के लिए नियम 7 के तहत प्रावधान है कि अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को हर पर्चे में न्यूनतम 33 फीसदी अंक लाने होंगे। इससे कम अंक होने पर वे अगले स्तर की परीक्षा से वंचित हो जाएंगे। इसी तरह एससी, एसटी व ओबीसी वर्ग के लिए 23 फीसदी अंक पाने का नियम है। दिव्यांगों के आरक्षण को लेकर नियम 7 में प्रावधान नहीं है। पीएससी 2014 की प्रारंभिक परीक्षा देने वाली अनुराधा अग्रवाल और रामकुमार गुप्ता ने दिव्यांग कोटे से प्रारंभिक परीक्षा दी, लेकिन 33 फीसदी से कम अंक होने के कारण उन्हें मुख्य परीक्षा से वंचित कर दिया गया। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। इसमें कहा था कि दिव्यांगों के लिए आरक्षण का प्रावधान होने के कारण उन्हें भी न्यूनतम अंकों में छूट मिलनी चाहिए। इसमें से अनुराधा अग्रवाल ने हाईकोर्ट में पूर्व में याचिका लगाई थी। हाईकोर्ट ने याचिका तो खारिज कर दी थी, लेकिन उसे नियम की वैधता को लेकर पीएससी के समक्ष आवेदन पेश करने की छूट दी थी।

3 फीसदी कोटा से ज्यादा लाभ नहीं पा सकते

हाईकोर्ट ने अपील पर दिए गए फैसले में कहा है कि सामाजिक न्याय के उद्देश्य से संविधान में एससी, एसटी व ओबीसी आरक्षण का प्रावधान किया गया है, जबकि शारीरिक रूप से नि:शक्त लोगों को सरकारी नौकरियों में अवसर देने के उद्देश्य से 1995 में एक्ट पारित किया गया।

एक्ट के तहत सरकारी नौकरियों में 3 फीसदी का प्रावधान किया गया है। दिव्यांगों में से कई अनारक्षित वर्ग से होने के साथ समृद्ध परिवारों से होते हैं, ऐसे में वे एक्ट में निर्धारित 3 फीसदी से ज्यादा छूट की मांग नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने इस आधार पर अपील खारिज कर दी है।

Posted By: Bhupendra Singh