FD से ज्यादा रिटर्न के चक्कर में डूबा न लें पैसा! बैंक डेट में निवेश से पहले समझ लें ये 3 बड़े रिस्क
FD vs Bank Debt: बैंक डेट में निवेश से पहले उसके जोखिमों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि यह एफडी जितना ...और पढ़ें

FD से ज्यादा रिटर्न के चक्कर में डूबा न लें पैसा! बैंक डेट में निवेश से पहले समझ लें ये 3 बड़े रिस्क
HighLights
बैंक डेट में परिपक्वता तिथि निश्चित नहीं होती।
बैंक ब्याज भुगतान रोकने का अधिकार रखता है।
वित्तीय संकट में मूलधन डूबने का खतरा।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। जब भी बैंक का नाम आता है तो निवेशकों के मन में एक ही बात आती है, कि बैंक में तो पैसा पूरी तरह सुरक्षित रहता है। इसी वजह से लोग बैंक से जुड़े दूसरे ऑप्शन जैसे बैंक डेट (Bank Debt) में भी पैसे लगा देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कई बार बैंक डेट में लगाया हुआ पूरा पैसा डूब सकता है?
हाल ही मैं बैंकों के ₹8415 करोड़ के AT-1 बॉन्ड्स (एडिशनल टियर-1 बॉन्ड्स) के डूबने या राइट-ऑफ होने के मामलों ने एक बार फिर सबको चौंका दिया। जिससे ये साफ पता चलता है कि बैंक डेट में मिलने वाला ज्यादा रिटर्न कभी भी फ्री में नहीं मिलता। इसके पीछे रिस्क होता है, जिससे आपकी पूरी कमाई भी डूब सकती है। इसलिए ये जानना बहुत जरूरी है कि एफडी और बैंक डेट में क्या अंतर है और कौन से निवेश कितना सुरक्षित है।
FD vs Bank Debt:
जब आप बैंक में एफडी कराते हैं, तो आप बैंक के एक आम डिपॉजिटर होते हैं। सरकार के नियम (DICGC) के तहत आपकी 5 लाख रुपये तक की रकम पूरी तरह इंश्योर्ड (सुरक्षित) होती है। बैंक पर संकट आने पर भी सबसे पहले डिपॉजिटर्स का पैसा ही चुकाया जाता है। लेकिन जब आप बैंक डेट में पैसा लगाते हैं, तो आप सिर्फ डिपॉजिटर नहीं बल्कि 'क्वासी-इक्विटी इन्वेस्टर' (यानी एक तरह से शेयरधारक) बन जाते हैं। यानी रिस्क सीधे आपके सिर पर होता है।
बैंक डेट की 3 शर्तें:
अगर आप बैंक डेट में निवेश करने के बारे में सोच रहे हैं, तो ये 3 शर्तों के बारे में जरूर पता होना चाहिए:
1. तय समय सीमा का न होना
इन बॉन्ड्स की कोई फिक्स मैच्योरिटी डेट (परिपक्वता तिथि) नहीं होती। इसका मतलब है कि बैंक चाहे तो 5 या 10 साल बाद अपना पैसा वापस ले सकता है (कॉल ऑप्शन), लेकिन आप अपनी मर्जी से बैंक से अपना पैसा वापस नहीं मांग सकते।
2. ब्याज रोकने की पूरी छूट
अगर किसी साल बैंक का मुनाफा कम हो जाता है या उसका कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो (CAR) तय लिमिट से नीचे चला जाता है, तो बैंक के पास पूरा अधिकार होता है कि वह उस साल का ब्याज (कूपन) देने से साफ मना कर सके। सबसे बुरी बात यह है कि ये कटा हुआ ब्याज बाद में भी आपको वापस नहीं मिलेगा। जिसका मतलब है कि बैंक एफडी में निवेश करने पर कोई तय ब्याज नहीं मिलता है।
3. मूलधन डूबने का खतरा
अगर बैंक गंभीर वित्तीय संकट में फंस जाता है और आरबीआई (RBI) को लगता है कि बैंक को उबारने के लिए रीस्ट्रक्चरिंग जरूरी है, तो इन बॉन्ड्स की पूरी वैल्यू को जीरो किया जा सकता है। यानी आपकी गाढ़ी कमाई एक ही झटके में पूरी तरह डूब सकती है।
क्यों बेचे जाते हैं ऐसे रिस्की प्रोडक्ट्स?
ज्यादातर मामलों में रिटेल और बड़े निवेशकों को ये बॉन्ड्स ये कहकर बेच दिए जाते हैं कि ये बैंक का ही प्रोडक्ट है और बैंक कभी डूब नहीं सकते। लेकिन बैंकिंग इतिहास गवाह है कि जब भी बैंक संकट में आते हैं, तो रेगुलेटर सबसे पहले इक्विटी और ऐसे सबऑर्डिनेटेड डेट (बॉन्ड्स) का इस्तेमाल नुकसान की भरपाई के लिए करता है ताकि आम एफडी खाताधारकों का पैसा सुरक्षित बचाया जा सके।
