नई दिल्ली (संजय सिंह)। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से परेशान सरकार ने देश में जैव ईंधन खासकर मेथनॉल के उत्पादन को बढ़ावा देने का रोडमैप तैयार कर लिया है। इसके तहत देश में एथनाल उत्पादन संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। इसकी जिम्मेदारी पेट्रोलियम कंपनियों को सौंपी जाएंगी। तेल कंपनियां मेथनॉल उत्पादन के लिए बेकार कोयले, धान की पराली, गन्ने की खोई तथा बांस का उपयोग करेंगी तथा पेट्रोल, डीजल के साथ-साथ मेथनॉल की भी बिक्री करेंगी।

इसके लिए केंद्रीय सड़क मंत्रालय की पहल पर नीति आयोग द्वारा तैयार रोडमैप पर पेट्रोलियम तथा वित्त मंत्रालय में चर्चाएं तेज हो गई हैं। नीति आयोग की ओर से नियुक्त एजेंसी ने भारत में मेथनॉल के उत्पादन एवं बिक्री का जिम्मा तेल कंपनियों पर डालने का सुझाव दिया गया है। इससे मेथनॉल की मार्केटिंग व बिक्री के लिए अलग इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि पेट्रोल पंपों के माध्यम से मेथनॉल की बिक्री भी उसी तरह संभव है जैसे पेट्रोल और डीजल की होती है। तेल कंपनियों को केवल मेथनॉल उत्पादन के नए संयंत्र लगाने होंगे और उन पर निवेश करना होगा। इसके लिए सरकार 5000 करोड़ रुपये की शुरुआती पूंजी से एक विशेष कोष बनाने पर विचार कर रही है। अभी भारत में 4.7 लाख टन मेथनॉल उत्पादन क्षमता है। लेकिन उत्पादन केवल दो लाख टन होता है। इसके मुकाबले 2016 में ही देश में मेथनॉल की कुल खपत 18 लाख टन पहुंच चुकी थी। इस मांग को पूरा करने के लिए सरकार देश में 30-40 लाख टन मेथनॉल उत्पादन क्षमता स्थापित करना चाहती है।1

एजेंसी ने सबसे ज्यादा चार मेथनॉल संयंत्र झारखंड में लगाने का सुझाव दिया है। जबकि छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में दो-दो तथा मध्य प्रदेश और तेलंगाना में एक-एक संयंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब और असम में भी एक-एक संयंत्र लगाने का सुझाव दिया गया है। ये वे राज्य हैं जहां कोयला, धान अथवा गन्ने का उत्पादन होता है और बड़े पैमाने पर बेकार कोयला, पराली, खोई तथा बांस की प्रचुर उपलब्धता है। चीन, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देश अपने यहां न केवल बड़े पैमाने पर मेथनॉल का उत्पादन कर रहे हैं, बल्कि वाहनों में इसका सफलतापूर्वक उपयोग भी कर रहे है। चीन में 40 फीसद, जबकि ऑस्ट्रेलिया में 20 फीसद तक मेथनॉल का उपयोग होता है।

कृषि प्रधान देश होने के नाते भारत में भी मेथनॉल उत्पादन के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हैं। सरकार का मानना है कि इनके दोहन और प्रोत्साहन के जरिये न केवल पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है, बल्कि पर्यावरण की बिगड़ी सेहत भी सुधारी जा सकती है।

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Posted By: Surbhi Jain