नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। अनचाही कॉल को लेकर पिछले हफ्ते टेलीकॉम नियामक ट्राई द्वारा जारी नए नियम अगर लागू होते हैं, तो छह महीने बाद देश में अमेरिकी टेक्नोलॉजी दिग्गज एप्पल के आइफोन की घंटी बजनी बंद हो सकती है। इससे आइफोन उपयोग करने वाले करोड़ों उपभोक्ता सीधे प्रभावित होंगे। यह मामला क्या है? क्या वाकई देश में आइफोन के अस्तित्व पर संकट है या भारत जैसे बड़े और महत्वपूर्ण बाजार की संभावनाओं का लाभ उठाने के लिए एपल लचीला रुख अपनाएगी? पूरे घटनाक्रम पर एक नजर:

सवाल: ट्राई-एपल विवाद की जड़ क्या है?

ट्राई द्वारा विकसित डीएनडी-2.0। इसे अनचाही कॉल और मैसेज को प्रतिबंधित करने के लिए विकसित किया गया है। अनचाही कॉल्स और मैसेज को रोकने के लिए ट्राई ने पिछले हफ्ते जारी नियमों में कहा है कि जो मोबाइल हैंडसेट उसके डीएनडी एप को सपोर्ट नहीं करते, उन्हें छह महीनों में बंद किया जाए। देश में ऐसे हैंडसेट सिर्फ एपल के आइफोन हैं। बाकी हैंडसेट गूगल के एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलते हैं, जिसके गूगल प्ले स्टोर पर यह एप उपलब्ध है।

सवाल: आखिर एपल इस एप को अपने आइओएस आइ-स्टोर में जगह क्यों नहीं देना चाहती?

वजह है ग्राहकों की निजता और गोपनीय सूचनाओं के साथ संभावित समझौता। यह जगजाहिर है कि एपल अपने आइफोन के ग्राहकों की मोबाइल डाटा गोपनीयता संबंधी मामलों को बेहद गंभीरता से लेती है। इसलिए वह अपने आइओएस यानी आइफोन ऑपरेटिंग सिस्टम के आइ-स्टोर पर मौजूद एप्लीकेशंस को ग्राहकों की निजी सूचनाओं तक बहुत कम पहुंच मुहैया कराती है। ग्राहकों की निजता एपल के लिए इतना बड़ा मसला है, कि हत्या के एक मामले में वह अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआइ तक को एक हैंडसेट अनलॉक करने से मना कर चुकी है। एपल का कहना है कि ट्राई का नया एप ग्राहकों की कॉल डिटेल और मैसेज जैसी निजी गोपनीय सूचनाएं पढ़ता है, लिहाजा वह इस एप को आइ-स्टोर में जगह नहीं दे सकती।

 

सवाल: ट्राई का इस विवाद पर क्या कहना है?

ट्राई ने स्पष्ट किया है कि उसके लिए टेलीकॉम ग्राहकों की सुविधा सवरेपरि है। ट्राई के चेयरमैन आरएस शर्मा ने कहा है कि ग्राहकों की निजता और गोपनीयता को लेकर संस्था भी बेहद सजग और सतर्क है, और उसके पिछले कुछ आदेश-निर्देश इस बात की गवाही हैं। फिलहाल संस्था अपनी शर्तो में ढील देने के मूड में नहीं दिख रही है।

सवाल: क्या इस विवाद को टालने का कोई रास्ता है?

तीन रास्ते हैं। पहला, ट्राई अपनी शर्तो में लचीलापन लाए और एपल को ग्राहकों की निजता और गोपनीयता सुरक्षित रखने की उसकी कोशिशों के बीच ही अनचाही कॉल्स को रोकने का प्रभावी और मान्य रास्ता निकालने को कहे। दूसरा, ट्राई के नए नियमों को एप्पल स्वीकार करे और आइफोन में तकनीकी स्तर पर कुछ बदलाव करे। हालांकि एपल कह चुकी है कि अनचाही कॉल्स को रोकने के लिए उसने आइओएस में कुछ सुधार किए हैं, जो इस वर्ष सितंबर से प्रभावी हो जाएंगे। तीसरा रास्ता अदालत की शरण में जाने का है। इस मामले में एपल के पक्ष में कुछ अन्य मोबाइल हैंडसेट निर्माता कंपनियां भी खड़ी दिख रही हैं, जिनका मानना है कि ट्राई का नया फरमान उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर का है। हालांकि शर्मा इस दलील को खारिज कर चुके हैं।

सवाल: तो क्या देश में आइफोन की घंटी बजनी बंद हो जाएगी?

छह महीनों तक तो नहीं। इस बीच अगर ट्राई और एपल ने विवाद सुलझा लिए, तो देश में आइफोन के अस्तित्व पर कोई संकट नहीं है। वैसे, केंद्र सरकार जिस तरह से एपल को भारत में उत्पादन के लिए प्रोत्साहित कर रही है और अमेरिका-चीन ट्रेड वार जिस तरह गहरा रहा है, उसे देखते हुए एप्पल भारत में अपनी निवेश योजना को तेजी से अमली जामा पहनाने की कोशिश करेगी। इसे देखते हुए नहीं लगता कि कंपनी को इतनी सख्त नियामकीय उलझनों से गुजरना होगा कि उसकी निवेश योजना खटाई में पड़े।

Posted By: Surbhi Jain

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