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SEBI ने उठाया बड़ा कदम! म्यूचुअल फंड में 'डायरेक्ट प्लान' को बनाया गया डिफॉल्ट, निवेशकों को होगा फायदा

Published: Fri, 30 Oct 2026 12:05 PM (IST)

SEBI ने 1 नवंबर 2026 से म्यूचुअल फंड के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 'डायरेक्ट प्लान' को डिफॉल्ट विकल्प बनाने का निर्णय ...और पढ़ें

SEBI ने उठाया बड़ा कदम! म्यूचुअल फंड में 'डायरेक्ट प्लान' को बनाया गया डिफॉल्ट, निवेशकों को होगा फायदा

SEBI ने उठाया बड़ा कदम! म्यूचुअल फंड में 'डायरेक्ट प्लान' को बनाया गया डिफॉल्ट, निवेशकों को होगा फायदा

HighLights

  1. 1 नवंबर 2026 से डायरेक्ट प्लान बनेगा डिफॉल्ट विकल्प।

  2. निवेशकों को खर्चों में मिलेगी अधिक पारदर्शिता और स्पष्टता।

  3. डायरेक्ट और रेगुलर प्लान का अंतर समझना होगा आसान।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। अगर आप भी म्यूचुअल फंड (Investment in Mutual Fund) में पैसे लगाते हैं, तो आपके लिए काम की खबर है। 1 नवंबर 2026 से म्यूचुअल फंड से जुड़े नियमों में कुछ बड़े बदलाव होने जा रहे हैं। सेबी चीफ तुहिन कांत पांडे ने एक कार्यक्रम में साफ किया है कि अब म्यूचुअल फंड कंपनियों के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 'डायरेक्ट प्लान' (Direct Plan) को डिफॉल्ट ऑप्शन बनाया जाएगा।

इसका सीधा मतलब ये है कि अब जब भी आप एप या वेबसाइट पर निवेश करने जाएंगे, तो आपको सबसे पहले डायरेक्ट प्लान ही दिखाई देगा। वहीं, अगर आप रेगुलर प्लान चुनेंगे, तो आपको ये भी बताएगा जाएगा कि इसमें डायरेक्ट प्लान के मुकाबले खर्च ज्यादा लग रहा है।

डायरेक्ट और रेगुलर प्लान में क्या फर्क है?

जब भी आप म्यूचुअल फंड में इनवेस्ट करते हैं, तो इसमें आप डायरेक्ट और रेगुलर प्लान चुन सकते हैं। डायरेक्ट प्लान में आप सीधे म्यूचुअल फंड कंपनी के पास जाकर निवेश करते हैं। बीच में कोई एजेंट या डिस्ट्रीब्यूटर नहीं होता, इसलिए किसी को कमीशन नहीं देना पड़ता। रेगुलर प्लान में आप किसी एजेंट या डिस्ट्रीब्यूटर के जरिए निवेश करते हैं। एजेंट का कमीशन जुड़ने की वजह से इसका 'एक्सपेंस रेशियो' (खर्च) थोड़ा ज्यादा होता है।

एक्सपेंस रेशियो से कितना फर्क पड़ेगा?

एक्सपेंस रेशियो वो फीस होती है जो म्यूचुअल फंड कंपनियां आपके पैसे को मैनेज करने के लिए लेती हैं। ऐसे में ये सीधे आपके फंड के रिटर्न पर असर डालती है। डायरेक्ट प्लान चुनने का मतलब है कि अपने निवेश के फैसले आपको खुद लेने होंगे, जबकि रेगुलर प्लान में आपको एजेंट या डिस्ट्रीब्यूटर की सलाह मिल जाती है। SEBI ने ये कदम इसलिए उठाया है ताकि निवेशकों को खर्चों का पूरा हिसाब साफ-साफ पता चल सके और वे समझदारी से फैसला ले सकें।

(डिस्क्लेमर: यह जानकारी केवल पढ़ने और समझने के लिए है। बाजार के हालात बदलते रहते हैं, इसलिए निवेश से जुड़ा कोई भी बड़ा फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार (Financial Advisor) से बातचीत जरूर कर लें।)

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