कुछ दिन पहले केंद्र सरकार ईपीएफ संबंधी उस फैसले को वापस लेने पर मजबूर हुई जो उसने फरवरी में घोषित किया था। इस नियम के तहत कर्मचारी सिर्फ उसी धनराशि को निकाल सकेंगे जिसका अंशदान उन्होंने किया है और जिस पर उन्हें ब्याज मिला है। उनके ईपीएफ खाते में नियोक्ता की ओर से किए गए योगदान तथा उस पर मिले ब्याज को 58 वर्ष की उम्र तक छूआ भी नहीं जा सकेगा। प्रथम दृष्टया यह तार्किक निर्णय लगता है।

सिद्धांत के तौर पर ईपीएफ रिटायरमेंट के लिए बचत के तौर पर माना जाता है। सिर्फ अपवाद की स्थिति जैसे बच्चे की शादी या गंभीर बीमारी के इलाज जैसी घटनाओं के समय ही ईपीएफ की धनराशि निकाली जा सकती है।

हालांकि इस योजना का इरादा बिल्कुल सही था, लेकिन इससे देश में काफी विरोध का माहौल खड़ा हो गया। बेंगलुरु में तो गारमेंट मजदूरों र्ने ंहसक प्रदर्शन भी किए जिसके बाद सरकार को यह नियम वापस लेना पड़ा। गारमेंट मजदूरों का मामला तथा उनका प्रदर्शन अपने आप में इस नियम की कमियों की ओर इशारा करता है। ज्यादातर प्रदर्शनकारी ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं थीं। आम तौर पर देखा गया है कि महिलाएं अपनी किशोरावस्था में किसी गारमेंट कंपनी के साथ काम करती हैं। वे लगभग एक दशक तक नौकरी करती हैं। उसके बाद शादी होते ही नौकरी छोड़ देती हैं। इस तरह जब वे नौकरी छोड़ती हैं तो उसके दो महीने बाद ईपीएफ की पूरी धनराशि निकाल लेती हैं जिससे वे शादी के बाद घर का खर्च चला सकें। ईपीएफ का इस तरह का इस्तेमाल देशभर में आम बात है।

ऐसे में सरकार अगर किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो कि अपने ईपीएफ के भरोसे कोई काम करना चाहता है, यह बताती है कि आप अगले 30 से 35 साल तक इसकी आधी धनराशि को हाथ नहीं लगा सकते तो हिंसक प्रदर्शनों का सामना करना पड़ेगा। निश्चित तौर पर लोग इस तरह का प्रदर्शन करेंगे।

यहां मूल मुद्दा इस विशेष मामले का ब्योरा जानना नहीं है बल्कि नॉर्थ ब्लॉक में बैठे उन लोगों की ओर ध्यान दिलाना है जो नियम कानून बनाते हैं लेकिन वे लोगों के जीवन की जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं हैं। उन्हें शायद इस बात का अहसास नहीं है कि उनके नियम लोगों के जीवन पर किस प्रकार से प्रभाव डालेंगे। उनकी कलम से लिखे एक शब्द मात्र से लोगों की वह वित्तीय योजना ध्वस्त हो जाती है जिस पर वे दशकों से काम कर रहे हैं। जब आप कॉरपोरेट टैक्स के संबंध में पूर्व प्रभाव से बदलाव करते हैं। कोई नियम पूर्व प्रभाव से लागू करते हैं तो वोडाफोन जैसी कंपनियां अदालत में मुकदमा दायर करती हैं लेकिन जब आप ईपीएफ के मामले में कोई नियम पूर्व प्रभाव से लागू करते हैं तो लोग सड़कों पर प्रदर्शन करते हैं। बसें जलाते हैं। अगर कोई व्यक्ति सीखना चाहे तो इससे सीख ले सकता है।

धीरेंद्र कुमार

Posted By: Babita Kashyap