नई दिल्ली, धीरेंद्र कुमार। बहुत से लोग बचत करते हैं और बहुत से नहीं कर पाते। इसका निवेश से कोई लेनादेना नहीं है। बहुत से लोग ऐसे हैं, जो और कुछ करें या ना करें, लेकिन बचत नियम से करते हैं। बहुत ऐसे भी हैं जिनका ऐसे किसी नियम से कोई लेनादेना नहीं। एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि बचत का कमाई कम या ज्यादा होने से कोई संबंध नहीं, यह विशुद्ध रूप से आदत से जुड़ा हुआ मामला है। और आदतों को बदलना आसान नहीं होता। लेकिन यह सच है कि छोटी-छोटी आदतें ही कमाल के नतीजे दे जाती हैं। जहां तक बचत का सवाल है, तो चुनौतीपूर्ण दौर के लिए इससे बेहतर मददगार और कुछ नहीं हो सकता है। 

ऐसा क्यों है कि कुछ लोग बचत करने में सफल हो जाते हैं और दूसरे बहुत से लोग ऐसा नहीं कर पाते हैं। यहां गौर करने वाली बात यह है कि मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कुछ लोग क्यों सफल निवेशक हैं और कुछ लोग सफल निवेशक क्यों नहीं हैं। मैं यह कह रहा हूं कि क्यों कुछ लोग बचत कर लेते हैं और कुछ लोग बचत नहीं करते हैं। और अगर बचत करते भी हैं तो यह पीएफ, एनपीएस या टैक्स बचाने जैसे मदों में करते हैं। ऐसा करना उनकी मजबूरी होती है। बचत करना उनकी चॉयस, उनकी पसंद में नहीं आता। यह सब आपने भी जरूर देखा होगा। किसी के लिए बचत एक तरह का अलिखित नियम है, जिसे वे कभी नहीं तोड़ना चाहते।  

दूसरे बहुत से लोगों के लिए ऐसा कुछ भी नहीं है। मुझे पता है कि आप इसके कई कारण बता सकते हैं और मैं भी ऐसा कर सकता हूं। बहुत से कारण सही भी हो सकते हैं और बहुत से नहीं भी। यह भी संभव है कि इसके अलग-अलग कारण हों जो अलग-अलग लोगों पर लागू होते हों। लेकिन इन बातों का कोई खास मतलब नहीं है। और यह बहुत दिलचस्प भी नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि क्या बचत न करने वालों को बचत करने वालों में बदला जा सकता है। यह जानना दिलचस्प है कि हममें से बचत न करने वाले जब अपनी इस आदत के बारे में जान पाते हैं तो वे क्या करते हैं। क्या वे इस आदत को सुधारने का प्रयास करते हैं? काफी लंबे समय से चली आ रही आदत को छोड़ना आसान नहीं होता है। और यह एक आदत है।  

अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि बचत न करने की आदत और स्मोकिंग की आदत में काफी बाते समान हो सकती हैं। और बचत न करने की आदत का वित्तीय मामलों से ज्यादा लेनादेना नहीं है। इसका मतलब है कि हम जिस चीज के बारे में बात कर रहे हैं, उसका संबंध मानवीय व्यवहार और मनोविज्ञान से ज्यादा है। इसलिए कुल मिलाकर देखें तो यह एक आदत को छोड़ने और दूसरी को पकड़ने के बारे में है।  

कंपाउंडिंग रिटर्न और एसआइपी ग्रोथ का ग्राफ तैयार करना उन लोगों के काम का तो है जो पहले से बचत कर रहे हैं। लेकिन इससे बचत न करने वालों को बचत करने वालों में बदल पाने ने में खास मदद नहीं मिलती है। जहां तक किसी चीज की आदत डालने की बात है तो मनोवैज्ञानिकों से लेकर सेल्फ हेल्प पर किताबें लिखने वालों तक ने इस पर काफी ध्यान दिया है। यहां सेल्फ हेल्प पर किताबें लिखने वालों का जिक्र आपको कुछ अजीब लग सकता है। लेकिन मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि सेल्फ हेल्प पर लिखी गई किताबों से मदद मिलती है। कुछ वर्ष पहले मैंने एक किताब के बारे में लिखा था। किताब का नाम था - द पावर ऑफ हैबिट। इस किताब के लेखक का नाम है चा‌र्ल्स दुहिग। किताब में छोटी कहानी और विज्ञान के जरिये यह बताया गया है कि किस तरह से हमारा रोजमर्रा का व्यवहार ज्यादातर मामलों में कोई आदत होने या न होने से तय होता है। किताब में इस बात की पड़ताल भी गहराई से की गई है कि आदत से कैसे बनती है और कैसे बदलती है। और कैसे जान-बूझकर किसी आदत को अपनाया जा सकता है। दुहिग की किताब ने मुझे यह मानने के लिए तैयार कर लिया कि आम तौर पर बचत करना एक चॉयस का नहीं, बल्कि आदत का मामला है।  

कुछ ही समय पहले मैंने एक और किताब पढ़ी। यह किताब समाज विज्ञानी बीजे फॉग ने लिखी है। फॉग स्टैनफोर्ड परसुएसिव टेक्नोलॉजी लैब के संस्थापक और निदेशक हैं। बाद में इसका नाम बदलकर विहेवियर डिजाइन लैब कर दिया गया। फॉग ने एक शानदार किताब लिखी है, जिसका नाम है टाइनी हैबिट्स। किताब में जान-बूझकर कोई आदत अपनाने की प्रक्रिया के बारे में गहराई से बात की गई है। यह बात सही है कि किताब में जो कहानी और उदाहरण दिए गए हैं वे इसी तरह के हैं कि लोग किस तरह से कोई आदत डालने या कोई आदत छोड़ने में असहज महसूस करते हैं। हालांकि फॉग ने किताब में जो बातें कहीं हैं वे किसी व्यक्ति के पर्सनल फाइनेंस व्यवहार को बदलने में काफी सटीक बैठती हैं।  

यहां पर यह बताना मुश्किल है कि फॉग ने इसके लिए क्या तरीका बताया है। हालांकि फॉग ने व्यवहार बदलने के तीन तरीके बताएं हैं। पहला है कि कोई ईश्वयरीय चमकार हो जाए। दूसरा तरीका है कि माहौल में बदलाव आ जाए। और तीसरा तरीका है कि छोटी आदतें पैदा करें। अब यह तो साफ ही है कि इन तीनों तरीकों में से कौन सा तरीका आसानी से अपनाया जा सकता है। बचत न करने वालों के लिए इसका बहुत आसान मतलब है कि उनको बस बचत शुरू करनी है। अगर आप मेरा कॉलम पढ़ते रहें हैं तो आपको शायद यह भी पता होगा कि पहली आदत एसआइपी के जरिये छोटी रकम का निवेश शुरू करते हुए डालनी चाहिए। जिन लोगों ने अब तक ऐसा नहीं किया है उनके लिए यह विश्वास करना मुश्किल है कि किस तरह से एक छोटा बदलाव बड़े बदलाव का रास्ता तैयार करता है। छोटी आदतें बहुत मदद कर सकती हैं। 

(लेखक वैल्यू रिसर्च के सीईओ हैं। प्रकाशित विचार लेखक के निजी हैं।)

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