नई दिल्‍ली, राजीव सिंह। देश में अर्थव्यवस्था से जुड़े जो भी आंकड़े सामने आ रहे हैं वह विकास की धीमी चाल की ओर साफ इशारा कर रहे हैं। हाल में औद्योगिक उत्पादन, वाहन बिक्री और वित्तीय संस्थानों के ऋण वितरण में गिरावट आर्थिक संकट की पुष्टि करते हैं। इस स्थिति में सिर्फ इस बात को लेकर खुश नहीं रहा जा सकता है कि भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति के साथ वृद्धि हासिल कर रहा है। इस मामले में हमने अपने पड़ोसी देश चीन को भले ही पछाड़ दिया है लेकिन घरेलू बाजार में मौजूदा हालात ठीक नहीं हैं। ऊंची आर्थिक वृद्धि दर का असर जमीन पर भी दिखना चाहिए जो फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।

इसमें कोई दोराय नहीं कि वैश्विक स्तर पर मंदी की आहट के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था करीब सात फीसद की दर से आगे बढ़ रही है जिसे संतोषजनक कहा जा सकता है। लेकिन सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने और 2024 तक अर्थव्यवस्था को पांच खरब डालर की बनाने जैसे जो लक्ष्य रखे हैं क्या उन्हें हासिल किया जा सकता है? मौजूदा स्थिति में तो यह संभव होता नहीं दिख रहा है। यदि मोदी सरकार को न्यू इंडिया का सपना पूरा करना है तो इसके लिए आर्थिक मोर्चे पर अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। आम करदाताओं और निवेशकों पर सिर्फ टैक्स का बोझ बढ़ाने से कोई बड़ा लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) पर यह फॉर्मूला लागू करने के परिणाम जग जाहिर हैं। बजट के बाद से विदेशी निवेशक पूंजी बाजार में लगातार बिकवाली करके ज्यादा कमाई के लिए दूसरे देशों में पैसा लगा रहे हैं। शेयर बाजार में गिरावट की मार से पिछले करीब डेढ़ माह में निवेशकों की 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की मेहनत की कमाई डूब चुकी है।

दरअसल, सरकार ने बजट में पूंजी बाजार के संदर्भ में जो प्रावधान किए थे वह मौजूदा परिदृश्य में उचित नहीं थे। उद्योग जगत ने इनके नकारात्मक प्रभावों के बारे में सरकार को अच्छी तरह से अवगत करा दिया था लेकिन इस मुद्दे पर सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं हुई। अब काफी कुछ हाथ से निकल जाने के बाद वह बातचीत को तैयार हुई है। हालांकि, इस दिशा में अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है लेकिन निवेशकों के बीच एक सकारात्मक संदेश जरूर गया है। इससे बाजार धारणा में कुछ मजबूती आई है। पुराने अनुभवों को देखते हुए सरकार को कभी लकीर का फकीर नहीं बनना चाहिए। हमेशा इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि जो भी फैसले लिए जाते हैं जरूरी नहीं है कि वह सभी कारगर साबित हों। यदि समय के मुताबिक उनमें बदलाव कर लिया जाए तो इसे अपनी नाक का सवाल नहीं बनाना चाहिए। 

जीएसटी के मामले में सरकार की जितनी तारीफ की जाए वह कम है। उद्योग एवं आम जन की समस्या को देखते हुए इस प्रणाली में कई बार बदलाव किए जा चुके हैं। यही वजह है कि व्यापारी वर्ग अब जीएसटी का दिल से समर्थन कर रहा है। सरकार जब इस मोर्चे पर अपना रुख बदल सकती है तो फिर बजट से जुड़े कुछ प्रावधानों को लेकर इतनी सख्त क्यों है, यह समझ से परे है। वित्तीय क्षेत्र और वाहन उद्योग की समस्या अब जग जाहिर हैं। इस बात को सरकार भी स्वीकार कर चुकी है लेकिन इनके जख्मों पर मरहम लगाने का कोई काम नहीं किया गया है।

अर्थशास्त्र का देसी फॉर्मूला है कि जब विकास दर में एक फीसद की वृद्धि हासिल होती है तो बाजार में एक करोड़ नए रोजगार सृजित होते हैं। पिछले पांच साल के कार्यकाल में मोदी सरकार ने रिकार्ड आर्थिक वृद्धि हासिल करने का दावा किया है। ऐसे में सवाल यह है कि जब तेज गति से विकास हो रहा है तो फिर नए रोजगार पैदा क्यों नहीं हो रहे? देश में बेरोजगारों की फौज क्यों बढ़ती जा रही है? 

हकीकत यह है कि रोजगार के मुद्दे पर यह सरकार सबसे ज्यादा बेबश नजर आई है। पिछले दिनों जारी सरकारी आंकड़ों में देश में बेरोजगारी की दर पिछले चार दशक के ज्यादा की अवधि में सबसे ऊंची दर्ज हुई है। आने वाले दिनों में यह समस्या और भयावह होती दिख रही है। उद्योग जगत में सुस्त मांग की वजह से चारों ओर छंटनी का दौर चल रहा है। वाहन उद्योग में यह संकट खतरे की घंटी की ओर इशारा कर रहा है। इस उद्योग में कुल मिलाकर एक करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। वाहनों की मांग में कमी की वजह से तमाम कंपनियां अब अपने उत्पादन में कटौती कर रह रही हैं।

जाहिर तौर पर वाहन उद्योग में बड़े पैमाने पर छंटनी की जा रही है। वाहनों की बिक्री में भारी गिरावट के बीच देशभर में वाहन डीलर बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छंटनी कर रहे हैं। उद्योग संगठन फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (फाडा) की रिपोर्ट बताती है कि पिछले तीन माह के दौरान खुदरा विक्रेताओं ने करीब दो लाख कर्मचारियों को नौकरी से बाहर निकाला। निकट भविष्य में स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं दिख रही है। स्थिति यह है कि इस साल अप्रैल तक पिछले 18 माह की अवधि में देश के 271 शहरों में 286 शोरूम बंद हो चुके हैं जिसमें 32,000 लोगों की नौकरी गई थी। दो लाख नौकरियों की यह कटौती इसके अतिरिक्त है। इस तरह पिछले डेढ़ साल में करीब 3.5 लाख नौकरियां जा चुकी हैं। चिंता की बात यह है कि अच्छे चुनावी परिणाम और बजट के बावजूद वाहन क्षेत्र की सुस्ती दूर नहीं हो पाई है। इस वजह से और शोरूम बंद होने का संकट बना हुआ है। फिलहाल ज्यादातर छंटनियां फ्रंट और बिक्री केंद्रों में हो रही हैं लेकिन सुस्ती का यह रुख यदि जारी रहता है तो तकनीकी नौकरियां भी प्रभावित होंगी। यह तो महज बानगी है। 

देश के अन्य उद्योगों की भी कमोबेश यही स्थिति है। समग्र औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) के आंकड़े संकट की कहानी को साफ बयां कर रहे हैं। जून में औद्योगिक उत्पादन की वृद्धि दर दो फीसद पर सिमट गई। इस दौरान पिछले साल इस अवधि में यह आंकड़ा सात फीसद के स्तर पर था। इस साल खनन और विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा है। ये दोनों क्षेत्र रोजगार के प्रमुख केंद्र हैं। इससे साफ जाहिर होता आर्थिक मोच्रे पर समस्याएं कोई मामूली नहीं हैं।

दरअसल, समस्या की मूल वजह ग्रामीण क्षेत्र की मांग में कमी है। बार-बार बंटवारा होने से खेती लाभकारी नहीं रह गई है। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को ग्रामीण क्षेत्रों में लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास करना चाहिए। यदि ग्रामीणों की आय बढ़ती है तो इससे एक साथ कई समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है। कर्ज माफी, सब्सिडी और नकद सहायता किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकते। यदि ग्रामीणों को सिर्फ वोट बैंक के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा तो आने वाले दिनों में इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। ऐसे में समय की दरकार है कि सरकार को आर्थिक मोर्चे पर अपनी रणनीति में बदलाव करना चाहिए। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।

(लेखक कार्वी स्टाक ब्रोकिंग के सीईओ हैं। प्रकाशित विचार उनके निजी हैं।)

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप

Posted By: Manish Mishra

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप