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350 नहीं सिर्फ 90 डॉलर में इराक पहुंच रहा भारतीय बासमती! मिडिल-ईस्ट तनाव के बीच मिला नया तरीका, हर टन में $260 की बचत

Published: Mon, 12 Oct 2026 06:22 PM (IST)Updated: Mon, 12 Oct 2026 07:01 PM (IST)

मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारतीय चावल निर्यातकों ने इराक को बासमती चावल भेजने के लिए नया तरीका खोजा है। ...और पढ़ें

इकार को चावल बेचने का नया तरीका

इकार को चावल बेचने का नया तरीका

HighLights

  1. इराक को बासमती चावल भेजने का नया तरीका

  2. माल ढुलाई लागत $350 से $90 प्रति टन हुई

  3. थोक जहाजों से निर्यातकों को प्रति टन $260 की बचत

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| मिडिल ईस्ट में चल रहे तनाव के कारण समुद्री जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे माल की सप्लाई में भी मुश्किलें देखी गई हैं। भारत के चावल निर्यातकों ने पश्चिम एशिया में बढ़ती माल ढुलाई लागत और कंटेनरों की कमी से निपटने के लिए नया रास्ता निकाला है। भारतीय चावल निर्यातक महासंघ (IREF) ने सिंगापुर की कंपनी Eximwala Solutions Pte. Ltd. के साथ मिलकर इराक को 1,02,210 टन बासमती चावल भेजने की व्यवस्था की है।

हर टन में 260 डॉलर की बचत

इराक को चावल की सप्लाई के लिए तीन बड़े मालवाहक जहाजों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस व्यवस्था से माल ढुलाई की लागत 350 डॉलर प्रति टन से घटकर करीब 90 डॉलर प्रति टन आने का अनुमान है। यानी निर्यातकों को प्रति टन 260 डॉलर तक की संभावित बचत हो सकती है।

कंटेनरों के बजाय बड़े जहाजों से थोक में चावल भेजने की यह पहल ऐसे समय में की गई है, जब पश्चिम एशिया में शिपिंग से जुड़ी बाधाओं, कंटेनरों की कमी और लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ने से भारतीय निर्यातक परेशान हैं। पश्चिम एशिया भारत के बासमती चावल का सबसे बड़ा क्षेत्रीय बाजार है। ऐसे में माल ढुलाई की लागत कम होने से भारतीय चावल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

तीन जहाजों से इराक भेजा जा रहा चावल

IREF के मुताबिक, तीनों जहाज इराक के उम्म कसर बंदरगाह के लिए निर्धारित किए गए हैं। इनमें MV LAMAR S नाम का जहाज 36,810 टन चावल लेकर बंदरगाह पहुंच चुका है। यह बर्थ नंबर 3 पर लग चुका है और इसमें से चावल उतारने का काम शुरू हो गया है।

बाकी दो जहाजों MV LOLO GATE और MV OUTLANDER को क्रमशः 25,500 टन और 39,900 टन चावल ले जाने के लिए निर्धारित किया गया है। इस तरह तीनों जहाजों के जरिए कुल 1,02,210 टन बासमती चावल भेजने की व्यवस्था की गई है।

IREF के मुताबिक, कंटेनर शिपिंग के लिए करीब 350 डॉलर प्रति टन का कोटेशन मिल रहा था, जबकि थोक जहाजों के जरिए माल ढुलाई की लागत करीब 90 डॉलर प्रति टन रहने का अनुमान है। इस हिसाब से प्रति टन 260 डॉलर की बचत हो सकती है। तीनों जहाजों की पूरी मात्रा पर यह अंतर लागू करने से संभावित सकल बचत करीब 2.66 करोड़ डॉलर बैठती है। हालांकि, वास्तविक बचत अंतिम माल ढुलाई लागत, बंदरगाह शुल्क और कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों पर निर्भर करेगी।

पश्चिम एशिया भारत के बासमती का सबसे बड़ा बाजार

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक IREF के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने पश्चिम एशिया को 45.64 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया। इसकी कीमत ₹34,284 करोड़ रही। यह भारत के कुल बासमती निर्यात की मात्रा का करीब 70% है।

अगर गैर-बासमती चावल को भी शामिल किया जाए, तो पश्चिम एशिया को भारत का कुल चावल निर्यात 56.48 लाख टन रहा, जिसकी कीमत ₹39,657 करोड़ थी। ये आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र में शिपिंग लागत और आपूर्ति व्यवस्था में बदलाव का भारतीय चावल कारोबार पर कितना बड़ा असर पड़ सकता है।

वित्त वर्ष 2025-26 में सऊदी अरब भारत के बासमती चावल का पश्चिम एशिया में सबसे बड़ा बाजार रहा। वहां ₹8,324 करोड़ के बासमती चावल का निर्यात किया गया। इसके बाद ईरान में ₹6,970 करोड़, इराक में ₹5,583 करोड़ और संयुक्त अरब अमीरात में ₹4,132 करोड़ के बासमती चावल का निर्यात हुआ।

IREF के अनुसार, इसी अवधि में इराक ने भारत से करीब 7.64 लाख टन बासमती चावल आयात किया। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए इराक के बाजार का महत्व स्पष्ट होता है। माल ढुलाई की लागत कम होने और भरोसेमंद शिपिंग व्यवस्था से इस बाजार में भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत हो सकती है।

निर्यातकों और खरीदारों को मिल सकता है फायदा

IREF के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देव गर्ग ने मीडिया को बताया कि भारत के बासमती चावल निर्यात का करीब 70% हिस्सा पश्चिम एशिया जाता है। ऐसे में शिपिंग लागत बढ़ने से भारतीय एक्सपोर्टर्स की कॉम्पटीशन क्षमता प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि माल ढुलाई की लागत 350 डॉलर से घटाकर 90 डॉलर प्रति टन करने का लक्ष्य दिखाता है कि बेहतर लॉजिस्टिक्स से भारतीय निर्यातकों और विदेशी खरीदारों, दोनों को फायदा पहुंच सकता है।

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थोक जहाजों से चावल भेजने की व्यवस्था से एक्सपोर्टर्स को अपना मुनाफा बचाने और विदेशी बाजारों में कीमतें प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में मदद मिल सकती है। खासकर उस समय, जब कंटेनर महंगे हों या आसानी से उपलब्ध न हों।

हालांकि, इस मॉडल की सफलता थोक जहाजों की उपलब्धता, बंदरगाह पर माल उतारने के शुल्क, शिपमेंट के समय और खरीदारों की जरूरतों पर निर्भर करेगी। हर खेप के लिए थोक परिवहन उपयुक्त नहीं होगा। इसलिए वास्तविक बचत का आकलन अंतिम लागत और अनुबंध की शर्तों के आधार पर ही किया जा सकेगा।