एक किलो की कीमत ₹2250000000000, इस धातु को खरीदने में बड़े-बड़े अरबपतियों के छूट जाएंगे पसीने! कौन सा है ये मेटल?
सोने और हीरे के बाद दुनिया में एक मेटल ऐसा है जिसकी 1 ग्राम की कीमत लगभग 225 करोड़ रुपये ...और पढ़ें

1 किलो की कीमत ₹2250000000000

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: आमतौर पर हम भारतीय सोने और हीरे को सबसे महंगी धातु समझते हैं लेकिन क्या आपको पता है कि इन दोनों धातुओं के आगे भी एक मेटल है। इस धातु को दुनिया की सबसे महंगी धातु मानी जाती है। आपने अलग-अलग रेडियोएक्टिव मेटल के बारे में सुना होगा लेकिन आज जिसके बारे में हम बताने जा रहे हैं उसकी कीमत आपके होश उड़ा सकती है।
क्या है इस मेटल का नाम?
जिस मेटल की बात हम करे रहे हैं उसका नाम है कैलिफोर्निम 252। यह एक रेडियोएक्टिव मेटल है जिसे दुनिया का सबसे महंगा मेटल माना जाता है। रेडियोएक्टिव मेटल अपने गुणों के लिए जाने जाते हैं और साथ ही इनका उपयोग वैज्ञानिक अलग-अलग रिसर्च के लिए करते हैं। कैलिफोर्नियम-252(Californium-252) दुनिया के सबसे खतरनाक और महंगे रासायनिक तत्वों में से एक है, जो अपनी अत्यधिक न्यूट्रॉन उत्सर्जन क्षमता और भारी कीमत के लिए जाना जाता है।
इसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगभग 2.7 करोड़ डॉलर यानी करीब 220 से 225 करोड़ रुपये प्रति ग्राम तक होती है। वही कैलिफोर्नियम-252 के एक किलो की कीमत ₹2250000000000 यानी 2.25 लाख करोड़ रुपये होगी।
क्या होता है कैलिफोर्नियम-252?
यह एक सिंथेटिक रेडियोएक्टिव मेटल है। यह सामान्य रुप से प्रकृति में नहीं पाया जाता है। इसे परमाणु रिएक्टरों में क्यूरियम जैसे तत्वों पर न्यूट्रॉन की बमबारी करके आर्टिफिशियल रूप से बनाया जाता है। इसके साथ ही बता दें कि इसकी खोज 1950 में अमेरिका की 'कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले' के वैज्ञानिकों ने की थी, जिसके आधार पर इसका नाम कैलिफोर्नियम रखा गया।
इसकी कीमत इतनी हाई क्यों है?
कैलिफोर्नियम-252 का निर्माण दुनिया की सबसे जटिल वैज्ञानिक प्रक्रियाओं में से एक है। इसे तैयार करने के लिए विशेष उच्च-क्षमता वाले परमाणु रिएक्टरों में प्लूटोनियम या क्यूरियम जैसे तत्वों पर लंबे समय तक न्यूट्रॉन की बमबारी की जाती है। वर्तमान में इसे बनाने की उन्नत तकनीक और रिएक्टर पूरी दुनिया में सिर्फ अमेरिका और रूस के पास ही हैं।
इसकी दुर्लभता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वैश्विक स्तर पर इसका सालाना उत्पादन महज कुछ मिलीग्राम ही होता है। साथ ही, इसकी हाफ-लाइफ (अर्ध-आयु) सिर्फ 2.6 वर्ष है, जिसका अर्थ है कि समय बीतने के साथ यह रेडियोएक्टिव तत्व खुद-ब-खुद कम होता जाता है।
कहां होता है इसका इस्तेमाल?
कैलिफोर्नियम-252 एक शक्तिशाली न्यूट्रॉन एमिटर है, जिसके कई अहम उपयोग हैं। मेडिकल क्षेत्र में इसका इस्तेमाल सर्वाइकल और ब्रेन कैंसर के इलाज में होता है, तो वहीं परमाणु संयंत्रों में यह रिएक्टर चालू करने के लिए 'इग्नाइटर' का काम करता है। इसके अलावा, तेल-पानी और खनिजों की अंडरग्राउंड स्कैनिंग से लेकर हवाई अड्डों पर विस्फोटकों व नशीले पदार्थों की जांच करने वाले उपकरणों में भी यह बेहद कारगर है।
