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Explainer: RBI का रेपो रेट क्या होता है? बढ़े तो आपकी EMI क्यों बढ़ती है, घटे तो कैसे मिलती है राहत?

Published: Wed, 07 Oct 2026 12:42 PM (IST)Updated: Wed, 07 Oct 2026 01:21 PM (IST)

RBI ने 7 अक्टूबर 2026 को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% कर दिया है, ...और पढ़ें

RBI का रेपो रेट क्या होता है?

RBI का रेपो रेट क्या होता है?

HighLights

  1. RBI ने रेपो रेट 0.25% बढ़ाकर 5.50% किया।

  2. बढ़ी हुई रेपो रेट से फ्लोटिंग लोन की EMI बढ़ सकती है।

  3. रेपो रेट घटने पर EMI में राहत मिलने की संभावना।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: RBI की ब्याज दरों में बदलाव का असर सिर्फ बैंकिंग सिस्टम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर भी पड़ सकता है। खासकर अगर आपने होम लोन, कार लोन या कोई दूसरा फ्लोटिंग रेट वाला लोन लिया है, तो रेपो रेट आपके लिए बेहद अहम है। RBI ने आज यानी 7 अक्टूबर 2026 को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट यानी 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% कर दिया है। यह फरवरी 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी है। ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल जरूर होगा कि आखिर रेपो रेट होता क्या है तो आइए इस डिटेल में समझते हैं।

आखिर क्या होता है Repo rate?

रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बैंकों को कम अवधि के लिए पैसा उपलब्ध कराता है। बैंक जरूरत पड़ने पर RBI से पैसा लेते हैं और इसके बदले सरकारी सिक्योरिटीज को गिरवी रखते हैं। RBI के मुताबिक, रेपो रेट उसकी प्रमुख पॉलिसी रेट है, जिसका इस्तेमाल अर्थव्यवस्था में पैसे और क्रेडिट की स्थिति को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।

Repo rate बढ़े तो आपकी EMI क्यों बढ़ सकती है?

जब RBI रेपो रेट बढ़ाता है तो बैंकों की फंडिंग कॉस्ट पर दबाव बढ़ सकता है। इसके बाद बैंक अपने कुछ लोन की ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकते हैं। खासकर रेपो रेट जैसे बाहरी बेंचमार्क से जुड़े फ्लोटिंग रेट लोन पर इसका असर पड़ सकता है।

RBI के नियमों के तहत बैंकों के रिटेल और MSME फ्लोटिंग रेट लोन को बाहरी बेंचमार्क से जोड़ा जा सकता है, जिसमें RBI का Repo Rate भी शामिल है। ऐसे लोन की ब्याज दरों की रीसेट अवधि कम से कम तीन महीने में एक बार हो सकती है।

25 बेसिस पॉइंट बढ़ोतरी का मतलब क्या?

100 बेसिस पॉइंट = 1 फीसदी

इसलिए 25 बेसिस पॉइंट = 0.25 फीसदी

मसलन, अगर किसी लोन की ब्याज दर रेपो रेट में 25 bps की बढ़ोतरी के बाद 0.25 फीसदी बढ़ती है, तो ब्याज का अतिरिक्त बोझ लोन की रकम और बची हुई अवधि पर निर्भर करेगा।

उदाहरण के लिए, ₹50 लाख के 20 साल के होम लोन पर 0.25 फीसदी की दर बढ़ने से EMI में करीब ₹800 प्रति माह का फर्क पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक असर बैंक की नई ब्याज दर, लोन की बची अवधि और रीसेट नियमों पर निर्भर करेगा।

Repo Rate घटे तो क्या होगा?

इसका उल्टा भी हो सकता है। अगर RBI रेपो रेट घटाता है तो बैंकों के लिए फंड की लागत कम हो सकती है। इससे बैंक लोन की ब्याज दरों में कटौती कर सकते हैं और फ्लोटिंग रेट वाले होम, कार या दूसरे लोन की EMI कम होने की संभावना बन सकती है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि RBI की हर कटौती का पूरा फायदा तुरंत ग्राहक को मिल जाए। बैंक की अपनी लागत, लोन का बेंचमार्क और रीसेट साइकिल भी महत्वपूर्ण होते हैं।

आम आदमी के लिए आसान फॉर्मूला

Repo Rate बढ़ा तो बैंक की फंडिंग महंगी हो सकती है तो लोन महंगा हो सकता है फिर EMI बढ़ सकती है।

Repo Rate घटा तो बैंक की फंडिंग सस्ती हो सकती है और लोन सस्ता हो सकता है फिर EMI घट सकती है।

यानी RBI का एक फैसला आपके होम लोन, कार लोन और दूसरी उधारी की लागत को प्रभावित कर सकता है। इसलिए हर बार MPC के फैसले के साथ सिर्फ रेपो रेट का आंकड़ा नहीं, बल्कि अपने लोन के बेंचमार्क, ब्याज दर और रीसेट साइकिल को भी जरूर देखें।

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