वो कश्मीरी, जिसने 29 की उम्र में बनाया सबसे बड़ा अमोनिया प्लांट, पिता की मौत से टूटे तो पत्नी ने संभाला; आज ₹47000 करोड़ का साम्राज्य
Vikas Rambal Story: कश्मीरी पंडित विकास रम्बल ने ऑस्ट्रेलिया में 5 अरब डॉलर का साम्राज्य खड़ा किया। पिता की मृत्यु ...और पढ़ें

पिता की मौत से टूटे, करोड़ों की दौलत गंवाई तो पत्नी ने संभाला; आज ऑस्ट्रेलिया का दूसरा सबसे अमीर उद्योगपति है ये कश्मीरी

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बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| एक वक्त ऐसा था, जब विकास रम्बल (Vikas Rambal) के पास सैकड़ों मिलियन डॉलर की दौलत थी। दुनिया के सबसे बड़े अमोनिया प्लांट में हिस्सेदारी थी और कारोबार में बड़ी कामयाबी उनके कदम चूम रही थी। लेकिन पिता की मौत और कारोबारी साझेदार से विवाद ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया। उन्होंने अपनी हिस्सेदारी बेच दी और सब कुछ छोड़कर भारत लौटने का मन बना लिया। तब उनकी पत्नी मेघा रम्बल ने उन्हें दोबारा खड़े होने की चुनौती दी। और यही चुनौती आगे चलकर उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बनी।
आज विकास की नेटवर्थ 5 बिलियन डॉलर, जो भारतीय करेंसी में 47 हजार करोड़ रुपए (Vikas Rambal net worth) से ज्यादा है। विकास परदामन ग्रुप के मालिक (Perdaman Group owner) हैं और ऑस्ट्रेलिया में 6.4 अरब डॉलर के एक विशाल खाद कारखाने का निर्माण करा रहे हैं।
कैसा है कश्मीर से ऑस्ट्रेलिया तक का पूरा सफर?
विकास रम्बल का परिवार मूल रूप से कश्मीर का रहने वाला है। वह कश्मीरी पंडित परिवार से आते हैं। उनके पिता परदामन रम्बल सरकारी भूवैज्ञानिक (Geologist) थे। हालात बिगड़ने पर परिवार को कश्मीर छोड़ना पड़ा। इसके बाद परिवार जम्मू में एक छोटे से घर में रहने लगा। कभी संपन्न और पढ़े-लिखे रहे इस परिवार को नए सिरे से जिंदगी शुरू करनी पड़ी। विकास के पिता ने आर्थिक मुश्किलों के बावजूद उनकी पढ़ाई से समझौता नहीं किया। वह चाहते थे कि बेटा अच्छी शिक्षा हासिल करे और जिंदगी में आगे बढ़े। विकास पढ़ाई में अच्छे थे। गणित में उन्हें 150 में से 149 अंक मिले थे।
उन्होंने नागपुर यूनिवर्सिटी से पेट्रोकेमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद भारत पेट्रोलियम में नौकरी मिली। लेकिन एक साल के भीतर ही उन्होंने नौकरी छोड़ दी। पिता ने जब पूछा कि अब क्या करेंगे, तो विकास के पास कोई न कोई जवाब था और न ही कोई दूसरा काम। इस बात से नाराज होकर पिता ने कई महीनों तक उनसे बात नहीं की।
इसके बाद विकास ने दीपक फर्टिलाइजर्स एंड पेट्रोकेमिकल्स में काम किया। यहां उन्होंने प्राकृतिक गैस से अमोनिया बनाने वाले कारखाने को चलाने का एक्सपीरियंस लिया। आगे चलकर यही अनुभव उनके कारोबारी साम्राज्य की नींव बना।
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29 की उम्र में ऑस्ट्रेलिया में खड़ा किया प्लांट
विकास को बाद में उद्योगपति परिवार से जुड़े अभय ओसवाल के पेट्रोकेमिकल कारोबार में काम करने का मौका मिला। उन्होंने 6 साल में उद्योग की तकनीक, कारोबार और बड़े कारखाने बनाने का अनुभव हासिल किया। साल 1999 तक वह कंपनी के वाणिज्यिक कारोबार के महाप्रबंधक (GM) बन चुके थे।
शुरुआत में जिस व्यक्ति ने उन्हें सौर ऊर्जा परियोजना के नाम पर ऑस्ट्रेलिया बुलाया था, वह धोखेबाज निकला। विकास को जल्द ही इसका एहसास हो गया। लेकिन इस घटना ने उनके लिए एक नया रास्ता खोल दिया।
उन्होंने अपने सहयोगी पंकज ओसवाल के साथ अमोनिया प्लांट बनाने की तैयारी शुरू कर दी। उस समय विकास की उम्र करीब 29 साल थी। दोनों के पास कोई बहुत बड़ा कारोबारी साम्राज्य नहीं था, लेकिन उनके पास एक स्पष्ट योजना थी।
दोनों ने नेशनल ऑस्ट्रेलिया बैंक और एएनजेड से 320 मिलियन डॉलर जुटाए। इसके बाद बुर्प प्रायद्वीप में अमोनिया प्लांट का निर्माण हुआ। अप्रैल 2006 में यह चालू हुआ। विकास के मुताबिक, इसकी सालाना उत्पादन क्षमता करीब 22 लाख टन थी और उस समय यह दुनिया का सबसे बड़ा अमोनिया प्लांट था।
पिता की मौत ने बदली जिंदगी, बेची हिस्सेदारी
कारोबार में इतनी बड़ी सफलता के बीच विकास की निजी जिंदगी में बड़ा संकट आ गया। अप्रैल 2006 में उनके पिता को कैंसर होने का पता चला। विकास तुरंत भारत पहुंचे। 1 जून 2006 को उनके पिता का निधन हो गया। यह वही महीना था, जब बुर्प प्लांट से पहली खेप विदेश भेजी गई। एक तरफ उनका सबसे बड़ा कारोबारी सपना पूरा हो रहा था, दूसरी तरफ वह अपने सबसे बड़े मार्गदर्शक को खो चुके थे।
इसी दौरान विकास और उनके कारोबारी साझेदार पंकज ओसवाल के बीच कंपनी चलाने के तरीके और भविष्य को लेकर मतभेद बढ़ गए। जनवरी 2007 में ओसवाल ने विकास की हिस्सेदारी खरीद ली। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सौदा करीब 300 मिलियन डॉलर का था।
विकास के पास अब काफी पैसा था, लेकिन वह मानसिक रूप से टूट चुके थे। वह भारत लौटना चाहते थे और कारोबार से दूर रहना चाहते थे। उनके लिए प्लांट सिर्फ एक परियोजना नहीं था, बल्कि उनकी पहचान और पिता के सपनों से जुड़ा हुआ था।
पत्नी मेघा ने दिया सहारा, बोलीं- दूसरा प्लांट बनाकर दिखाओ
विकास की पत्नी मेघा रम्बल ने इस मुश्किल दौर में उनका साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने विकास से कहा कि एक प्लांट बनाना संभव था, तो दूसरा भी बनाया जा सकता है। यहां तक कि उन्होंने चुनौती दी कि अगर विकास ऐसा नहीं कर पाए, तो वह खुद कारखाना बनवाने की जिम्मेदारी उठाएंगी। विकास ने एक इंटरव्यू में बताते हैं कि,
परिवार की प्रतिष्ठा और विरासत की बात ने उन्हें फिर से काम शुरू करने के लिए प्रेरित किया। 26 जनवरी 2007 को उन्होंने अपनी जिंदगी को दोबारा व्यवस्थित करने का फैसला किया। हालांकि, अगला प्रयास आसान नहीं रहा। उन्होंने पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के कोली इलाके में कोयले से गैस बनाकर यूरिया तैयार करने की योजना बनाई। इसके लिए जरूरी मंजूरियां और वित्तीय तैयारी भी कर ली गई थी। लेकिन कोयला आपूर्तिकर्ता ग्रिफिन कोल 2010 में दिवालिया हो गया। बाद में इसे खरीदने वाली लैंको इन्फ्राटेक भी संकट में पड़ गई। विकास को उचित कीमत पर दूसरा आपूर्तिकर्ता नहीं मिला। आखिरकार 2014 में उन्हें यह परियोजना छोड़नी पड़ी। इस असफलता में उनकी पिछली कमाई का बड़ा हिस्सा भी खत्म हो गया। परिवार को खर्च घटाने पड़े। दो कारों की जगह एक कार रखी गई। अखबार का सब्सक्रिप्शन और बाहर से कॉफी खरीदना भी बंद कर दिया गया।"
छोटे कारोबार से बनाई छह कंपनियों की ताकत
मेघा ने इस बार विकास को बड़े उद्योगों के बजाय छोटे और व्यावहारिक निवेश पर ध्यान देने की सलाह दी। दोनों ने कॉमनवेल्थ बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया से कर्ज लेकर शॉपिंग सेंटरों में निवेश किया। इसके बाद नवीकरणीय ऊर्जा, आव्रजन सेवाओं और दवा निर्माण जैसे क्षेत्रों में कारोबार फैलाया। धीरे-धीरे उन्होंने छह कंपनियों वाला विविध कारोबार खड़ा कर लिया। इस दौरान विकास ने सीखा कि सिर्फ बड़ा सपना देखना काफी नहीं है। उसके साथ वित्तीय अनुशासन और जोखिम को समझना भी जरूरी है। लेकिन अमोनिया और यूरिया का बड़ा कारखाना बनाने का उनका सपना खत्म नहीं हुआ था।
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6.4 अरब डॉलर का यूरिया प्लांट, 2027 में शुरू होने की उम्मीद
साल 2017 में वुडसाइड पेट्रोलियम के तत्कालीन मुख्य कार्यकारी पीटर कोलमैन ने विकास से संपर्क किया। कंपनी को अपने प्रस्तावित स्कारबरो गैस क्षेत्र के लिए घरेलू ग्राहक चाहिए थे। विकास ने कोली परियोजना के लिए पहले से तैयार इंजीनियरिंग योजनाएं दिखाईं। इससे उन्हें नई परियोजना के लिए बढ़त मिली। इस बार योजना पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के बुर्प प्रायद्वीप में सालाना 23 लाख टन यूरिया बनाने वाले कारखाने की थी। इसका उद्देश्य ऑस्ट्रेलिया की कृषि जरूरतों के लिए घरेलू स्तर पर खाद तैयार करना था।
परियोजना की कुल लागत करीब 6.4 अरब डॉलर है। अप्रैल 2023 में अमेरिकी निवेश कंपनी ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर पार्टनर्स ने इसमें 2.1 अरब डॉलर के निवेश के बदले 45% हिस्सेदारी ली। बाद में इस कंपनी का अधिग्रहण ब्लैकरॉक ने कर लिया। इसके अलावा 32 अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने परियोजना के लिए 2.4 अरब डॉलर का कर्ज उपलब्ध कराया।
विकास की कंपनी परदामन समूह (perdaman group) की इसमें 55% हिस्सेदारी है। कंपनी के मुताबिक, कारखाने के लिए बड़े-बड़े मॉड्यूल भारत के चेन्नई में तैयार किए जा रहे हैं। करीब 8,000 कर्मचारियों ने इसके निर्माण में 2.6 करोड़ मानव-कार्य घंटे लगाए हैं। कारखाने के 2027 के मध्य तक चालू होने की उम्मीद है।
क्या है विकास रंबल का फ्यूचर प्लान?
विकास ऑस्ट्रेलिया को अपनी कर्मभूमि बताते हैं, जबकि भारत को अपनी जन्मभूमि मानते हैं। उनकी अगली योजना कारखाने के लिए 30 मेगावाट का सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने की है। आगे वह 1,000 मेगावाट की सौर परियोजना विकसित करना चाहते हैं। भारत में भी उनकी कंपनी ने सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आवेदन किए हैं।
विकास के दोनों बेटे, ईशान और वशिष्ठ, इंजीनियरिंग और वित्त की पढ़ाई के बाद परिवार के कारोबार से जुड़ चुके हैं। विकास चाहते हैं कि युवा यह समझें कि बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट बनाना संभव है और भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच सहयोग से रोजगार, तकनीकी कौशल और उद्योग को बढ़ावा मिल सकता है।
