गौतम अदाणी का कोरिया कनेक्शन: जहाज से उतरते ही चूमी विदेशी धरती, खरीदा 10 गुना माल; ऐसे शुरू हुई थी अरबपति बनने की कहानी
Gautam Adani PVC Trade Story: गौतम अदाणी ने 1983 में दक्षिण कोरिया की अपनी पहली विदेश यात्रा में 200 टन ...और पढ़ें
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गौतम अदाणी का कोरियाई कनेक्शन: कैसे 200 टन PVC के सौदे ने बदली किस्मत

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| तारीख- 21 जून 1983। एक युवा भारतीय कारोबारी पहली बार किसी विदेशी धरती पर कदम रखता है। जगह थी- ईस्ट एशियाई देश दक्षिण कोरिया। जहाज से उतरते ही वह शख्स कुछ ऐसा करता है, जो उसके साथ गए लोगों को भी हैरान कर देता है। दरअसल, वह युवा जहाज से उतरता है और घुटनों पर बैठकर कोरिया की अनजान जमीन को चूमता है। उस युवा के लिए यह सिर्फ एक विदेश यात्रा नहीं थी, बल्कि यह वो लॉन्चपैड था, जहां से उसके सपनों की उड़ान शुरू होने वाली थी। सिर्फ 21 साल की उम्र में विदेशी धरती से बिजनेस को बढ़ाने वाला वो युवा आज देश का सबसे अमीर शख्स है और 109 बिलियन डॉलर यानी ₹1,04,54,59,33,00,000 (10.45 लाख करोड़ रुपए) का मालिक है। और वो युवा है- आज के दिग्गज उद्योगपति गौतम अदाणी।
आज जब हम अदाणी ग्रुप की बात करते हैं, तो दिमाग में मीलों तक फैले पोर्ट, एनर्जी, लॉजिस्टिक्स और हजारों करोड़ की डील्स का ख्याल आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पूरे साम्राज्य की नींव किसी बड़ी ग्लोबल डील से नहीं, बल्कि कोरिया में हुए 200 टन PVC यानी पॉलीविनाइल क्लोराइड (Gautam Adani PVC trade story) के एक छोटे से सौदे से पड़ी थी? आइए, आपको 1980 के दशक के उस गुजरात में ले चलते हैं, जहां से गौतम अदाणी (Gautam Adani success story) की इस दिलचस्प कहानी की शुरुआत हुई।
पैकेजिंग से परे देखने की वो पहली नजर
अस्सी के दशक में अदाणी परिवार का मुख्य काम प्लास्टिक पैकेजिंग से जुड़ा था। धंधा ठीक-ठाक चल रहा था। लेकिन गौतम अदाणी की सोच आम कारोबारियों से अलग थी। उन्होंने जल्द ही इस बिजनेस की सबसे बड़ी कमजोरी को पकड़ लिया। दिक्कत यह थी कि जो प्लास्टिक पैकेजिंग वो बना रहे थे, बाजार में उसकी बिक्री कीमत लगभग तय थी। लेकिन, उसे बनाने के लिए जिस कच्चे माल की जरूरत होती थी, उसकी कीमतें लगातार ऊपर-नीचे होती रहती थीं।
अदाणी समझ गए कि अगर इसी तरह काम चलता रहा, तो मुनाफा कभी बड़ा नहीं हो सकता। असली खेल ज्यादा से ज्यादा पैकेजिंग बनाने में नहीं है, बल्कि असली गेम तो कच्चे माल को सस्ते और भरोसेमंद तरीके से हासिल करने में है। यहीं से उनके दिमाग में यह बात बैठ गई कि कच्चा माल सिर्फ लोकल भारतीय सप्लायरों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। दुनिया के बाजार तलाशने होंगे।
जब फर्स्ट क्लास के फर्श पर सोए अदाणी
विदेशी बाजार से कच्चा माल मंगाना सुनने में जितना आसान लगता है, 1980 के दशक में वह उतना ही मुश्किल था। गौतम अदाणी उस समय कोई बहुत बड़े सेठ नहीं थे। उनका प्लास्टिक का काम छोटे स्तर का था। बड़े विदेशी सप्लायर सिर्फ उन लोगों से बात करते थे जो हजारों टन का ऑर्डर देते हों। छोटे व्यापारियों को कोई घास नहीं डालता था।
इसी दौरान, अपनी इस तलाश में उनकी मुलाकात मुंबई के दो बड़े प्लास्टिक ट्रेडरों- जय शाह और जतिन कोटेचा से हुई। ये दोनों ऐसे दिग्गज थे, जो 2,000 टन या उससे भी ज्यादा के बड़े लॉट में माल मंगाया करते थे। अदाणी ने इन दोनों को इस बात के लिए राजी कर लिया कि वे उन्हें छोटे ऑर्डर दे दें। शुरुआत सिर्फ 20 टन से हुई और धीरे-धीरे उन्होंने अपनी मात्रा बढ़ानी शुरू की।
लेकिन अदाणी सिर्फ माल नहीं खरीद रहे थे, वे उस धंधे की एबीसीडी सीख रहे थे। मशहूर लेखक आरएन भास्कर ने अपनी किताब "Gautam Adani: Reimagining Business in India and the World" यानी "गौतम अदाणी: भारत और दुनिया में बिजनेस की नई सोच" में लिखा है कि,
गौतम अदाणी इन दोनों बड़े व्यापारियों के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताते थे। जब ये लोग रात की ट्रेन से मुंबई से अहमदाबाद का सफर करते, तो अदाणी भी उनके साथ हो लेते। मजेदार बात यह थी कि अदाणी के पास सेकंड क्लास का टिकट होता था, जबकि वे दोनों व्यापारी फर्स्ट क्लास में सफर करते थे। लेकिन बड़े कारोबार की बारीकियां सीखने की धुन ऐसी थी कि अदाणी उनके फर्स्ट क्लास डिब्बे में चले जाते, उनसे बातें करते और रात होने पर उसी डिब्बे के फर्श पर सो जाते। वे अंतरराष्ट्रीय व्यापार के तौर-तरीके, बैंकिंग के नियम और बड़े लोगों से रिश्ते बनाने की कला उस फर्श पर सोकर ही सीख रहे थे।"
जब खरीद लिया जरूरत से 10 गुना बड़ा ऑर्डर
सीखने का यह दौर खत्म हुआ और साल 1983 की पहली तिमाही में अदाणी ने कोरिया (Gautam Adani South Korea trip 1983) के एक बड़े प्लास्टिक सप्लायर तक अपनी सीधी पहुंच बना ली। इसके बाद ही वो जून में कोरिया पहुंचे और जमीन को चूमा। अगले ही दिन, उन्होंने अपनी जिंदगी का पहला बड़ा अंतरराष्ट्रीय सौदा क्रैक कर लिया।
उन्होंने कोरिया से 200 टन PVC आयात करने का ऑर्डर दे दिया। अब आप सोचेंगे कि इसमें क्या बड़ी बात है? बड़ी बात यह थी कि उस वक्त उनकी अपनी फैक्ट्री की कुल जरूरत मुश्किल से 20 टन की थी। यानी उन्होंने अपनी क्षमता और जरूरत से सीधे 10 गुना ज्यादा माल का ऑर्डर दे दिया था। यह कोई तुक्का नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी।
बैंक अधिकारी का सवाल और अदाणी का जवाब
ऑर्डर तो दे दिया, लेकिन विदेशी व्यापार के लिए बैंक से लेटर ऑफ क्रेडिट (LC) खुलवाना पड़ता है। जब फाइल बैंक पहुंची, तो बैंक अधिकारी 200 टन की भारी-भरकम मात्रा देखकर चकरा गया। उसने अदाणी के सहयोगी वसंतभाई से साफ पूछ लिया, "इतनी बड़ी मात्रा का तुम लोग करोगे क्या?"
आम आदमी होता तो शायद घबरा जाता या सफाई देने के लिए अपने सीए (CA) को भेजता। लेकिन अदाणी ने किसी का इंतजार नहीं किया। वो खुद सीधे उस बैंक अधिकारी के केबिन में जा पहुंचे। उन्होंने उसे क्या समझाया, यह तो वही जानते हैं, लेकिन कुछ ही मिनटों के अंदर वह LC मंजूर हो गई।
यह अदाणी की सबसे बड़ी खूबी थी, जहां दुनिया को बंद दरवाजा दिखता था, वो उसे खोलने की चाबी तुरंत ढूंढ लेते थे।
निर्माता से कमोडिटी ट्रेडर बनने का वो टर्निंग पॉइंट
दरअसल, कोरिया से आया वो 200 टन माल सिर्फ फैक्ट्री के लिए नहीं था। अदाणी ने भांप लिया था कि अगर बड़ी मात्रा में कच्चा माल मंगाया जाए, तो वह काफी सस्ता पड़ता है। अपनी जरूरत का 20 टन रखकर बाकी माल अगर बाजार के दूसरे छोटे कारोबारियों को बेचा जाए, तो सीधा और मोटा मुनाफा कमाया जा सकता है।
बस, इसी एक फैसले ने सब कुछ बदल दिया। एक छोटी सी पैकेजिंग फैक्ट्री चलाने वाला शख्स अब एक कमोडिटी ट्रेडर बन चुका था। 200 टन से शुरू हुआ यह सफर जल्द ही हजारों टन की खेपों में बदल गया। अदाणी ने शिपिंग, पोर्ट, डिलीवरी, बैंकिंग, LC, और बाजार में तेजी से माल खपाने का पूरा इकोसिस्टम समझ लिया था।
उनका नया मंत्र था- 'बड़े पैमाने पर खरीदो, तेजी से बेचो, और जो पैसा आए उसे तुरंत अगले और बड़े सौदे में लगा दो।'
सरकारी संस्था के साथ मास्टरमाइंड डील
अपने कारोबारी सफर में अदाणी ने हमेशा ऐसे मौके तलाशे जिन्हें दूसरे लोग बेकार समझकर छोड़ देते थे। गुजरात स्टेट एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन (GSEC) के पास कुछ ऐसे आयात अधिकार (Import Rights) थे, जिनका कोई इस्तेमाल नहीं कर रहा था। अदाणी ने GSEC के सामने एक ऐसा मॉडल पेश किया, जिसमें वे इन अधिकारों का इस्तेमाल करके ड्यूटी-फ्री (बिना टैक्स के) माल मंगा सकते थे।
तय हुआ कि जोखिम अदाणी का होगा और GSEC को इसके बदले शुल्क मिलेगा। शुरुआत में साल भर में 2 करोड़ रुपए का माल मंगाने का टारगेट रखा गया था। लेकिन अदाणी की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगा लीजिए कि पहले ही साल में यह आंकड़ा 10 करोड़ रुपए को पार कर गया। यानी टारगेट से 5 गुना ज्यादा।
जब 5000 टन जहाज डूबा, पर हौसला नहीं
इस रास्ते पर सिर्फ फूल नहीं थे, कांटे भी थे। रिस्क इतना बड़ा था कि एक बार ऐसा हादसा हुआ जो किसी भी नए व्यापारी की कमर तोड़ सकता था। अदाणी का आयात किया हुआ करीब 5,000 टन पॉलीमर लेकर आ रहा एक विशाल जहाज समंदर में दुर्घटनाग्रस्त होकर डूब गया। रातों-रात एक भारी नुकसान सामने खड़ा था।
हालांकि, इंश्योरेंस से पैसे वापस आने वाले थे, लेकिन बाजार में साख और व्यापार रुकने का खतरा था। ऐसी स्थिति में आम कारोबारी काम समेट लेता है। लेकिन अदाणी ने जो किया, वो उनकी रिस्क लेने की बेखौफ क्षमता को दिखाता है। उन्होंने पीछे हटने या व्यापार रोकने के बजाय, तुरंत एक और बड़े आयात के लिए नई LC खुलवा दी। नुकसान ने उन्हें डराया नहीं, बल्कि और बड़े दांव खेलने के लिए प्रेरित किया।
क्या था उस 200 टन के सौदे का असली मतलब?
गौतम अदाणी की 1983 की वो कोरिया यात्रा सिर्फ 200 टन PVC खरीदने की कहानी नहीं है। यह कहानी है सोच का दायरा टूटने की। उस यात्रा ने एक छोटे व्यापारी को ग्लोबल सप्लायरों से जोड़ दिया। इसी सोच और अनुभव के दम पर 1986 में अदाणी एजेंसी और अदाणी एसोसिएट्स बनीं। और फिर 1988 में नींव रखी गई अदाणी एक्सपोर्ट्स की, जो आज अदाणी एंटरप्राइजेज के नाम से दुनिया भर में जानी जाती है।
गौतम अदाणी आज देश के सबसे सबसे अमीर उद्योगपति हैं। उनके पास 10 लिस्टेड कंपनियां हैं। जिनमें करीब 48,000 कर्मचारी काम करते हैं। ब्लूमबर्ग बिलिनेयर इंडेक्स के मुताबिक, उनकी कुल नेटवर्थ 109 बिलियन डॉलर यानी 10 लाख करोड़ रुपए (Gautam Adani net worth) से ज्यादा है। अदाणी की संपत्ति, मुकेश की अंबानी की संपत्ति से 26 बिलियन डॉलर यानी करीब 2.50 लाख करोड़ रुपए ज्यादा है।
