नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कारोबारी नीतियों के कारण अब अमेरिकी कंपनियों में असंतोष पैदा हो रहा है। ट्रंप द्वारा अपनी मनमर्जी से शुल्कों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे अमेरिका के कारोबार जगत में चिंता बढ़ती जा रही है। पिछले सप्ताह ही ट्रंप ने पड़ोसी देश मेक्सिको से अमेरिका में आने वाले लोगों को रोकने की कोशिश के तहत उस पर अचानक शुल्क लगाने की घोषणा कर दी थी। हालांकि दोनों पक्षों ने शनिवार को इस मुद्दे पर सुलह कर ली। लेकिन सोमवार को ट्रंप ने फिर से धमकी दे डाली कि मेक्सिको यदि अपने वादे पर अमल नहीं करता है, तो वह उस पर शुल्क लगाया जाएगा।

ट्रंप शुल्कों का बहुत अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं। कभी शुल्क लगा देते हैं। कभी उसे हटा लेते हैं। कभी शुल्क लगाने की धमकी दे डालते हैं। कभी धमकी वापस ले लेते हैं। रिपब्लिक पार्टी के रणनीतिकार और ट्रंप के आलोचक रिक टाइलर ने कहा कि कारोबार को नुकसान हो रहा है। वह खुद को टैरिफ मैन कहा करते हैं। उन्हें इस पर गौरव है। यह पार्टी के लिए बुरी खबर है। यह मुक्त बाजार की सोच के लिए नकारात्मक है।

मोनार्क ग्लोबल स्ट्रैटेजिस्ट के चेयरमैन और मेक्सिको में अमेरिका के पूर्व राजदूत जेम्स जोंस ने कहा कि कारोबारियों को सतर्क हो जाना चाहिए। चैंबर ऑफ कॉमर्स ने भी खुद को रिपब्लिकन पार्टी से दूर करना शुरू कर दिया है। चैंबर ने 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में 2.9 करोड़ डॉलर (करीब 201 करोड़ रुपये) खर्च किया था। उसने अब डेमोक्रैट्स से नजदीकी बढ़ाने का संकेत दिया है। यह रिपब्लिकन पार्टी को 2020 के चुनाव में महंगा पड़ सकता है। ट्रंप के शुल्क का मतलब उस टैक्स से है, जिसका भुगतान अमेरिकी आयातक करते हैं। आयातक इसे ग्राहकों के कंधे पर डाल देते हैं। इस आयात शुल्क के कारण अमेरिकी निर्यात पर जवाबी शुल्क लग सकता है। इससे कारोबार ठप हो सकता है।

ट्रंप ने व्यापार साङोदारों पर शुल्क लगाने के लिए ट्रेड एक्सटेंशन ऑफ 1962 की धारा 232 का इस्तेमाल किया है, जिसका पहले बहुत कम इस्तेमाल किया गया है। इसी के जरिये उन्होंने स्टील और एल्यूमीनियम पर शुल्क लगाया है। इसके जरिये उन्होंने वाहनों पर शुल्क लगाने की चेतावनी दी है, जिसके निशाने पर सीधे जापान और यूरोपीय संघ हैं। कांग्रेस ने अब कानून में बदलाव कर राष्ट्रपति की शुल्क लगाने की शक्ति को कम करने पर विचार शुरू कर दिया है।

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Posted By: Pawan Jayaswal

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