यह एक आर्काइव लेख है, जिसे May 26, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
राजग सरकार में साठगांठ वाले पूंजीवाद पर लगी लगाम
एक वर्ष पहले तक नॉर्थ ब्लॉक स्थित वित्त मंत्रालय के कार्यालय जाने वालों को एक दृश्य हमेशा दिखाई देता था। ...और पढ़ें

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। एक वर्ष पहले तक नॉर्थ ब्लॉक स्थित वित्त मंत्रालय के कार्यालय जाने वालों को एक दृश्य हमेशा दिखाई देता था। यह दृश्य होता था मंत्रालय के रिसेप्शन पर बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधियों का पास बनवाने के लिए कतारबद्ध खड़ा होना। सुबह से शाम तक तमाम कंपनियों के प्रतिनिधि वित्त मंत्री से लेकर छोटे बाबुओं से मिलने के लिए लाइन लगा कर खड़े होते थे। अब नजारा बदल चुका है। कोई भी लाइन नहीं। पूरा गलियारा एक दम साफ दिखाई देता है।
राजग सरकार पर उद्योग जगत के साथ साठगांठ कर नीतियां बनाने का आरोप लगाने वाले कांग्रेस के नेताओं को हकीकत जानने के लिए एक बार नॉर्थ ब्लॉक का चक्कर जरूर लगाना चाहिए। वैसे, यह सिर्फ एक उदाहरण है कि किस तरह से क्रोनी कैपिटलिज्म यानी नेताओं और उद्योगपतियों के बीच साठगांठ का खात्मा किया गया है।
पेट्रोलियम मंत्रालय ने जिस तरह से देश की दिग्गज पेट्रोलियम कंपनियों की तरफ से नीतियों से जुड़ी फाइलों को गायब करने के सिंडिकेट का भांडा फोड़ा वह दूसरा उदाहरण है। न जाने कितने वर्षो से पेट्रोलियम, बिजली, रसायन समेत कई आर्थिक मंत्रालयों से अहम फाइलों को गायब करने वाला एक गैंग काम कर रहा था। इस गैंग के बारे में मंत्रालय के एक एक अधिकारी व वहां सामान्य तौर पर जाने वाले बाहरी व्यक्ति भी जानते थे। गायब फाइलों का बाजार कई करोड़ रुपये का था। अब इस गैंग का एक एक व्यक्ति सलाखों के पीछे है।
देश में क्रोनी कैपिटलिज्म का सबसे बड़ा उदाहरण कोयला ब्लॉकों व अन्य प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन रहा था। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट को वर्ष 1991 के बाद से आवंटित 217 कोयला ब्लॉकों का आवंटन रद करना पड़ा। इनमें से अधिकांश का आवंटन कौड़ियों के भाव और बगैर किसी नीतिनिर्देश व कार्य योजना के किया गया। इन ब्लॉकों में से 42 ब्लॉकों का आवंटन राजग सरकार ने खुली निविदा से किया और राज्यों को दो लाख करोड़ रुपये मिलने का रास्ता साफ हुआ। इस तरह से अब हर तरह की खदान का आवंटन खुली निविदा से होगा। पारदर्शी नियमों का ही नतीजा है कि संचार कंपनियों ने तमाम वित्तीय समस्याओं के बावजूद 1.10 लाख करोड़ रुपये देकर स्पेक्ट्रम खरीदा।
