अब कपड़े भी होंगे महंगे? टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने कपास को लेकर मांगी सरकार से मदद! ड्यूटी फ्री इंपोर्ट बढ़ाने की मांग
केंद्र सरकार ने जून से अक्टूबर तक कपास के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी थी, जिसका उद्देश्य कपड़ा उद्योग को ...और पढ़ें

टेक्सटाइल इंडस्ट्री ने ड्यूटी फ्री कपास इंपोर्ट को बढ़ाने की मांग की
HighLights
उद्योग ने कपास शुल्क-मुक्त आयात अवधि 6 माह बढ़ाने की मांग की।
कपास और सूती धागे की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है।
घरेलू कपास उत्पादन में लगातार गिरावट चिंता का विषय है।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| टेक्सटाइल इंडस्ट्री की मांग पर केंद्र सरकार ने जून से 31 अक्टूबर तक के लिए कपास के ड्यूटी फ्री इंपोर्ट की अनुमति दी थी। इसका उद्देश्य ने कपड़ा उद्योग और इससे जुड़े लोगों को राहत देने, कपास की उपलब्धता बढ़ाने और घरेलू कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए कपास आयात पर लगने वाले शुल्क को हटा दिया था। अब इंडस्ट्री इस छूट को अगले 6 महीने के लिए और बढ़ाए जाने की मांग की है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2026 में कपास की कीमतों में करीब 20% की बढ़ोतरी हुई है, जबकि सूती धागे (Cotton yarn) की कीमतों में इससे भी अधिक बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, कपास किसानों को चिंता है कि यदि शुल्क-मुक्त आयात की अवधि बढ़ा दी गई, तो अक्टूबर में नई कपास फसल की आवक शुरू होने के दौरान घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
भारत में कपास उत्पादन में भारी गिरावट
भारत से निटेड परिधानों के प्रमुख निर्यात केंद्र तिरुपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष के.एम. सुब्रमणियन ने मीडिया को बताया कि “हमने केंद्र सरकार से कच्चे कपास के शुल्क-मुक्त आयात की अवधि छह महीने बढ़ाने का अनुरोध किया है, क्योंकि वर्ष 2026 में सूती धागे की कीमतों में 60% की वृद्धि हुई है। इससे परिधान निर्यातकों की चुनौतियां और बढ़ गई हैं।”
पिछले छह महीनों में कपास की कीमतों में लगभग 24% की बढ़ोतरी हुई है। इसकी एक बड़ी वजह घरेलू उत्पादन में गिरावट है। साल 2025-26 में भारत का कपास उत्पादन 2.35% घटकर 170 किलोग्राम की 290 लाख गांठ रह गया। देश में कपास उत्पादन पिछले छह सालों से लगातार घट रहा है और साल 2021-22 की तुलना में इसमें 17% से अधिक की कमी आ चुकी है।
कपास प्रोडक्शन को लेकर चिंता
भारतीय कपड़ा उद्योग को प्रतिस्पर्धी दरों पर कच्चा माल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार ने जून से 31 अक्टूबर तक कच्चे कपास पर लगने वाले 11% आयात शुल्क को माफ कर दिया था।
सुब्रमणियन ने कहा कि “गारमेंट्स की कच्चे माल की लागत में सूती धागे की हिस्सेदारी लगभग 60% होती है। कीमतों में बढ़ोतरी के साथ-साथ हमें धागे की उपलब्धता की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने आगे कहा कि अक्टूबर से शुरू होने वाले नए कपास मार्केटिंग ईयर में प्रोडक्शन को लेकर भी चिंताएं बनी हुई हैं।
आयातित कपास घरेलू कपास से सस्ती
खंडेश जिनिंग एंड प्रेसिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप जैन ने कहा कि विदर्भ, मराठवाड़ा, तेलंगाना और गुजरात के कुछ हिस्सों जैसे प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की स्थिति अच्छी नहीं है। उर्वरक, बीज और अन्य कृषि लागत में बढ़ोतरी के बीच किसान इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यदि फसल कटाई और बाजार में नई आवक के दौरान शुल्क-मुक्त आयात जारी रखा गया तो घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
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हालांकि, प्रदीप जैन का मानना है कि मौजूदा ग्लोबल प्राइस को देखते हुए इंपोर्टेड कपास घरेलू कपास की तुलना में बहुत सस्ता नहीं होगा। उन्होंने कहा कि “मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कपास कीमतों को देखते हुए आयातित कपास के घरेलू कपास से बहुत सस्ता होने की संभावना नहीं है। घरेलू कपास की कीमतें मौजूदा ₹9,000 प्रति क्विंटल के स्तर से नीचे जाने की संभावना कम है। इससे उद्योग के लिए कपास की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिलेगी।”
ब्रिटेन के साथ हुए FTA का फायदा
भारतीय कपड़ा और गारमेंट निर्यातक ब्रिटेन के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का लाभ उठाने और नए निर्यात बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, अमेरिका के साथ टैरिफ वार के कारण भारतीय निर्यात पर पड़े प्रभाव के बाद
टेक्सटाइल इंडस्ट्री नए मौकों की तलाश में जुटा है।
