नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। रिलायंस जियो को छोड़कर अन्य दूरसंचार कंपनियों ने सरकार से स्पेक्ट्रम भुगतान और अन्य शुल्कों पर माल एवं सेवा कर (जीएसटी) समाप्त करने और टैक्स क्रेडिट के 35,000 करोड़ रुपये को लंबित भुगतान में समायोजित करने की मांग की है। सेल्युलर आपरेटर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (सीओएआई) ने दूरसंचार मंत्री मनोज सिन्हा को लिखे पत्र में कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकारी सेवाओं पर मूल्यवर्धित कर या जीएसटी नहीं लगता क्योंकि इन्हें गैर आर्थिक गतिविधियां या ‘सॉवरेन’ कामकाज माना जाता है जो कर के दायरे से बाहर होता है।

सीओएआई ने कहा कि इस बारे में अंतरराष्ट्रीय प्रचलन के हिसाब से दूरसंचार ऑपरेटरों की ओर से किए जाने वाले लाइसेंस शुल्क, स्पेक्ट्रम प्रयोग शुल्क या स्पेक्ट्रम भुगतान को जीएसटी की छूट मिलनी चाहिए। सीओएआई के महानिदेशक राजन एस मैथ्यू ने पत्र में कहा कि इस बारे में जीएसटी कानून के संबंधित प्रावधानों के तहत छूट की अधिसूचना जारी की जा सकती है।

सीओएआई के सदस्यों में भारती एयरटेल, वोडाफोन आइडिया और रिलायंस जियो शामिल हैं। हालांकि, मैथ्यूज ने कहा कि रिलायंस इस मामले में असहमत है। उन्होंने कहा कि भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंडस्ट्री का राजस्व अप्रैल-जून 2016 और अप्रैल-जून 2018 के बीच 32 फीसद कम हो गया है और यह उम्मीद है कि 2018-19 में राजस्व 2013-14 में 1.45 लाख करोड़ रुपये के राजस्व से भी कम होगा।

मैथ्यू ने कहा कि चूंकि उद्योग के राजस्व में भारी गिरावट आई है, इसलिए राजस्व पर जीएसटी का आउटपुट उपलब्ध इनपुट जीएसटी क्रेडिट को समाहित करने में असमर्थ है। ऐसी स्थिति ने ऑपरेटर की पूंजी के लगभग 35,000 करोड़ रुपये को अतिरिक्त जीएसटी क्रेडिट के रूप में रोक दिया है।

टेलीकॉम ऑपरेटर जीएसटी में इनपुट क्रेडिट को समायोजित करते हैं जो वे ग्राहकों से जुटाते हैं।

 

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