दीवाली और शादी सीजन से पहले महंगी होंगी साड़ियां? साड़ियों के समंदर में घटा प्रोडक्शन! कारोबारी ने बताई अंदर की बात
सूरत में साड़ी उत्पादन में कमी आई है, जिससे दिवाली और शादी के सीजन से पहले साड़ियों की कीमतें बढ़ सकती हैं।

सूरत साड़ी इंडस्ट्री में बढ़ी टेंशन
HighLights
सूरत में साड़ी उत्पादन में भारी गिरावट, उद्योग संकट में।
मजदूरों की हड़ताल, कच्चे माल की कीमतें 30-35% बढ़ीं।
दिवाली, शादी सीजन से पहले साड़ियों की कीमतें बढ़ेंगी।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| साड़ियों का समंदर कहे जाने वाले गुजरात के सूरत विश्व विख्यात है। यहां के रिंग रोड, स्टेशन एरिया, सारोली और सहारा दरवाजा जैसे इलाकों में खूब साड़ियां बनाई जाती हैं। हालांकि इन दिनों साड़ी कारोबारियों के सामने कई चुनौतियां है, जिससे उनके बिजनेस के साथ ही साड़ियों का प्रोडक्शन भी कम देखने को मिल रहा है। जिसका असर आम ग्राहकों पर भी देखने को मिलने वाला है।
साड़ी इंडस्ट्री के सामने बड़ी चुनौतियां
सूरत को देश की टेक्सटाइल इंडस्ट्री की रीढ़ कहा जाता है। इन दिनों टेक्सटाइल और अन्य इंडस्ट्रियल क्षेत्रों के मजदूरों की ओर से 8 घंटे की ड्यूटी, साप्ताहिक छुट्टी (रविवार) और मजदूरी बढ़ाने के लिए हड़ताल जारी है, जिससे कारखाने बंद हैं और प्रोडक्शन या तो ठप पड़ा है या फिर बहुत ही कम आउटपुट है। इससे साड़ी इंडस्ट्री दबाव में है।
रॉ मटेरियल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी
सूरत के साड़ी मैन्युफैक्चरर उमाशंकर तिवारी ने जागरण बिजनेस से बातचीत करते हुए बताया कि मजदूरों की समस्या के साथ ही साड़ियों में इस्तेमाल होने वाले फैब्रिक, जरी, धागे, सितारा और अन्य सजावटी सामग्रियां जैसे जरूरी रॉ मटेरियल सहित डिजाइनिंग कॉस्ट में 30-35 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। लागत बढ़ने प्रोडक्शन कॉस्ट में भारी-भरकम वृद्धि हुई है।
महंगी होंगी साड़ियां?
दीवाली, करवाचौथ और शादियों के सीजन के दौरान साड़ियों की भारी डिमांड बनी रहती है। प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ने और साड़ी इंडस्ट्री के सामने कारीगरों और मजदूरों की समस्या का असर रिटेल प्राइस पर भी देखने को मिल सकता है। पीक सीजन में फैक्ट्रियों में साड़ियों की मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में कमी के कारण साड़ियों की कीमत में बढ़ोतरी हो सकती है। इंडस्ट्री से जुड़े सूत्रों के मुताबिक साड़ियों की कीमत में 30-40 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है।
क्या है साड़ी इंडस्ट्री का हाल?
साड़ी कारखाना के मालिक उमाशंकर बताते हैं कि फैक्ट्रियों में 12-12 घंटे दो पाली में काम करने का नियम 3-4 दशक पुराना रहा है, 8 घंटे से अधिक काम करने पर हमेशा से कारीगरों को ओवर टाइम पे किया जाता है, हड़ताल और साप्ताहिक छुट्टी से महीने में 20 फीसदी से अधिक प्रोडक्शन कम हो सकता है। इससे साड़ी उद्योग के साथ खुदरा बाजारों में भी दबाव है।
