बंजर जमीन पर बसाई उद्योग नगरी, गन्ने की खेती से हैवी इंजीनियरिंग तक; सेठ वालचंद ने हवा से समंदर तक फैलाया कारोबार
सेठ वालचंद हीराचंद दोषी ने एक बंजर ज़मीन को वालचंदनगर नामक कृषि-औद्योगिक और भारी इंजीनियरिंग हब में बदला। उन्होंने हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट, सिंधिया शिपयार्ड जैसी कई प्रमुख कंपनियों की स्थापना की।

HighLights
सेठ वालचंद दोषी ने बंजर ज़मीन पर वालचंदनगर की स्थापना की।
उन्होंने हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट और सिंधिया शिपयार्ड जैसी कंपनियां बनाईं।
वालचंद नगर का इतिहास 100 साल से ज्यादा पुराना है।
नई दिल्ली। भारत में कुछ चुनिंदा औद्योगिक नगर हैं जिन्हें सरकारों ने नहीं बल्कि किसी खास शख्सियत ने बसाया है। आपने टाटा नगर से लेकर बाटानगर के नाम जरूर सुने होंगे। इसी कड़ी में एक और नाम आता है वालचंद नगर का, जिसकी स्थापना का श्रेय मशहूर उद्योगपति सेठ वालचंद हीराचंद दोषी (Seth Walchand Hirachand Doshi) को जाता है। इस शख्स ने एक बंजर ज़मीन को पहले भारत के एक प्रमुख कृषि-औद्योगिक हब और फिर एक हैवी इंजीनियरिंग सेंटर में बदल दिया।
आइये आपको बताते हैं प्रसिद्ध उद्योगपति सेठ वालचंद हीराचंद दोषी और उनके नाम पर बसाए गए वालचंदनगर की हिस्ट्री..
सेठ वालचंद की शख्सियत
सेठ वालचंद हीराचंद दोषी भारत के दूरदर्शी और नामी उद्योगपति रहे। वे भी जमशेद जी टाटा और घनश्याम दास बिड़ला समेत उन कारोबारियों की लिस्ट में शामिल हैं जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद भारत में औद्योगिक आत्मनिर्भरता के लिए काम किया और देश में भारी उद्योगों की शुरुआत की।
पुश्तैनी बिजनेस से अलग सोचा
सेठ वालचंद का फैमिली बिजनेस बैंकिंग और कॉटन से जुड़ा था, लेकिन यहां कुछ साल बिताने के बाद उन्होंने पारिवारिक बिजनेस में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बाद वालचंद हीराचंद दोषी ने लक्ष्मणराव बलवंत फाटक के साथ मिलकर कंस्ट्रक्शन के लिए रेलवे कॉन्ट्रैक्टर का काम शुरू किया। खास बात है कि यह पार्टनरशिप 'फाटक-वालचंद प्राइवेट लिमिटेड' बन गई।
बंजर जमीन पर पड़ी नजर
वालचंद नगर का इतिहास 100 साल से ज्यादा पुराना है। दरअसल, 1920 के दशक में सेठ वालचंद हीराचंद ने पुणे के पास कलांब गांव में हज़ारों एकड़ बंजर और पथरीली ज़मीन खरीदी। यह इलाका बहुत कम बारिश वाला था, लेकिन उन्होंने आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों और सिंचाई सुविधाओं का इस्तेमाल करके इसे उपजाऊ बनाया और गन्ने की खेती के लिए विकसित किया और 1934 में यहां एक चीनी कारखाने की स्थापना की। इसी कारखाने के इर्द-गिर्द आधुनिक टाउनशिप का निर्माण हुआ, जिसे वालचंदनगर नाम दिया गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नए बिजनेस की शुरुआत
द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब विदेशों से चीनी मिल की मशीनरी और कलपुर्जे आना बंद हो गए, तो सेठ वालचंद ने आयात पर निर्भर रहने के बजाय यहीं पर मशीनें बनाने की वर्कशॉप शुरू कर दी। यहीं से 'वालचंद नगर इंडस्ट्रीज लिमिटेड' की नींव पड़ी।
चीनी से एविशन तक फैलाया व्यापार
वालचंद हीराचंद सेठ ने शुरुआत तो चीनी मिल के साथ की लेकिन उनकी कंपनी लगातार विस्तार करती गई। आज की तारीख में वालचंद नगर भारी मशीनरी का एक बड़ा केंद्र बन गया है।
सेठ वालचंद हीराचंद ने भारत की पहली आधुनिक शिपयार्ड, एयरक्राफ्ट फ़ैक्ट्री और कार फ़ैक्टरी शुरू की। उन्होंने 1940 में हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट कंपनी (बाद में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड – HAL), 1940 में विशाखापत्तनम में सिंधिया शिपयार्ड (बाद में हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड) और 1945 में मुंबई के पास प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स लिमिटेड (PAL) की स्थापना की। इन कंपनियों ने इन अहम सेक्टर में भारत का औद्योगिक आधार बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।
उद्योगपति सेठ वालचंद हीराचंद ने मैसूर राज्य और अमेरिकी सलाहकार विलियम डी. पॉली के साथ मिलकर 23 दिसंबर, 1940 को बैंगलोर में हिंदुस्तान एयरक्राफ्ट लिमिटेड (HAL) की स्थापना की। हालांकि, भारत सरकार ने 1941 में इसमें हिस्सेदारी ली, 1942 में इसका प्रबंधन अपने हाथ में लिया और बाद में 1 अक्टूबर 1964 को इसका राष्ट्रीयकरण करके इसे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में मिला दिया।
वालचंद नगर इंडस्ट्रीज, इसरो के अंतरिक्ष मिशनों जैसे - गगनयान, चंद्रयान, मंगलयान के लिए कलपुर्जे और नौसेना की परमाणु पनडुब्बियों के लिए अहम उपकरण भी बनाती है।
ये भी पढ़ें - हिंदुस्तान के पहले ट्रक 'TMB 312' की कहानी, किसने बनाया था ये फौलादी वाहन; कहां से आए थे टायर और कलपुर्जे?
टाटा नगर जैसा बसाया वालचंद नगर
टाटा नगर और बाटानगर की तरह ही सेठ वालचंद ने अपने कारखाने के कर्मचारियों के लिए एक सुनियोजित शहर बसाया। उन्होंने यहाँ पक्के मकान, सड़कें, स्कूल, अस्पताल, खेल के मैदान और कर्मचारियों के लिए अन्य नागरिक सुविधाएं विकसित कीं, जिससे यह एक आत्मनिर्भर शहर बन गया।
