एक बैरल क्रूड निकालने में कितना आता है खर्च? सऊदी के पूर्व मंत्री का बड़ा खुलासा; पेट्रोल-डीजल की कीमत का पूरा गणित
Crude Oil Production Cost: सऊदी अरब के पूर्व मंत्री अली अल-नैमी ने खुलासा किया कि वहां एक बैरल कच्चे तेल ...और पढ़ें
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एक बैरल तेल निकालने में कितना आता है खर्च? सऊदी के पूर्व मंत्री का बड़ा खुलासा; पेट्रोल-डीजल की कीमत का पूरा गणित

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
नई दिल्ली| जब भी पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ते हैं, हमारी जेब पर सीधा असर पड़ता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जमीन से एक बैरल कच्चा तेल निकालने में आखिर कितना खर्च (cost of 1 barrel oil) आता है? तेल की वैश्विक राजनीति के सबसे ताकतवर चेहरों में से एक और सऊदी अरब के पूर्व पेट्रोलियम मंत्री अली अल-नैमी (former Saudi petroleum minister Ali Al-Naimi) ने एक इंटरव्यू में जो खुलासा किया, वह किसी को भी हैरान कर सकता है।
उनके मुताबिक, सऊदी अरब में एक बैरल कच्ला तेल (करीब 159 लीटर) निकालने की लागत 2 डॉलर यानी करीब 187 रुपए (Crude Oil Production Cost) से भी कम हो सकती है।
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लागत कम, कीमत ज्यादा: आखिर क्यों?
सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे सुलभ और समृद्ध तेल भंडार हैं। अली अल-नैमी का यह बयान वैश्विक ऊर्जा बाजार की एक कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। तेल की कीमतें केवल उसे निकालने के खर्च से तय नहीं होतीं, बल्कि इसमें जियोपॉलिटिक्स, सप्लाई पर कंट्रोल और रणनीतिक फैसलों की बड़ी भूमिका होती है।
यही वजह है कि लागत 2 डॉलर होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 70 डॉलर से 90 डॉलर के आसपास झूलती रहती हैं। यह कम लागत सऊदी अरब को यह ताकत देती है कि बाजार में कितनी भी गिरावट आए, वह हमेशा मुनाफे में रहता है।
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रिफाइनिंग का पेचीदा सफर
जमीन से निकला कच्चा तेल सीधे आपकी गाड़ी में नहीं जा सकता। इसे रिफाइनरी भेजा जाता है, जहां डिस्टिलेशन के जरिए पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल (ATF) और एलपीजी (LPG) अलग किए जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों की मानें तो एक बैरल तेल को रिफाइन करने का खर्च औसतन 3 से 15 डॉलर (करीब 280 रुपए से 1400 रुपए) के बीच आता है। जो आधुनिक रिफाइनरियां हैं, वे 3 से 5 डॉलर में यह काम कर लेती हैं। रिफाइनिंग के बाद जो कमाई होती है, उसे 'ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन' (GRM) कहा जाता है। जब मांग बढ़ती है, तो कंपनियों का यह मार्जिन 10 से 15 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाता है।
टैक्स और सरकार का हिस्सा
भारत जैसे देशों में तेल की असल कीमत में सरकार का बड़ा हिस्सा होता है। कच्चे तेल की खरीद, ट्रांसपोर्टेशन और रिफाइनिंग के बाद उस पर एक्साइज ड्यूटी और वैट (VAT) लगाया जाता है। इसके अलावा, जब तेल कंपनियां भारी मुनाफा कमाती हैं, तो सरकार उन पर 'विंडफॉल टैक्स' भी लगाती है। यह सुनिश्चित करता है कि ग्लोबल मार्केट में कीमतों के उछाल से होने वाले अतिरिक्त मुनाफे में सरकार की भी हिस्सेदारी हो।
राजनीति और वर्चस्व का हथियार
आज के दौर में जब युद्ध और तनाव के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित होती है, तो अली अल-नैमी की यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह समझाता है कि कैसे बड़े तेल उत्पादक देश सप्लाई को घटाकर या बढ़ाकर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को अपने हिसाब से चला सकते हैं।
सीधी बात यह है कि सऊदी अरब जैसे देशों के लिए तेल उत्पादन एक बेहद सस्ता कारोबार है, लेकिन बाकी दुनिया के लिए यह राजनीति और अर्थव्यवस्था की सबसे महंगी धुरी है।
तेल की कीमतें आपकी जरूरत से ज्यादा इस बात पर निर्भर करती हैं कि दुनिया के शक्तिशाली देश अपनी बिसात पर कौन सी चाल चल रहे हैं।
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