ऑटो ड्राइवर से ₹900 करोड़ का मालिक बनने की कहानी: पुजारी के बेटे को विदेशी टूरिस्ट्स से मिला बिजनेस का 'मास्टर-आइडिया
सत्य शंकर ने 18 साल की उम्र में ऑटो ड्राइवर के रूप में अपना सफर शुरू किया और आज वे ...और पढ़ें

ऑटो चलाने से 900 करोड़ का कारोबार बनाने तक का सफर
HighLights
सत्य शंकर ने ऑटो ड्राइवर से शुरू किया सफर
'बिंदु' पानी और 'बिंदु फिज जीरा मसाला' बनाए
आज 900 करोड़ रुपये का विशाल साम्राज्य
नई दिल्ली। बिजनेस शुरू करने के लिए अकसर लोग नए आइडिया और सीक्रेट तलाश करते हैं। पर कई बार कोई आइडिया सामने होता है, जरूरत होती है उसे अंजाम तक पहुंचाने की। सत्य शंकर ने भी कुछ ऐसा ही किया। एक छोटे से आइडिया से उन्होंने सैकड़ों करोड़ का एम्पायर बना लिया। आइए जानते हैं कैसा रहा उनका सफर।
ऑटो चलाने से शुरू किया सफर
1984 में सत्य शंकर 18 साल के थे। उन्हें 12वीं कक्षा के बाद अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। उनके पिता बेल्लारे (कर्नाटक) में गाँव के एक गरीब पुजारी थे। वे बेटे को पढ़ा नहीं सकते थे, लिहाजा उन्होंने ऑटो-रिक्शा चलाने के लाइसेंस के लिए अप्लाई किया।
यह लाइसेंस गरीबी से बाहर निकलने का जरिया था। उन्होंने लोन लेकर ऑटो खरीदा और ऑटो चलाने लगे।
ऐसे सीखा पहला सबक
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार शंकर ने एक साल तक ऑटो चलाया, कड़ी मेहनत की, कर्ज चुकाया और फिर ऑटो बेचकर एंबेसडर कार ली। टैक्सी ड्राइवर के तौर पर उन्होंने नोटिस किया कि विदेशी पर्यटक, वे चाहे कहीं से भी आए हों, सबसे पहले बोतल बंद पानी खरीदते हैं। उनका ध्यान गया कि ये एक बिजनेस हो सकता है।
दूसरा सबक कैसे मिला?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 1988 आते-आते शंकर ने कार बेची और उन्हें लगा कि स्पेयर पार्ट्स का काम ज्यादा स्थिर है। उन्होंने पुत्तूर में ऑटोमोबाइल की एक छोटी दुकान खोली। उन्होंने नोटिस किया कि जो ग्राहक कोई पार्ट लेता, उसे टायर की भी जरूरत होती। लिहाजा, उन्होंने टायर की दुकान भी खोल ली।
फिर उन्हें पेमेंट के तरीके से एक और बात समझ आई। किसान और स्थानीय लोग पार्ट्स उधारी में खरीदते थे और किस्तों में पैसा चुकाते। शंकर को लगा कि अगर वे उन्हें थोड़ा-थोड़ा करके पैसे दे सकते हैं, तो वे बैंक को भी थोड़ा-थोड़ा करके पैसे दे सकते हैं। इसीलिए 1994 में, उन्होंने 'प्रवीण कैपिटल' नाम की एक फाइनेंस कंपनी शुरू की।
आम तौर पर फाइनेंसर पुराने वाहनों को नजरअंदाज करते, लेकिन शंकर ने सेकंड-हैंड ऑटो और कारों के लिए लोन देना शुरू किया। वह संघर्ष कर रहे ड्राइवर की परेशानी को समझते थे, क्योंकि वह खुद भी कभी ड्राइवर रह चुके थे।
ये था तीसरा सबक
15 सालों तक शंकर पानी का आइडिया नहीं भूले। फिर आया साल 2000, जब उन्होंने इस आइडिया पर काम शुरू किया। उन्होंने पुत्तूर के पास भारी बारिश वाले गाँव, नारिमोगेरू में एक फैक्ट्री लगाई और ब्रांड का नाम 'बिंदु' (कन्नड़ में 'बूंद') रखा।
वे पानी पर ही नहीं रुके। शंकर घूमते-फिरते रहते थे। एक बार उत्तर भारत की यात्रा के दौरान, वे सोडा बेचने वाली एक छोटी सी दुकान पर रुके। दुकानदार ने फिजी ड्रिंक में जीरा पाउडर और नमक मिलाया। उनके दोस्तों ने उसे पिया। शंकर ने उसे ध्यान से देखा। उन्होंने कहा कि मैं इसे और बेहतर बना सकता हूँ। मैं इसमें कुछ नयापन लाऊँगा। वे पुत्तूर वापस आए और 'बिंदु फिज जीरा मसाला' बनाया।
सीधे कामयाबी नहीं मिल गई
शुरू में उनका प्रोडक्ट आसानी से नहीं बिका। शंकर के अनुसार वे मार्केट में 200 बॉक्स भेजते, जिसमें से 100 वापस आ जाते, क्योंकि बाजार में कोक और पेप्सी जैसी बड़ी कंपनियों का दबदबा था। लेकिन शंकर घबराए नहीं। वे जानते थे कि लोग एक जैसा स्वाद पीकर ऊब गए हैं और कुछ नया-देसी ट्राई करना चाहते हैं।
विज्ञापन के लिए कम पैसे होने के चलते शंकर ने हाईवे पर दीवारों पर पेंटिंग करवाई। धीरे-धीरे, लोगों के बीच इसकी चर्चा होने लगी। मसालेदार, देसी खाने के साथ 'बिंदु फिज' (Bindu Fizz) लोगों की पसंदीदा ड्रिंक बन गई।
900 करोड़ रुपये के मालिक
अब शंकर 60 साल से अधिक उम्र के हैं। उनका ग्रुप, SG कॉर्पोरेट्स अब 900 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाला हो गया है। 'हाउस ऑफ बिंदु' (ड्रिंक्स और स्नैक्स) से 570 करोड़ रुपये की कमाई होती है। 'प्रवीण कैपिटल' (फाइनेंस विंग) से 330 करोड़ रुपये आते हैं।
उनकी कंपनी मशहूर जीरा मसाला से लेकर मैंगो जूस और स्नैक्स तक, 55 अलग-अलग तरह के प्रोडक्ट बेचती है। कंपनी की फैक्ट्रियाँ कर्नाटक और तेलंगाना में हैं। आंध्र प्रदेश में नई फैक्ट्रियाँ बन रही हैं।
