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कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और भारत की अर्थव्यवस्था पर गहराता संकट, कैसे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट है बड़ी टेंशन?

Published: Wed, 04 Mar 2026 09:26 AM (IST)

अमेरिका-इजराइल-ईरान तनाव से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव है। भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक तेल आयात करता है।

भारत के सामने कच्चे तेल को लेकर बड़ी चुनौती

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संक्षेप में पढ़ें

नई दिल्ली। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जो कि भारत के लिए भी चिंता का विषय है। इससे भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट, महंगाई और करेंसी स्टेबिलिटी पर दबाव पड़ सकता है। बता दें कि दुनिया की कई बड़ी ग्लोबल ब्रोकरेज कंपनियां भारत जैसी तेल के आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर तेल के दाम बढ़ने के असर का अनुमान लगा रही हैं, जिनमें जेपी मॉर्गन, मॉर्गन स्टेनली, गोल्डमैन सैक्स, मैक्वेरी, बर्नस्टीन, HSBC, DBS और नोमुरा शामिल हैं।

आयात बिल में हो सकता है इजाफा

जियोपॉलिटिकल तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड का रेट $80 प्रति बैरल के लेवल को पार कर गया है। भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है और मिडिल ईस्ट के सप्लायर्स पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जिसमें शिपमेंट का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है।
तेल की लगातार बढ़ती कीमतों से भारत के लिए आयात बिल बढ़ेगा और करंट अकाउंट डेफिसिट भी बढ़ेगा। इससे ब्रोकरेज का अनुमान है कि महंगाई के संभावित दबाव और अगर एनर्जी की ऊंची कीमतें बनी रहती हैं तो कैपिटल फ्लो का रिस्क भी बढ़ सकता है।

होर्मुज स्ट्रेट पर बहुत कुछ निर्भर

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जेपी मॉर्गन के अनुसार अहम बात यह है कि होर्मुज स्ट्रेट से होने वाली सप्लाई में रुकावट आती है या नहीं। अगर लड़ाई कम होती है और सप्लाई काफी हद तक बनी रहती है, तो रिस्क कम होने की उम्मीद है। मगर भारत के लिए, लंबे समय तक कच्चे तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर इम्पोर्ट लागत में बढ़ोतरी का कारण बनेंगी।

गैस इम्पोर्ट कॉस्ट बढ़ सकती है

जेपी मॉर्गन के मुताबिक भारत के लिए, कच्चे तेल की लगातार ऊंची कीमतें महंगाई और एक्सटर्नल बैलेंस पर दबाव डालेंगी। ब्रोकरेज ने फॉर्मल GDP रिवीजन का संकेत नहीं दिया, लेकिन एनर्जी की कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति सेंसिटिविटी पर जोर दिया है।
वहीं गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि क्रूड मार्केट में अभी लगभग $18 प्रति बैरल का रियल-टाइम रिस्क प्रीमियम है। यह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में एक महीने के लिए पूरी तरह से रुकावट की कीमत के बराबर है। इसने बताया कि ग्लोबल तेल सप्लाई का लगभग 20% और LNG फ्लो का लगभग 19% स्ट्रेट से होकर गुजरता है।
भारत के लिए, क्रूड की लगातार ऊंची कीमतें इम्पोर्ट बिल बढ़ाएंगी और करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ाएंगी, जबकि LNG में रुकावट से गैस इम्पोर्ट कॉस्ट बढ़ सकती है।

जीडीपी पर भी पड़ेगा असर

नोमुरा का मानना है कि भारत उन एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है जो तेल की ऊंची कीमतों के असर से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती है, क्योंकि यह इंपोर्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर है। इसका अनुमान है कि तेल की कीमतों में हर 10% की बढ़ोतरी से भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट GDP का लगभग 0.4% बढ़ सकता है।
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आम तौर पर महंगाई बढ़ाती हैं और ग्रोथ को कम करती हैं। हालांकि पेट्रोल और डीजल की कीमतें अनऑफिशियली तय रहती हैं, और तेल मार्केटिंग कंपनियां इस झटके का कुछ हिस्सा झेलती हैं।
मौजूदा व्यवस्थाओं के तहत, उसे ग्रोथ और महंगाई दोनों पर लगभग 0.1 परसेंट पॉइंट का सीमित असर होने की उम्मीद है।

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