यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 05, 2014 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
महंगे कर्ज से अभी राहत नहीं
वित्त मंत्री अरुण जेटली चाहते हैं कि आम जनता के लिए किराये पर लेने के बजाय कर्ज लेकर मकान खरीदना ...और पढ़ें

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। वित्त मंत्री अरुण जेटली चाहते हैं कि आम जनता के लिए किराये पर लेने के बजाय कर्ज लेकर मकान खरीदना सस्ता हो जाए। लेकिन रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के गवर्नर रघुराम राजन कहीं से भी जेटली की राह चलते नहीं दिख रहे। मौद्रिक नीति की द्विमासिक समीक्षा करते हुए केंद्रीय बैंक ने अपनी ब्याज दरों (रेपो व रिवर्स रेपो) में कोई कमी नहीं की है। लिहाजा होम, ऑटो व पर्सनल लोन ले चुके लोगों को मासिक किस्त में राहत नहीं मिलेगी। बैंकों को कर्ज की खातिर ज्यादा फंड मुहैया कराने के लिए वैधानिक तरलता अनुपात में जरूर आधा फीसद की कमी की गई है।
केंद्र में राजग की सरकार बनने के बाद आरबीआइ ने दूसरी बार मौद्रिक नीति की समीक्षा की है, लेकिन दोनों बार ब्याज दरों को स्थिर रखा है। इससे आरबीआइ गवर्नर ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि ब्याज दरें घटाना नहीं, बल्कि महंगाई को काबू में लाना उनकी पहली प्राथमिकता है। हालांकि बाद में राजन ने कहा कि वह ब्याज दरों को जरूरत से ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर कभी नहीं रखेंगे। लेकिन महंगाई घटने के पुख्ता सबूत मिलने तक ब्याज दरों में नरमी की सूरत नहीं बनेगी। पर्याप्त बारिश नहीं होने की वजह से खाद्य उत्पादों में महंगाई बढ़ने का खतरा बरकरार है।
केंद्रीय बैंक के इस रुख को देखकर कई जानकार यह मानने लगे हैं कि ब्याज दरों में नरमी की अब जनवरी, 2015 के बाद ही उम्मीद लगाई जा सकती है। आरबीआइ ने बैंकों के पास ज्यादा फंड मुहैया कराने के उद्देश्य से वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) को 0.5 फीसद घटाकर 22 फीसद कर दिया है। इससे बैंकों के पास कर्ज बांटने के लिए 40,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि उपलब्ध होगी। जमाओं का वह हिस्सा जो बैंकों को अनिवार्य रूप से सरकारी प्रतिभूतियों में रखना पड़ता है, एसएलआर कहलाता है। इस मामले में वित्त मंत्री ने कहा है कि जब अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ेगी, तो मांग बढ़ेगी। इससे बैंकों से कर्ज का उठाव भी बढ़ेगा।
जानकारों के मुताबिक, वैधानिक तरलता अनुपात में कटौती से ब्याज दरों में नरमी की संभावना नहीं है, क्योंकि बैंको के पास फंड की कोई कमी नहीं है। राजन का कहना है कि अगर सरकार को राजकोषीय घाटे पर काबू पाने में सफलता मिली तो एसएलआर में और कटौती संभव है। इससे बैंक अपने फंड का इस्तेमाल ज्यादा बेहतर तरीके से कर सकेंगे।
'तरलता, महंगाई और विकास को ध्यान में रखकर आरबीआइ को ब्याज दरें तय करनी चाहिए। सरकार विकास दर को बढ़ाने और महंगाई को काबू में करने की पूरी कोशिश कर रही है। महंगाई कम होने के बाद उम्मीद है ब्याज दरों को घटाया जाएगा।'
-वित्त मंत्रालय
'महंगाई में नरमी साफ दिख रही है, जबकि औद्योगिक क्षेत्र की हालात खराब है। ऐसे में उम्मीद थी कि आरबीआइ ब्याज दरों को घटाकर निवेशकों व बाजार को एक मजबूत संकेत देता। महंगे कर्ज की वजह से ही नए निवेश नहीं आ रहे हैं।' -सीआइआइ
