RBI ने टाटा संस की लिस्टिंग से बचने की अर्जी ठुकराई, अब स्टॉक मार्केट में होगी एंट्री?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने टाटा संस की नॉन-बैंक लेंडर के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन रद्द करने की अर्जी ठुकरा ...और पढ़ें

RBI ने टाटा संस की लिस्टिंग से बचने की अर्जी ठुकराई।
HighLights
RBI ने टाटा संस की रजिस्ट्रेशन रद्द करने की अर्जी खारिज की।
यह फैसला टाटा संस को स्टॉक मार्केट लिस्टिंग के करीब लाया।
कंपनी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी नियमों के तहत लिस्ट होने को बाध्य।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। भारत के सेंट्रल बैंक और बैंकिंग रेगुलेटर, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने टाटा संस की नॉन-बैंक लेंडर के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन रद्द करने की अर्जी को ठुकरा दिया है। इस फैसले से कंपनी स्टॉक मार्केट में लिस्ट होने के और करीब आ गई है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के दो सूत्रों के अनुसार, टाटा संस ने RBI से कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के तौर पर अपना रजिस्ट्रेशन रद्द करने के लिए अर्जी दी थी।
100 साल से ज्यादा पुराना टाटा ट्रस्ट टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), टाटा मोटर्स, टाटा स्टील और एयर इंडिया जैसे कई बिजनेस को कंट्रोल करता है। टाटा ट्रस्ट पब्लिक लिस्ट होना चाहता और प्राइवेट कंपनी ही बना रहना चाहता है।
इसे कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के तौर पर क्लासिफाई किया गया है और यह नॉन-बैंक लेंडर्स (NBFC) के लिए RBI के नियमों के दायरे में आती है। इन नियमों के मुताबिक, जिन कंपनियों की एसेट्स 1 लाख करोड़ रुपये ($10.45 बिलियन) से ज्यादा हैं, या जिनकी पब्लिक फंड्स तक सीधी या इनडायरेक्ट पहुंच है, उन्हें लिस्ट होना जरूरी है। मार्च 2025 तक, टाटा संस की स्टैंडअलोन एसेट्स कुल 1.75 लाख करोड़ रुपये थीं।
एजेंसी सूत्रों ने बताया कि RBI ने शनिवार को एक लेटर के जरिए यह फैसला बताया। उन्होंने अपनी पहचान जाहिर नहीं करने को कहा क्योंकि उन्हें मीडिया से बात करने की इजाजत नहीं है।
RBI, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स (जो टाटा संस में सबसे बड़ा शेयरहोल्डर है) को भेजे गए ईमेल का कोई जवाब नहीं मिला।
अब तक, टाटा संस अनलिस्टेड रही है। लेकिन इस साल स्टेकहोल्डर्स, जिसमें दूसरा सबसे बड़ा शेयरहोल्डर शापूरजी पलोनजी ग्रुप भी शामिल है, की तरफ से पब्लिक होने का दबाव बढ़ा है। पिछले महीने, टाटा संस ने कहा था कि उसके चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन दोबारा अपॉइंटमेंट नहीं चाहेंगे, जिससे ग्रुप अनिश्चितता में घिर गया।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चंद्रशेखरन ने अपने फैसले के पीछे बोर्ड से समर्थन न मिलने का कारण बताया। यह फैसला टाटा ट्रस्ट्स (चैरिटी विंग जिसके पास टाटा संस की 66% हिस्सेदारी है) के साथ महीनों तक चले तनाव के बाद लिया गया।
