टाटा संस की लिस्टिंग कराने पर RBI क्यों है अड़ा? लिस्टिंग के बाद टाटा संस की फंडिंग, निवेश तरीके पर बदलाव संभव
RBI टाटा संस की लिस्टिंग पर अड़ा है, जिसे शापूर मिस्त्री ने नैतिक अनिवार्यता बताया है, जबकि नोएल टाटा इसका ...और पढ़ें

टाटा संस की लिस्टिंग कराने पर RBI क्यों है अड़ा? (AI फोटो)
HighLights
RBI ने टाटा संस को अपर लेयर NBFC के रूप में चिन्हित किया।
शापूर मिस्त्री ने लिस्टिंग को नैतिक अनिवार्यता कहा, नोएल टाटा विरोध में।
लिस्टिंग से निवेशकों को फायदा और समूह में गवर्नेंस बेहतर होगी।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली| टाटा संस की लिस्टिंग कराने पर RBI क्यों अड़ा हुआ है, यह सवाल गुरुवार की बोर्ड बैठक और शुक्रवार को शापूर मिस्त्री की चिट्ठी के बाद और तीखा हो गया है। समूह के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को पांच साल का नया कार्यकाल मिलता नजर आ रहा है, नोएल टाटा अकेले विरोध में खड़े रहे और शापूरजी पलोनजी (एसपी) समूह के चेयरमैन शापूर मिस्त्री ने पत्र जारी कर लिस्टिंग को अब नैतिक अनिवार्यता बता दिया है।
इससे साफ है कि समूह का सबसे बड़ा आंतरिक विवाद यही है, जबकि RBI के 11 सितंबर के रुख सेही साफ हो गया है कि अपर लेयर एनबीएफसी होने और ग्रुप कंपनियों में निवेश के कारण अप्रत्यक्ष पब्लिक फंड मिलने के कारण टाटा संस का शेयर बाजार में उतरना अनिवार्य है।
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत सितंबर 2022 में तब हुई जब RBI ने टाटा संस को अपर लेयर एनबीएफसी और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के रूप में चिन्हित किया था। अपर लेयर एनबीएफसी की श्रेणी में वो कंपनियां शामिल है जिनकी परिसंपत्तियों का आकार एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है और जो देश के वित्तीय ढांचे के लिए महत्वपूर्ण हैं।
नियम के मुताबिक ऐसी कंपनियों को तीन साल के भीतर शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य है। टाटा संस की स्टैंडअलोन संपत्ति एक लाख करोड़ रुपये की सीमा से काफी ऊपर, करीब दो लाख करोड़ रुपये है। ऐसा नहीं है कि टाटा संस निदेशक मंडल शुरू से ही RBI के नियमों के पालन करने के पक्ष में थी। जब तक संभव हुआ, इसको टालने की कोशिश की गई। यहां तक कंपनी ने 2024 में कर्ज चुकाकर सीआइएस रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की कोशिश की, ताकि एनबीएफसी के दायरे से बाहर निकला जाए। लेकिन RBI ने 11 सितंबर 2026 को वह अर्जी खारिज कर दी।
RBI का तर्क है कि टाटा समूह की लिस्टेड कंपनियां बाजार से पब्लिक फंड जुटाती हैं और उनमें से कुछ टाटा संस में हिस्सेदारी भी रखती हैं, इसलिए होल्डिंग कंपनी को अप्रत्यक्ष रूप से पब्लिक फंड मिलता है। लिहाजा टाटा संस की भी पूरी व सतर्क निगरानी होनी चाहिए।
मोटे तौर पर यह माना जा रहा है कि टाटा संस की लिस्टिंग से बाजार और निवेशकों दोनों को सीधा फायदा होगा। लिस्टिंग के बाद आम निवेशक समूह की टीसीएस, टाटा मोटर्स या टाटा स्टील जैसी कंपनियों से आगे बढ़ कर अब मुख्य होल्डिंग कंपनी में निवेश कर सकेंगे।
टाटा स्टील, टाटा केमिकल्स और टाटा पावर जैसी लिस्टेड कंपनियां टाटा संस में हिस्सेदारी रखती हैं, लिस्टिंग के बाद इनके बाजार मूल्य पर भी सकारात्मक असर पड़ने की संभावना विशेषज्ञ जता रहे हैं। मोटे तौर पर इन सभी कंपनियों का वैल्यूएशन बढ़ेगा। साथ ही स्वतंत्र निदेशक, सेबी के नियमों के मुताबिक होने वाले खुलासे और बाजार के नियमों का पालन करने से पूरे समूह में गवर्नेंस का स्तर और बेहतर होगा। टाटा संस खुद सेमीकंडक्टर या एयर इंडिया जैसे बड़ी परियोजनाओं के लिए बाजार से पूंजी जुटा सकेगी।
नोएल टाटा और टाटा ट्रस्ट्स लिस्टिंग के विरोध के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह है कि इनके पास टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है और अभी इसके कामकाज पर उनका सबसे ज्यादा इसकी चलती है।
लिस्टिंग के बाद बाजार नियामक एजेंसी के मुताबिक बहुत कुछ करना होगा। बाजार में प्रवेश के बाद हर तिमाही नतीजों का दबाव रहेगा, जिससे दीर्घकालिक निवेश योजनाओं पर काम करना मुश्किल होगा। ऐसे में जब टाटा ट्रस्ट्स का नियंत्रण कमजोर होगा तो अनचाहे अधिग्रहण का खतरा भी बढ़ेगा। नोएल टाटा का कहना है कि इससे टाटा संस का सौ साल से चला आ रहा चरित्र बदल जाएगा।
