बजाज ग्रुप का वो दिग्गज जो कहलाया 'गांधीजी का कुली', प्रॉफिट नहीं, समाजसेवा पर लुटाया जीवन
रामकृष्ण बजाज, जिनका आज जन्मदिन है, एक ऐसे उद्योगपति थे जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई और महात्मा गांधी ...और पढ़ें
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रामकृष्ण बजाज का आज है जन्मदिन
HighLights
रामकृष्ण बजाज ने स्वतंत्रता संग्राम और उद्योग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
वे महात्मा गांधी के करीबी थे
खुद को "गांधीजी का कुली" कहते थे
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। ऐसे कई बिजनेसमैन रहे, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा है। इनमें से एक हैं रामकृष्णन बजाज, जिनका आज जन्मदिन है। जरा कल्पना कीजिए — वर्धा की एक शांत सुबह एक युवा रामकृष्ण बजाज महात्मा गांधी के पास बैठे हैं। सामने चरखा चल रहा है और आसपास स्वतंत्रता आंदोलन की हलचल है।
गांधीजी उनसे कोई बड़ा भाषण देने को नहीं कहते, बल्कि एक छोटा-सा काम सौंपते हैं। रामकृष्ण उसे पूरे मन से करते हैं। शायद यही वह भावना थी, जिसने आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को गढ़ा।
22 सितंबर 1923 को जन्मे रामकृष्ण बजाज ने जीवन में उद्योगपति, स्वतंत्रता सेनानी और समाजसेवी — तीनों भूमिकाएं निभाईं। अपनी विनम्रता के लिए वे खुद को “महात्मा गांधी का कुली” कहना पसंद करते थे।
जमनालाल बजाज के बेटे
रामकृष्ण बजाज, जमनालाल बजाज के छोटे बेटे थे। उनके पिता महात्मा गांधी के बेहद करीबी सहयोगी थे और गांधीजी उन्हें अपना “पांचवां बेटा” तक कहते थे। इसी माहौल में रामकृष्ण का बचपन बीता। जमनालाल बजाज, बजाज ग्रुप के फाउंडर हैं।
पढ़ाई से स्वतंत्रता आंदोलन तक
रामकृष्ण ने वर्धा के नवभारत विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की। किशोरावस्था में ही वे राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गए। 1941 में, नाबालिग होने के बावजूद, उन्हें गांधीजी की विशेष अनुमति से व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने का मौका मिला।
भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा और स्वतंत्रता संघर्ष के वर्षों में उन्होंने लगभग चार साल कारावास में बिताए। जेल में उन्होंने विनोबा भावे से संस्कृत भी सीखी।
“गांधीजी का कुली” क्यों कहते थे?
“महात्मा गांधी का कुली” कहलाने के पीछे सेवा और जिम्मेदारी की भावना थी। रामकृष्ण मानते थे कि नेतृत्व का अर्थ केवल अधिकार हासिल करना नहीं, बल्कि समाज और देश के लिए काम करना है। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने युवाओं के बीच भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने युवा विकास से जुड़ी संस्थाओं के निर्माण में योगदान दिया।
बजाज ग्रुप की कमान
1972 में बड़े भाई कमलनयन बजाज के निधन के बाद रामकृष्ण बजाज ने बजाज ग्रुप की जिम्मेदारी संभाली। कमलनयन के दौर में ग्रुप का औद्योगिक विस्तार हो चुका था और कारोबार ऑटोमोबाइल समेत कई क्षेत्रों में पहुंच चुका था।
रामकृष्ण ने इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए बिजनेस में नैतिकता, निष्पक्षता और सामाजिक जिम्मेदारी को विशेष महत्व दिया।
कारोबार कैसे किया जाए?
रामकृष्ण का जोर केवल कारोबार बढ़ाने पर नहीं, बल्कि कैसे कारोबार किया जाए, इस सवाल पर भी था। वे कारोबारी टार्गेट्स को समाज के हित से जोड़ने के पक्षधर थे। इसी सोच के कारण वे Council for Fair Business Practices और Advertising Standards Council of India जैसी संस्थाओं के संस्थापकों में शामिल रहे।
बनाई अपनी अलग पहचान
रामकृष्ण बजाज की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने पिता जमनालाल बजाज की विरासत को केवल कंपनियों और कारोबार के रूप में नहीं देखा। उन्होंने उसमें गांधीवादी विचार, सेवा, नैतिकता और जिम्मेदारी भी देखी। शायद इसीलिए “गांधीजी का कुली” कहलाने वाला यह उद्योगपति भारतीय कारोबारी इतिहास में अपनी अलग पहचान बना सका।
