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कौन हैं निकेश अरोड़ा? कभी बेचते थे बर्गर, आज ₹9150 करोड़ से ज्यादा की दौलत; दिलचस्प है गाजियाबाद से अमेरिका पहुंचने की कहानी

Published: Tue, 29 Sep 2026 01:23 PM (IST)Updated: Tue, 29 Sep 2026 02:39 PM (IST)

Nikesh Arora Success Story: निकेश अरोड़ा, जो कभी अमेरिका में बर्गर बेचते थे और 400 से अधिक रिजेक्शन झेल चुके ...और पढ़ें

बर्गर बेचने वाले निकेश अरोड़ा आज हैं अरबों के मालिक, जानें गाजियाबाद से अमेरिका तक की उनकी कहानी

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बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| गाजियाबाद में जन्मे निकेश अरोड़ा की कहानी उस सफर की है, जिसमें एक समय अमेरिका पहुंचने के लिए उनके पास सिर्फ कुछ सौ डॉलर थे। पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए उन्हें बर्गर तक बेचने पड़े। इतना ही नहीं, नौकरी के लिए भेजी गई 400 से ज्यादा अर्जियां तक खारिज हो गईं। आज वही निकेश अरोड़ा (Nikesh Arora success story) अमेरिका की मल्टीनेशनल साइबर सिक्योरिटी कंपनी पालो अल्टो नेटवर्क्स के सीईओ और चेयरमैन हैं और एक वित्तीय वर्ष में उनकी कुल कमाई 151.4 मिलियन डॉलर यानी करीब 1,454 करोड़ रुपए से ज्यादा पहुंच चुकी है। हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2025 (Hurun India Rich List 2025) में उनकी संपत्ति ₹9,190 करोड़ (Nikesh Arora net worth) आंकी गई है।

गाजियाबाद में जन्म, एयरफोर्स परिवार में बीता बचपन

निकेश अरोड़ा का जन्म 9 फरवरी 1968 को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद (Ghaziabad to America success story) में हुआ था। उनके पिता भारतीय वायुसेना में अधिकारी थे। पिता की पोस्टिंग के कारण परिवार को अलग-अलग जगहों पर रहना पड़ा। निकेश ने कई केंद्रीय विद्यालयों में पढ़ाई की और बाद में दिल्ली के द एयर फोर्स स्कूल से स्कूली शिक्षा पूरी की। एयरफोर्स परिवार का माहौल अनुशासन और सीमित संसाधनों के बीच आगे बढ़ने वाला था। निकेश बाद में कहते रहे हैं कि संसाधनों की कमी इंसान को कम में ज्यादा करने का तरीका सिखाती है।

IIT (BHU) से पढ़ाई, Wipro में पहली नौकरी

निकेश अरोड़ा ने आईआईटी (बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी) वाराणसी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग (Nikesh Arora IIT BHU) की पढ़ाई की और 1989 में ग्रेजुएशन पूरा किया। पढ़ाई के बाद उन्होंने विप्रो में नौकरी की। यहां उनका काम सरकारी ग्राहकों को मिनीकंप्यूटर बेचना था।

इस दौरान वह मोटरसाइकिल से घूम-घूमकर सरकारी बिक्री का काम करते थे। लेकिन जल्द ही उन्होंने आगे पढ़ाई करने का फैसला किया और अमेरिका जाने की तैयारी शुरू कर दी। पैसे की कमी को देखते हुए उन्होंने ऐसी यूनिवर्सिटीज को आवेदन भेजे, जहां आवेदन शुल्क नहीं था। इन्हें वह "जीरो डॉलर्स" एप्लीकेशन कहते थे।

अमेरिका पहुंचे तो जेब में थे सिर्फ कुछ सौ डॉलर

निकेश को नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी (Northeastern University) में दाखिला मिला और स्कॉलरशिप भी मिली। लेकिन स्कॉलरशिप की शर्त के तौर पर उन्हें कंप्यूटर साइंस पढ़ाना पड़ा। यानी जिस विषय को पढ़ाना था, उसे खुद अच्छी तरह सीखना भी था। अमेरिका में शुरुआती दिन बेहद मुश्किल थे। उन्होंने बताया है कि,

"वह रात में पढ़ाते थे और पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए अलग-अलग काम करते थे। उनके मुताबिक अमेरिका पहुंचते समय उनके पास सिर्फ दो सूटकेस और करीब 200 डॉलर थे।"

उन्होंने सुरक्षा गार्ड की नौकरी की, दिव्यांग लोगों के लिए नोट्स लिखने का काम किया और बर्गर किंग में बर्गर भी बेचे। मकसद सिर्फ एक था- ट्यूशन फीस भरना और अमेरिका में अपना जीवन खड़ा करना।

बाद में उन्होंने नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी से MBA और बॉस्टन कॉलेज से फाइनेंस में एमएस किया। इसके साथ उन्होंने CFA क्वालिफ़िकेशन भी हासिल की।

400 से ज्यादा कंपनियों ने किया रिजेक्ट

बिजनेस स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद निकेश ने नौकरी के लिए 400 से ज्यादा आवेदन भेजे। जवाब ज्यादातर नकारात्मक आए। उन्होंने इन रिजेक्शन लेटर को संभालकर रखा। एक बार तो प्रिंटर की स्याही खत्म होने के कारण रिजेक्शन लेटर आधा ही प्रिंट हुआ, लेकिन निकेश समझ गए कि जवाब फिर वही है- नौकरी नहीं। उन्होंने बताया कि 400 से ज्यादा आवेदन भेजे और 400 से ज्यादा बार रिजेक्शन मिला। यही लेटर बाद में उनके लिए प्रेरणा बन गए।

उस समय उनका सपना बहुत बड़ा नहीं था। अमेरिका पहुंचने के बाद उन्होंने सोचा था कि अगर वह 100,000 डॉलर कमा लेते हैं तो वापस भारत लौटकर आराम से जिंदगी बिता सकते हैं। उनकी शुरुआती सालाना सैलरी करीब 2,600 डॉलर थी। आखिरकार 1992 में फिडेलिटी इन्वेस्टमेंट्स ने उन्हें नौकरी दे दी।

फिडेलिटी से गूगल तक पहुंचा करियर

निकेश ने फिडेलिटी इन्वेस्टमेंट्स और पुटनम इन्वेस्टमेंट्स (Putnam Investments) में काम किया। इसके बाद उन्होंने डायचे टेलीकॉम (Deutsche Telekom) के 3G बिजनेस से जुड़े T-Motion नाम की कंपनी भी शुरू की, जिसका बाद में टी-मोबाल इंटरनेशनल (T-Mobile International) के साथ विलय हो गया।

2004 में उन्होंने गूगल ज्वाइन किया। दिलचस्प बात यह है कि उनका इंटरव्यू पारंपरिक ऑफिस में नहीं हुआ था। गूगल के को-फाउंडर सर्गेई ब्रिन ने लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में घूमते हुए उनका इंटरव्यू लिया था।

गूगल में वह यूरोप के लिए कंपनी के पहले एक्टरनल वाइस प्रेसिडेंट बने। अगले करीब 10 वर्षों में वह कई वरिष्ठ पदों पर पहुंचे और सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और चीफ बिजनेस ऑफिसर बने। गूगल ने उनके कार्यकाल में सर्च बिजनेस के राजस्व को करीब $2 बिलियन से बढ़कर $60 बिलियन से ज्यादा पहुंचने का श्रेय दिया।

सॉफ्टबैंक के बाद पालो अल्टो नेटवर्क्स की कमान

2014 में निकेश अरोड़ा सॉफ्टबैंक पहुंचे और प्रेसिडेंट और सीओओ बने। उन्होंने कंपनी के फाउंडर Masayoshi Son के साथ काम किया। उन्हें संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर भी देखा जा रहा था, लेकिन Son ने लंबे समय तक पद पर बने रहने का फैसला किया। करीब दो साल बाद निकेश SoftBank से अलग हो गए। 2018 में उनके करियर ने फिर बड़ा मोड़ लिया। Palo Alto Networks ने उन्हें CEO और Chairman नियुक्त किया।

खास बात यह थी कि उनका पारंपरिक साइबर सिक्योरिटी बैकग्राउंड नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने कंपनी को क्लाउड सिक्योरिटी और AI आधारित साइबर सिक्योरिटी की ओर तेजी से बढ़ाया।

18 बिलियन डॉलर की कंपनी से करीब $100 बिलियन तक

जब निकेश अरोड़ा Palo Alto Networks से जुड़े थे, तब कंपनी का मूल्य करीब $18 बिलियन था। कंपनी के अनुसार अब उसके 16,000 से ज्यादा कर्मचारी और 70,000 ग्राहक हैं और उसका मार्केट वैल्यू करीब $100 बिलियन है। कंपनी ने क्लाउड सिक्योरिटी और AI पर जोर दिया और अधिग्रहणों को अपनी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

एक साल में $151.4 मिलियन का पैकेज

निकेश अरोड़ा की कमाई का सबसे ज्यादा चर्चा वाला आंकड़ा वित्त वर्ष 2023 का है। पालो अल्टो नेटवर्स्क की आधिकारिक प्रॉक्सी स्टेटमेंट के मुताबिक उनकी कुल कंपनसेशन $151.4 मिलियन थी। हालांकि यह पूरी रकम कैश सैलरी नहीं थी। उनकी बेस सैलरी $750,000 थी, जबकि करीब $145.4 मिलियन स्टॉक अवॉर्ड्स के रूप में थे। इसके अलावा इंसेंटिव और दूसरी रकम भी शामिल थी। हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2025 के मुताबिक निकेश अरोड़ा की संपत्ति ₹9,190 करोड़ आंकी गई। इस सूची में इंडिया और इंडिया ओरिजिन प्रोफेशनल्स मैनेजर्स में वह तीसरे स्थान पर थे।

अब AI से AI की सुरक्षा की तैयारी

निकेश अरोड़ा का मानना है कि AI के दौर में भारत के लिए सिर्फ सबसे बड़े मॉडल बनाना जरूरी नहीं है। स्थानीय डेटा, भाषाओं, संस्कृति और जरूरतों के हिसाब से वैश्विक AI को इस्तेमाल करना भी बड़ा अवसर हो सकता है। उनका तर्क है कि अमेरिका की सड़कों पर प्रशिक्षित सेल्फ ड्राइविंग कार को भारतीय सड़कों के लिए अलग तरह के डेटा और स्थानीय समझ की जरूरत होगी।

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