यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 09, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सेकेंडों में लोगों की जेब काट रहा मोबाइल
आप यह समझने की भूल हरगिज न करें कि मोबाइल पर जितने मिनट या सेकेंड बात की, उतने के ही रुपये जाते हैं।

बरेली। आप यह समझने की भूल हरगिज न करें कि मोबाइल पर जितने मिनट या सेकेंड बात की, उतने के ही रुपये जाते हैं। कहने को आप बात खत्म होने पर फोन काट देते हैं पर ऐसा होता नहीं है। पांच से छह सेकेंड तक फिर भी कॉल जारी रहती है। फोन में यह आपको दिखाई न देता हो, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों के खाते में वह तुरंत जुड़ जाता है। फिर उसी के हिसाब से आपके एकाउंट के पैसे काट लिए जाते हैं। यानी, महज सेकेंडों को बटोरकर करोड़ों के वारे-न्यारे किए जा रहे रोजाना।
इस तरह होता है खेल : फोन से कॉल लगाने के बाद सेकेंड शुरू हो जाते हैं। कॉल काटने के बाद उपभोक्ता फोन को जेब में रख लेता है। इस प्रक्रिया में तीन-चार सेकेंड का फर्क होता है, लेकिन कॉल काटने के बाद भी फोन में चल रही कॉल टाइमिंग में दो-तीन और पांच से सात सेकंड तक बढ़ जाते हैं। अगर हम एक कॉल पर चार से पांच सेकेंड बढ़े हुए मानें तो उपभोक्ता की जेब से इतने पैसे ही कट जाते हैं। वजह, औसतन एक सेकेंड कॉल का एक पैसा तो जाता ही है। खेल सिर्फ बातचीत के बाद कॉल कटने पर नहीं होता। कुछ कंपनियों में तो घंटी जाने के साथ ही कॉल की पल्स रेट शुरू हो जाती है।
ऐसे बनते करोड़ों : कोई भी उपभोक्ता एक दिन में औसतन दस बार कॉल करता है। इसका मतलब वह कंपनी को दस पैसे मुफ्त में देता है। अगर किसी कंपनी के एक करोड़ उपभोक्ता हैं तो कंपनी के खाते में 10 लाख रुपये रोजाना फ्री में आ जाते हैं। यही रकम महीने में तीन करोड़ और साल में 36 करोड़ हो जाती है।
उपभोक्ताओं की इस समस्या का हल शिकायत दर्ज कराने पर हो सकता है। ऐसा कोई एक कंपनी कर रही है या कई, इसकी जांच भी तब ही हो सकती है।
-राजीव सिन्हा, डीडीजी (टर्म), टेलीकॉम निदेशालय
