India-US Trade Deal: अमेरिका से ट्रेड डील पर फंसा पेच! वित्त मंत्री बोलीं- "आगे की राह में रियायत देना मुश्किल"
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की बातचीत एक ऐसे पड़ाव पर पहुंच गई है, जहां दोनों देशों के लिए और रियायतें देना मुश्किल हो रहा है।

अमेरिका-भारत ट्रेड डील पर क्या हुआ? (ai photo)
HighLights
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता 'प्लैट्यू' पर, रियायतें देना कठिन।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, टैरिफ अब 'हथियार' बन गए हैं।
ट्रेड डील में संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा महत्वपूर्ण, EU डील का उदाहरण।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील (India-US trade deal) को लेकर लंबे समय से चल रही बातचीत अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां दोनों देशों के लिए एक-दूसरे को और रियायत देना आसान नहीं होगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि दोनों देश बातचीत जारी रखे हुए हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि वार्ता एक तरह के ‘प्लैट्यू’ यानी ऐसे पड़ाव पर पहुंच गई है, जिसके आगे बढ़ना काफी मुश्किल हो सकता है।
‘आगे देना या लेना बहुत मुश्किल’
5 अक्टूबर को नई दिल्ली में Munich Leaders Meeting में बोलते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच बातचीत अभी खत्म नहीं हुई है। हालांकि, दोनों पक्ष ऐसे स्तर पर पहुंच गए हैं, जहां इसके आगे कुछ देना या लेना “बहुत-बहुत मुश्किल” हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर बातचीत में आगे बढ़ने की कोई गुंजाइश बची है तो दोनों देश उसे तलाश सकते हैं।
वित्त मंत्री ने मौजूदा समझौते को काफी कठिन और बेहद गंभीर बातचीत के बाद तैयार हुआ प्रस्ताव बताया। उन्होंने कहा कि ट्रेड बैलेंस भारत के पक्ष में है और अमेरिका अपने ट्रेड डेफिसिट को कम करना चाहता है। अमेरिका की तरफ से पिछले वर्षों में हुए व्यापारिक नुकसान की भरपाई के लिए भारत से कुछ और रियायतें मांगी जा रही हैं।
फरवरी में बना था ट्रेड डील का फ्रेमवर्क
भारत और अमेरिका के बीच व्यापक Bilateral Trade Agreement (BTA) पर बातचीत फरवरी 2025 में शुरू हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 13 फरवरी 2025 को इसकी प्रक्रिया शुरू करने पर सहमति जताई थी। इसके बाद फरवरी 2026 में दोनों देशों ने एक इंटरिम ट्रेड एग्रीमेंट का फ्रेमवर्क घोषित किया था। इसमें टैरिफ में कमी, गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करना, बाजार तक बेहतर पहुंच और सप्लाई चेन में सहयोग जैसे मुद्दे शामिल थे। डिजिटल ट्रेड और अतिरिक्त मार्केट एक्सेस पर भी आगे बातचीत की बात कही गई थी।
हालांकि, यह फ्रेमवर्क अंतिम ट्रेड डील नहीं था और दोनों देशों के बीच बातचीत आगे भी जारी रही। हाल में अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव Jamieson Greer ने भी कहा था कि डील पर काम चल रहा है, लेकिन समझौता अभी तत्काल होने वाला नहीं है और कुछ अहम मुद्दे अब भी अटके हुए हैं।
टैरिफ को लेकर भी उठाए सवाल
वित्त मंत्री ने ट्रेड असंतुलन दूर करने के लिए टैरिफ के बढ़ते इस्तेमाल पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि पहले टैरिफ बातचीत के एक तय फ्रेमवर्क के भीतर बातचीत का जरिया हुआ करते थे, लेकिन अब “टैरिफ हथियार बन गया है”। उन्होंने चीन के साथ भारत के ट्रेड डेफिसिट का भी जिक्र किया। सीतारमण के मुताबिक, 2014 के बाद से चीन के साथ भारत का व्यापार असंतुलन काफी तेजी से बढ़ा है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर हर ट्रेड असंतुलन को टैरिफ के जरिए ही ठीक किया जाए, तो क्या भारत भी चीन के खिलाफ उसी तरह का रास्ता अपना सकता है।
EU के साथ डील का भी दिया उदाहरण
सीतारमण ने भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए ट्रेड समझौते का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत बातचीत के दौरान अपने संवेदनशील क्षेत्रों के हितों की रक्षा कर रहा है। उन्होंने इसे “mother of all deals” बताते हुए कहा कि भारत और EU की अर्थव्यवस्थाएं मिलकर दुनिया की करीब एक-चौथाई GDP का हिस्सा हैं। उन्होंने बताया कि इस समझौते में डेयरी, कृषि और सोया जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखा गया है। भारत और EU ने 27 जनवरी 2026 को FTA बातचीत पूरी की थीं।
वित्त मंत्री के मुताबिक, ट्रेड समझौतों का मकसद सिर्फ बाजार खोलना नहीं होना चाहिए। इनमें सप्लाई चेन को मजबूत करना, नए कारोबारी साझेदार बनाना और देश के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा भी जरूरी है।
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