India-US Deal: चीन समेत प्रतिस्पर्धी देशों से कम भारत का टैरिफ, जोखिम भी घटा, वैश्विक पूंजी के लिए फिर से आकर्षक बना भारत
India-US Deal: भारत-अमेरिका डील टैरिफ के लिए राहत तो है ही, यह भू-राजनीतिक और व्यापारिक स्थिरता की बहाली में भी ...और पढ़ें

किसके लिए फायदेमंद भारत-अमेरिका ट्रेड डील
HighLights
US ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ 50% से घटाकर 18% किया।
भारत रूसी तेल खरीद बंद कर अमेरिका से अधिक तेल खरीदेगा।
डील से भारत की विकास दर बढ़ेगी, श्रम-प्रधान क्षेत्रों को लाभ।
प्राइम टीम, नई दिल्ली।
सोमवार, 2 फरवरी की रात अचानक खबर आई कि भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ पर डील हो गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ फोन पर बातचीत के बाद व्यापार समझौता हो गया। ट्रंप के अनुसार, “प्रधानमंत्री मोदी के प्रति मित्रता और सम्मान के चलते और उनके अनुरोध पर, हमने अमेरिका और भारत के बीच व्यापार समझौते पर तत्काल सहमति व्यक्त की है। इसके तहत अमेरिका रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 25 प्रतिशत से 18 प्रतिशत कर देगा।” बाद में ह्वाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि भारत से आयात पर 50 प्रतिशत टैरिफ की जगह सिर्फ 18 प्रतिशत टैरिफ लगेगा। रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण ट्रंप ने 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाया था।
डील पर दोनों देशों के बीच करीब 10 महीने से बात चल रही थी और किसी भी समय इसे अंतिम रूप दिए जाने के संकेत मिल रहे थे। मौजूदा वित्त वर्ष में यह इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और यूरोपियन यूनियन के बाद पांचवां द्विपक्षीय व्यापार समझौता है। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। एचडीएफसी बैंक का आकलन है कि इस डील से भारत की विकास दर अगले वित्त वर्ष में 20-30 आधार अंक बढ़ सकती है। वर्ष 2026-27 के लिए इसका पिछला अनुमान 6.9 प्रतिशत का था।
ट्रंप और मोदी ने सोशल मीडिया पर दी जानकारी
भारत की तरफ से समझौते के प्रारूप को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने सिर्फ इतना कहा कि समझौते पर दोनों देश जल्दी साझा बयान जारी करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि कृषि और डेयरी सेक्टर के हितों से कोई समझौता नहीं किया गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इतना ही कहा कि समझौते से निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।लेकिन ट्रंप ने कुछ संकेत जरूर दिए हैं। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने रूस से तेल की खरीद बंद करने और अमेरिका तथा वेनेजुएला से खरीद बढ़ाने पर सहमति जताई है। टैरिफ घटाने के बदले भारत, अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क और गैर-शुल्क बाधाएं खत्म करेगा। ट्रंप ने यह भी कहा कि मोदी ने “बाय अमेरिकन” के तहत अमेरिकी उत्पादों की अधिक खरीद का वचन दिया है, जिसमें 500 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की अमेरिकी ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, कृषि उत्पाद, कोयला और अन्य वस्तुएं शामिल हैं। टैरिफ के बावजूद अमेरिका, भारत के लिए सबसे बड़ा वस्तु निर्यात बाजार बना हुआ है। वर्ष 2025 के पहले 11 महीने में भारत के कुल वस्तु निर्यात का लगभग 21 प्रतिशत अमेरिका को हुआ है।
ट्रंप के अनुसार, “हमने कई मुद्दों पर चर्चा की, जिनमें व्यापार और रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने का विषय भी शामिल था। उन्होंने रूसी तेल की खरीद बंद करने और अमेरिका से, तथा संभावित रूप से वेनेजुएला से, अधिक तेल खरीदने पर सहमति जताई है। इससे यूक्रेन में जारी युद्ध को समाप्त करने में मदद मिलेगी, जिसमें हर सप्ताह हजारों लोग मारे जा रहे हैं।” इस युद्ध के चार साल पूरे होने वाले हैं और इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (IEP) का आकलन है कि इसमें मरने वालों की संख्या जल्दी ही 20 लाख तक पहुंच जाएगी।
प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया, “यह जानकर खुशी हुई कि मेड इन इंडिया उत्पादों पर अब टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत हो जाएगा। इस शानदार घोषणा के लिए भारत के 1.4 अरब लोगों की ओर से राष्ट्रपति ट्रंप का बहुत-बहुत धन्यवाद।” उन्होंने आगे कहा, “जब दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र साथ मिलकर काम करते हैं, तो इससे हमारे लोगों को लाभ होता है और परस्पर लाभ के अपार अवसर खुलते हैं। वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए राष्ट्रपति ट्रंप का नेतृत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। शांति के लिए उनके प्रयासों का भारत पूरी तरह समर्थन करता है।”
इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देशों से कम भारत का टैरिफ
इस ट्रेड डील में भारत के खिलाफ अमेरिकी टैरिफ को घटाकर 18% किया गया है। अमेरिका मई से अक्टूबर 2025 के बीच हुए व्यापार समझौतों के तहत इंग्लैंड को 10%, यूरोपीय यूनियन और जापान को 15%, इंडोनेशिया और मलेशिया को 19% तथा बांग्लादेश और वियतनाम को 20% रेसिप्रोकल टैरिफ की पेशकश कर चुका है। यूरोपीय यूनियन (EU) को छोड़कर ये टैरिफ मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) टैरिफ के अतिरिक्त होंगे। चीन पर औसत टैरिफ 37 प्रतिशत है।
थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव (GTRI) के अनुसार, EU के लिए व्यवस्था अलग है। यदि किसी उत्पाद पर एमएफएन टैरिफ 15% तक है, तो संयुक्त (रेसिप्रोकल + एमएफएन) टैरिफ 15% पर सीमित रहेगा। लेकिन यदि किसी उत्पाद पर एमएफएन टैरिफ 15% से अधिक है, तो मौजूदा एमएफएन टैरिफ ही लागू रहेगा।
समझौते के बाद भी अमेरिका के सेक्शन 232 के तहत स्टील, एल्युमिनियम, तांबा आदि पर 50% टैरिफ और कुछ ऑटो कंपोनेंट्स पर 25% टैरिफ जारी रहेंगे। वहीं, दवाइयों, विमान और उनके पुर्जों, तथा कुछ मेकैनिकल और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट पर शून्य टैरिफ की व्यवस्था पहले की तरह बनी रहेगी।
एचडीएफसी बैंक की प्रधान अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता ने एक रिपोर्ट में लिखा है, शोर-शराबा कम होने के बाद समझौते की डिटेल देखना महत्वपूर्ण है। (अप्रैल-नवंबर 2025 में भारत ने 32 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से खरीदा। क्या भारत रूस से तेल खरीदना पूरी तरह बंद करेगा, अगर नहीं तो क्या ट्रंप फिर टैरिफ लगाएंगे? क्या भारत कृषि समेत सभी अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क खत्म करेगा? भारत अमेरिका और वेनेजुएला से तेल खरीदने में कितना डाइवर्सिफाई कर सकता है (मौजूदा वित्त वर्ष में अभी तक भारत के लिए रूसी तल की औसत कीमत 69.1 डॉलर प्रति बैरल जबकि अमेरिकी तेल की 75.9 बैरल रही)? अमेरिका से आयात 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने के परिणाम क्या होंगे, भले ही यह पांच वर्षों में हो?
भारत का ऑफर क्या, कृषि उत्पादों का भी होगा आयात?
भारत सरकार ने अभी तक डील का विवरण जारी नहीं किया, लेकिन ट्रंप ने दावा किया है कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को खत्म कर देगा। हालांकि उन्होंने भी यह स्पष्ट नहीं किया कि भारत की इस प्रतिबद्धता के तहत कौन से उत्पाद शामिल होंगे। भारत पहले भी खाद्यान्न, जीएम उत्पादों और अन्य रेगुलेटेड आयात जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को खोलने का विरोध करता रहा है।
आर्थिक मामलों के विभाग की सचिव अनुराधा ठाकुर से एक कार्यक्रम में जब पूछा गया कि क्या भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए अपना बाजार खोलेगा, तो उन्होंने कहा, “फिलहाल अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार खोलने को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। समय के साथ स्थिति स्पष्ट होगी।” खबरों के अनुसार, भारत ने अमेरिका से पेट्रोलियम, रक्षा उपकरण और विमान खरीदने पर सहमति जताई है। कृषि क्षेत्र को भी आंशिक रूप से खोलने का फैसला किया है।
अमेरिकी नेताओं ने दिए संकेत
अमेरिका के कई शीर्ष नेताओं ने कहा है कि समझौते से अमेरिका के अधिक कृषि उत्पाद विशाल भारतीय बाजार में निर्यात होंगे, साथ ही यह समझौता रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने में भी मदद करेगा। सीनेट की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष सीनेटर जिम रिश ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “आज भारत के साथ हुए व्यापार समझौते की शानदार उपलब्धि के लिए राष्ट्रपति ट्रंप को बधाई। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई है कि दुनिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा लोकतंत्र अमेरिका के साथ व्यापार बाधाओं को कम करने पर सहमत हुआ है।”
अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस के बयान से लगता है कि अमेरिका भारत को कुछ कृषि उत्पादों का निर्यात करेगा। उन्होंने एक्स पर अपने पोस्ट में लिखा, “नया अमेरिका-भारत समझौता अमेरिका के अधिक कृषि उत्पादों को भारत के विशाल बाजार में निर्यात करेगा, जिससे (अमेरिका में) कीमतें बढ़ेंगी और ग्रामीण अमेरिका में नकदी का प्रवाह होगा।” उन्होंने बताया कि 2024 में भारत के साथ अमेरिका का कृषि व्यापार घाटा 1.3 अरब डॉलर था। उनके मुताबिक, भारत की बढ़ती आबादी अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है और यह समझौता इस घाटे को कम करने में मददगार होगा। उन्होंने इसे “कृषि क्षेत्र के लिए दर्जनों सौदों के बीच अमेरिका फर्स्ट की जीत” बताया।
रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव लाने वाली अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने X पर लिखा, “शाबाश, राष्ट्रपति ट्रंप। मुझे लगता है कि इस (रूस-यूक्रेन) युद्ध खत्म करने को लेकर आपका संदेश, यानी पुतिन की युद्ध मशीन को मदद देने वालों को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर करना, काम कर रहा है।”
ग्राहम ने कहा, “मुझे उम्मीद है कि रूसी तेल खरीदने वाले अन्य बड़े देश भी भारत की राह पर चलेंगे। पुतिन तभी बातचीत की मेज पर आएंगे जब दर्द इतना बढ़ जाएगा कि उन्हें मजबूर होना पड़े। हम अभी वहां नहीं पहुंचे हैं, लेकिन भारत के कदमों से हम उस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यूक्रेन में खून-खराबा अब खत्म होना चाहिए।”
हालांकि मूडीज रेटिंग्स ने कहा है कि हाल के महीनों में भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद में कमी जरूर की है, लेकिन इसके बावजूद सभी खरीद को तुरंत पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है, क्योंकि ऐसा करना भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए बाधक हो सकता है। एजेंसी के अनुसार, “दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक, भारत के गैर-रूसी तेल की ओर पूरी तरह शिफ्ट होने से अन्य बाजारों में मांग बढ़ सकती है, कीमतें बढ़ सकती हैं और इसका असर महंगाई के रूप में सामने आ सकता है।”
स्टॉक एक्सचेंज NSE के एमडी और सीईओ आशीष चौहान ने कहा कि यह लगभग एक साल की देरी के बाद आया है। चौहान ने वेनेजुएला के कच्चे तेल की प्रोसेसिंग में भारत की बढ़त को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला का कच्चा तेल रिफाइन करने के लिहाज से सबसे कठिन किस्मों में एक है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इस कारण यहां विभिन्न प्रकार के कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन की गई रिफाइनरियां हैं। ये रिफाइनरी वेनेजुएला के भारी तेल को भी आसानी से प्रोसेस कर सकती हैं। इसी क्षमता के चलते भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रोसेस्ड तेल का निर्यातक बनकर उभरा है।
फिलहाल सावधानी बरतने की जरूरत
GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, भारत को राष्ट्रपति ट्रंप की घोषणा पर जल्दबाजी में जश्न नहीं मनाना चाहिए। ट्रंप के पोस्ट में कई अहम सवाल अनुत्तरित हैं - किन उत्पादों को इसके दायरे में रखा गया है, इसकी समय-सीमा क्या होगी, और क्या भारत वास्तव में शून्य शुल्क तथा गैर-शुल्क बाधाओं पर सहमत हुआ है, खासकर कृषि और दूसरे संवेदनशील क्षेत्रों में।
श्रीवास्तव के मुताबिक, अमेरिका से 500 अरब डॉलर की खरीद का जो आंकड़ा बताया गया है, वह भी स्पष्ट नहीं है। फिलहाल भारत अमेरिका से सालाना 50 अरब डॉलर से भी कम का आयात करता है, जिससे संकेत मिलता है कि यह ठोस प्रतिबद्धता से अधिक एक आकांक्षा है। इसलिए जब तक कोई संयुक्त बयान, लिखित समझौता और उसके क्रियान्वयन को लेकर स्पष्टता सामने नहीं आती, तब तक इसे अंतिम सौदे के बजाय एक राजनीतिक संकेत के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। ऐसे में जश्न नहीं, बल्कि सावधानी बरतने की जरूरत है।
श्रम प्रधान क्षेत्रों के लाभ अधिक
मूडीज रेटिंग्स ने टैरिफ में कटौती को श्रम-प्रधान क्षेत्रों - जैसे रत्न एवं आभूषण, वस्त्र और परिधान - के लिए क्रेडिट के लिहाज से सकारात्मक बताया है। ये भारत के शीर्ष निर्यात क्षेत्रों में शामिल हैं। दवाएं और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स 50 प्रतिशत टैरिफ से पहले ही मुक्त थे, इसलिए टैरिफ में कमी का इन पर खास असर पड़ने की संभावना नहीं है।
इंडस्ट्री चैंबर सीआईआई के प्रेसिडेंट राजीव मेमानी का मानना है कि टैरिफ में राहत से भारत के लिए 50 अरब डॉलर के निर्यात के नए अवसर खुलेंगे। ये अवसर मुख्य रूप से श्रम-सघन सेक्टर में होंगे। फिक्की के प्रेसिडेंट अनंत गोयनका ने कहा, शुल्क घटना दुनिया के सबसे बड़े आयात बाजार में भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता को बेहतर करेगा। परिधान, चमड़ा, रत्न एवं आभूषण तथा समुद्री उत्पाद जैसे क्षेत्रों को इससे लाभ मिलने की संभावना है। यह समझौता व्यापारिक विश्वास को मजबूत करने और द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग को और गहरा करने की क्षमता रखता है। प्रभावी ढंग से लागू होने पर यह भारत की निर्यात वृद्धि की दिशा को उल्लेखनीय बढ़ावा दे सकता है, बाजार तक पहुंच का विस्तार कर सकता है और दुनिया की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बीच निरंतर सहयोग के रणनीतिक महत्व को रेखांकित करता है।
निर्यातकों के संगठन फियो (FIEO) के प्रेसिडेंट एस.सी. रल्हन भी मानते हैं कि इंजीनियरिंग वस्तुओं, वस्त्र एवं परिधान, फार्मास्यूटिकल्स, रसायन, चमड़ा उत्पाद, रत्न एवं आभूषण तथा कृषि उत्पाद जैसे क्षेत्रों को बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। उन्होंने कहा, “कम टैरिफ से न केवल मूल्य प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी, बल्कि भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी सप्लाई चेन में और गहराई से जुड़ने में भी मदद मिलेगी। यह समझौता क्षमता विस्तार को प्रोत्साहित करेगा, नए निवेश आकर्षित करेगा और निर्यातोन्मुख उद्योगों में रोजगार सृजन करेगा।”
रल्हन के अनुसार, टैरिफ में कटौती से उन ऑर्डरों की तत्काल और बड़े पैमाने पर बहाली होने की उम्मीद है, जिन्हें पहले रोक कर रखा गया था। खासकर परिधान, वस्त्र, चमड़ा और फुटवियर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में, जहां वैश्विक खरीदार आमतौर पर दिसंबर तक ग्रीष्मकालीन सीजन की सोर्सिंग तय कर लेते हैं। बेहतर मूल्य समानता, शुल्कों को लेकर निश्चितता और भारतीय आपूर्तिकर्ताओं पर खरीदारों के विश्वास के साथ आने वाले महीनों में इन क्षेत्रों में ऑर्डर में तेज उछाल और निर्यात वृद्धि में अच्छी तेजी आने की संभावना है।
मेडिकल डिवाइस इंडस्ट्री की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ेगी
मेडिकल डिवाइस बनाने वाली कंपनियों के संगठन एआईएमईडी (AiMeD) के फोरम कोऑर्डिनेटर राजीव नाथ ने डील को गेमचेंजर बताते हुए कहा, “इससे निर्यात लागत में बड़ी कमी आएगी और चीन+1 रणनीति के बीच अमेरिकी बाजार में अरबों डॉलर की संभावनाएं खुलेंगी। इस कदम से वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी, निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।”
उन्होंने स्पष्ट किया, “भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ को घटाकर 18% करने से भारतीय मेडिकल डिवाइसेज को चीनी उत्पादों के मुकाबले प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी, क्योंकि चीन पर सेक्शन 301 के तहत आमतौर पर 25% या उससे अधिक टैरिफ (रेस्पिरेटर जैसी कुछ वस्तुओं पर यह 50-60% तक) लागू हैं। अभी तक भारत को 50% शुल्क का सामना करना पड़ता था, जबकि चीन पर करीब 30% शुल्क था। लेकिन नए समझौते से चीन+1 विविधीकरण के दौर में भारत को स्पष्ट लाभ मिलेगा।”
टैरिफ बढ़ने के कारण अमेरिका को भारत के समुद्री उत्पादों के निर्यात में पिछले कुछ महीनों से गिरावट जारी थी। सीफूड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEAI) ने कहा कि टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत करने के बाद अब सुधार की उम्मीद है। SEAI महासचिव के.एन. राघवन ने बताया कि चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-नवंबर अवधि में अमेरिका को मछली निर्यात मात्रा के हिसाब से 15 प्रतिशत घटकर 2,01,501 टन रह गया, जबकि मूल्य के लिहाज से यह 6.3 प्रतिशत घटकर 1.84 अरब डॉलर से 1.72 अरब डॉलर पर आ गया।
स्पाइसजेट एयरलाइंस के चेयरमैन एवं एमडी अजय सिंह इस समझौते को ‘मेक इन इंडिया’ ब्रांड के लिए बड़ा प्रोत्साहन मानते हैं। एक बयान में उन्होंने कहा, यूरोपीय यूनियन और इंग्लैंड के साथ हालिया व्यापार समझौतों के बाद आया यह करार वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते आत्मविश्वास और विश्वसनीयता को और मजबूत करता है तथा सतत विकास और मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों की नींव रखता है।
विदेशी निवेशकों के लौटने की उम्मीद
देश के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज NSE के एमडी और सीईओ आशीष चौहान ने इस समझौते को सकारात्मक और लंबे समय से प्रतीक्षित कदम बताते हुए कहा कि समझौते की घोषणा के साथ भारतीय शेयर बाजारों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की वापसी की उम्मीद बढ़ गई है। समझौते से व्यापार से जुड़ी अनिश्चितताएं कम होंगी और सकारात्मक संकेत मिलेंगे।
आनंद राठी ग्रुप के मुख्य अर्थशास्त्री और कार्यकारी निदेशक सुजन हाजरा ने कहा, जब अमेरिका ने 50% की टैरिफ लागू किया तो इससे भारतीय निर्यात का बड़ा हिस्सा प्रभावित हुआ, लेकिन इसका भारत की लिस्टेड कंपनियों की आय पर प्रत्यक्ष प्रभाव सीमित रहा। अमेरिका को निर्यात करने वाली कंपनियों में एमएसएमई और कम मार्जिन वाले मैन्युफैक्चरिंग उद्यम अधिक हैं। इसलिए अकेले टैरिफ में कटौती भारतीय शेयर बाजार की आय की दिशा को बदलने में सक्षम नहीं है।
फिर भी, इस घटना के मैक्रोइकोनॉमिक और रणनीतिक परिणाम कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं। टैरिफ शॉक ने सुधारों के लिए उत्प्रेरक का काम किया, जो टैरिफ कटौती के लाभ से कहीं अधिक मूल्यवान साबित हो सकते हैं। इसने घरेलू मांग बढ़ाने के लिए जीएसटी दरों में बदलाव की प्रक्रिया को तेज किया, लंबित श्रम और अनुपालन सुधारों को प्राथमिकता दी, और भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने के लिए विविधीकरण को बढ़ावा दिया। सबसे महत्वपूर्ण, इसने भारत को यूरोपीय यूनियन के साथ ऐतिहासिक व्यापार समझौते के लिए प्रेरित किया जिससे भारतीय मैन्युफैक्चरिंग और सेवाओं के लिए एक बड़ा, समृद्ध और स्थिर निर्यात बाजार खुला। इस तरह पहले टैरिफ का जो झटका प्रतिकूल जान पड़ता था, वह नीति के लिए प्रेरक शक्ति में बदल गया।
हाजरा के अनुसार, भारत-अमेरिका डील केवल टैरिफ के लिए राहत नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक और व्यापारिक स्थिरता की बहाली में भी मददगार है। जैसे-जैसे रिस्क प्रीमियम कम होंगे, भारत फिर से वैश्विक पूंजी के लिए आकर्षक बनता दिख रहा है। आज भारत तेज विकास, राजनीतिक रूप से संगठित और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ऐसी अर्थव्यवस्था है, जिसमें मजबूत घरेलू मांग है तथा जिसके अमेरिका और यूरोप दोनों से बेहतर संबंध हैं।
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