... तो रुकेगी MSP, केंद्र की राज्यों को सलाह? जानें क्यों सरकार चाहती है कि किसान बदलें खेती का तरीका
केंद्र सरकार ने राज्यों को फसल बोनस पर दी गई चिट्ठी को 'सलाह' बताया है, आदेश नहीं। इसका उद्देश्य दालों ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
नई दिल्ली। हाल ही में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने राज्यों से किसानों को दिए जाने वाले 'फसल बोनस' को लेकर वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग (Department of Expenditure) की एक चिट्ठी का जिक्र कर नया मुद्दा छेड़ दिया था। अब इस मामले में केंद्र सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है। सरकार ने साफ किया है कि 9 जनवरी 2026 को राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखी गई यह चिट्ठी कोई आदेश नहीं, बल्कि महज एक 'सलाह' (Advisory) थी। इसका मुख्य उद्देश्य देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना और कृषि में आत्मनिर्भरता लाना है। आइए इस पूरे मामले को समझते हैं।
केंद्र ने राज्यों को चिट्ठी में आखिर क्या दी है सलाह?
केंद्र सरकार ने राज्यों के मुख्य सचिवों को लिखे पत्र में सलाह दी है कि वे अपनी 'बोनस नीति' को इस तरह बनाएं जिससे दालों, तिलहन और मोटे अनाजों के उत्पादन को बढ़ावा मिले। सरकार का मानना है कि यह कदम देश में पोषण सुरक्षा, टिकाऊ कृषि और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए बेहद जरूरी है।
सिर्फ गेहूं और धान की खेती से सरकार को क्यों है चिंता?
केंद्र सरकार किसानों के समर्थन के लिए विभिन्न फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की घोषणा करती है। लेकिन, विशेष रूप से उत्तर भारत समेत कई राज्यों में फसल उत्पादन मुख्य रूप से गेहूं और धान की ओर झुका हुआ है। जब राज्य सरकारें इन फसलों जैसे गेहूं और धान पर MSP के ऊपर अलग से 'बोनस' देने की घोषणा करती हैं, तो किसान केवल इन्हीं को उगाने के लिए प्रेरित होते हैं।
नतीजतन, दालों और तिलहन की खेती का रकबा घट जाता है। इसके अलावा, धान और गेहूं की खेती में पानी और उर्वरक का बहुत ज्यादा इस्तेमाल होता है जिससे पर्यावरण पर दबाव पड़ता है, और हमें आवश्यक दालों व खाद्य तेल के लिए दूसरे देशों के आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।
दाल और तिलहन उगाने से देश और किसानों का कैसे होगा फायदा?
सरकार देश में 'फसल विविधीकरण' को बढ़ावा देना चाहती है ताकि गेहूं और धान की मोनोकल्चर (एक ही फसल उगाने की प्रथा) को हतोत्साहित किया जा सके। देश में दालों और खाद्य तेल का उत्पादन बढ़ने से हम अंतरराष्ट्रीय बाजार की अनिश्चितताओं और सप्लाई-चेन में आने वाली रुकावटों से बच सकेंगे।
'आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26' के आंकड़े बताते हैं कि खाद्य तेल के आयात पर हमारी निर्भरता 2015-16 के 63.2% से घटकर 2023-24 में 56.25% रह गई है। पिछले एक दशक (2014-15 से 2024-25) में तिलहन का रकबा 18% और उत्पादन लगभग 55% बढ़ा है। सरकार ने इसके लिए राष्ट्रीय खाद्य तेल-तिलहन मिशन और राष्ट्रीय खाद्य तेल-पाम ऑयल मिशन जैसे कदम भी उठाए हैं।
किसानों की आय और सुरक्षा के लिए अब तक उठाए गए हैं कौन से बड़े कदम?
पीएम-किसान (PM-KISAN): इसके तहत 9 करोड़ से ज्यादा किसानों को सालाना 6,000 रुपये की आर्थिक मदद दी जा रही है।
जोखिम से सुरक्षा: 'पीएम फसल बीमा योजना' से 4 करोड़ किसानों को मौसम की मार से बचाया जा रहा है।
मृदा स्वास्थ्य: बेहतर खेती के लिए 1.75 करोड़ से अधिक सॉइल हेल्थ कार्ड (Soil Health Cards) जारी किए गए हैं।
प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना: यह योजना 100 कम प्रदर्शन वाले कृषि-जिलों की तस्वीर बदल रही है। इसके तहत सिंचाई, कर्ज सुविधा और फसल विविधीकरण से 1.7 करोड़ सबसे जरूरतमंद किसानों को सीधा फायदा मिल रहा है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर: कटाई के बाद के नुकसान को रोकने के लिए देश में मेगा फूड पार्कों की संख्या 2014 के मात्र 2 से बढ़कर 2025 में 41 हो गई है।
क्या यह राज्यों के अधिकारों में दखलंदाजी या उन पर थोपा गया फैसला है?
केंद्र सरकार ने अपने स्पष्टीकरण में सिरे से खारिज किया है कि यह राज्यों पर कोई दबाव है। सरकार का कहना है कि इस चिट्ठी को 'दबाव' या 'थोपे गए फैसले' के रूप में पेश करना तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने जैसा है। यह राज्यों के लिए कोई बोझ नहीं है, बल्कि नीतियां एक दिशा में काम करें, इसके लिए यह एक साझा जिम्मेदारी है, जो अंततः किसानों, उपभोक्ताओं और पूरे देश के हित में है।
SOURCE: PIB
