नई दिल्ली, राजीव कुमार। मोर्चे पर भारी तनातनी और भरोसे पर ठेस के बाद पहली बार भारत में चीनी सामान और आयात पर लगाम को लेकर गंभीरता से विचार शुरू हुआ है। लेकिन यह कहना पूरी तरह ठीक नहीं होगा कि इसकी शुरूआत अभी से हुई है। दरअसल पिछले तीन चार सालों से इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई जब दोनों देशों मे शीर्ष स्तर पर बातचीत के दौरान व्यापार घाटे को लेकर खुद प्रधानमंत्री के स्तर से बार बार सवाल उठाए जा रहे थे। इससे पहले व्यापार का लक्ष्य रखा जाता था और चीन की आक्रामक नीति के कारण हर बार यह लक्ष्य से ज्यादा होता था जिसमें चीन की हिस्सेदारी भी बढ़ती थी और भारत का व्यापार घाटा भी। भारत में औद्योगिक नीतियों के साथ साथ व्यापार को लेकर भी आक्रामकता अपनाई गई और इसी कारण पिछले छह सालों में चीन से होने वाले आयात में 10 फीसद तो भारत से निर्यात में 40 फीसद का इजाफा हुआ। लेकिन यह भी सच है कि आत्मनिर्भरता की लड़ाई अभी लंबी है।

वर्ष 2014 में भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग 1.90 लाख कारोबार का था जो 2019 के आखिर तक 4.5 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच गया। मोबाइल फोन बनाने वाली 10 से भी कम कंपनियां छह साल पहले भारत में उत्पादन कर रही थी। अब यह संख्या 200 से अधिक है। इसका नतीजा यह हुआ कि चीन से इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स आयात में पिछले दो साल में 9 अरब डॉलर की कमी आ गई।

वित्त वर्ष 2017-18 में भारत ने चीन से 28.6 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम (कल-पुर्जे, कच्चे माल समेत) का आयात किया था जो वित्त वर्ष 2019-20 में घटकर 19.1 अरब डॉलर रह गया। आर्थिक विशेषज्ञों के मुताबिक नीतिगत फैसले एवं मैन्युफैक्चरिंग को लेकर दृढ़ता का नतीजा भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में देखा जा सकता है। यही वजह है कि चीन से होने वाले आयात का ग्राफ पिछले दो साल से नीचे की ओर है। हालांकि वर्ष 2014-15 के मुकाबले 2019-20 में चीन से होने वाले आयात में लगभग 10 फीसद का इजाफा दर्ज किया गया।

विदेश व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार ने चीन से व्यापार घाटा कम करने एवं घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाने को लेकर जो शुरुआत की, उसका असर पिछले दो साल से दिखने लगा। तभी वित्त वर्ष 2017-18 में चीन से भारत का आयात 76.3 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया था जो गत वित्त वर्ष में 65 डॉलर के स्तर पर आ गया। व्यापार घाटा कम करने के लिए चीन पर दबाव डालने से भारत से चीन होने वाले निर्यात में इजाफा हुआ। वित्त वर्ष 2014-15 में भारत ने चीन को 11.9 अरब डॉलर का निर्यात किया था जो वित्त वर्ष 2019-20 में बढ़कर 16.6 अरब डॉलर का हो गया। यानी पिछले छह सालों में चीन होने वाले भारतीय निर्यात में लगभग 40 फीसद की बढ़ोतरी हुई। व्यापार घाटा कम करने को लेकर भारत द्वारा चीन पर दबाव बढ़ाने से ही चीन कृषि उत्पाद एवं फार्मा सेक्टर में भारत के लिए अपने दरवाजे खोलने पर सहमत हो पाया।

हालांकि व्यापार विशेषज्ञ इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि पिछले दो साल में चीन के साथ व्यापार घाटे में जरूर कमी आई है, लेकिन हांगकांग के साथ भारत का व्यापार घाटा 4 अरब डॉलर का हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के दबाव को देखते हुए चीन दूसरे देशों के रास्ते भारत में अपना माल भेज रहा है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशंस (फियो) के महानिदेशक एवं सीईओ अजय सहाय के मुताबिक पिछले चार-पांच सालों में इलेक्ट्रॉनिक्स पॉलिसी, विदेशी निवेश और टैक्स ड्यूटी की नीति में जो बदलाव किए गए, उसका असर दिख रहा है। वहीं लंबे समय को ध्यान में रखते हुए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस, जीएसटी, बैंकरप्सी कोड जैसे महत्वपूर्ण फैसले किए गए। इन सब का सकारात्मक फायदा आगे चल कर मिलेगा, लेकिन फिलहाल सरकार को आयात कम करने के लिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को निर्यात की तरह सुविधा देनी चाहिए। कृत्रिम तरीके से आयात को कम नहीं किया जा सकता है।

अब तक जो आंकड़े दिख रहे हैं उसे पर्याप्त मान लेना उचित नहीं होगा। हर मोर्चे पर सुधार आवश्यक है। जो खामियां पहले थीं उसे भी तक पाटा नहीं जा सका है। पिछले पांच-छह सालों में मैन्युफैक्चरिंग को लेकर सरकार की तरफ से कोई व्यापक नीति नहीं लाई जा सकी। नई औद्योगिक नीति अब तक नहीं बनी है। मैन्युफैक्चरिंग के लिए क्लस्टर विकसित करने को लेकर सरकार की तरफ से कोई विशेष सहयोग नीति नहीं लाई गई। सेरामिक टाइल्स जैसे कुछ क्षेत्रों में क्लस्टर बनाकर मैन्युफैक्चरिंग शुरू की गई जो पूरी तरह से उद्यमियों के प्रयास से शुरू किए गए। वहीं, उन देशों के साथ जहां भारतीय वस्तुओं की बिक्री की अधिक संभावना है, उन देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के कोई प्रयास नहीं किए गए। अब मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में चीन को कड़ी टक्कर देने के लिए सरकार कई अहम फैसले करने जा रही है। सरकार मैन्युफैक्चरिंग की लागत को कम करने एवं मैन्युफैक्चरिंग को आसान बनाने के लिए छह प्रमुख क्षेत्रों में अहम बदलाव लाने जा रही है। इनमें जमीन, बिजली, लॉजिस्टिक्स, क्लस्टर एवं इंडस्ट्रीयल पार्क, एफडीआइ और इज ऑफ डूइंग बिजनेस शामिल हैं। सरकार उन विशेष सेक्टर की भी पहचान कर रही है जिन सेक्टर में हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन सके। लेकिन अब वक्त है ठोस और समय सीमा से बंधे कार्यान्वयन की।

Posted By: Ankit Kumar

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