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ईरान युद्ध से दुनिया में मचा हाहाकार, लेकिन भारत ने रिफाइनरों से इन देशों को तेल बेच ऐसे कमाया महा-मुनाफा!

Published: Mon, 31 Aug 2026 03:15 PM (IST)

ईरान से जुड़े युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी से वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल के बावजूद, भारत ने अपनी रिफाइनरियों को पूरी क्षमता से चलाकर भारी मुनाफा कमाया।

ईरान युद्ध से वैश्विक संकट में भारत बना तेल का नया बादशाह (AI फोटो)

ईरान युद्ध से वैश्विक संकट में भारत बना तेल का नया बादशाह (AI फोटो)

HighLights

  1. ईरान युद्ध से वैश्विक तेल बाजार में भारत को मिला फायदा।

  2. भारत ने केन्या को ईंधन आपूर्ति में सऊदी अरब को पछाड़ा।

  3. होर्मुज संकट के बावजूद भारत की रिफाइनरियां पूरी क्षमता पर।

नई दिल्ली। हाल ही में ईरान से जुड़े युद्ध से मची तबाही ने दुनिया भर में चिंता पैदा कर दी है, लेकिन भारत इस उथल-पुथल से भारी फायदा उठाने में कामयाब रहा है। जब दुनिया का तेल बाजार ठप पड़ गया, तो भारत ने कुछ ऐसा किया जो एशिया की कोई दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं कर पाई। वह न सिर्फ इस झटके से उबर पाया, बल्कि उसने तेल बेचना भी जारी रखा।

जब दूसरे लड़खड़ाए, तो भारत कैसे जीता?

पिछले कुछ महीनों में, अफ्रीका को भारत का ईंधन निर्यात अनोखे स्तर पर पहुंच गया है। एक बड़े भू-राजनीतिक बदलाव में भारत ने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे पारंपरिक दिग्गजों को पीछे छोड़ते हुए केन्या को पेट्रोल, डीजल और जेट ईंधन की आपूर्ति करने वाला मुख्य देश बन गया है।

ऊर्जा अर्थशास्त्री डॉ. अनस अलहाज्जी ने एलारा कैपिटल के अश्वमेध एलारा इंडिया डायलॉग 2026 के दौरान भारत और बाकी दुनिया के बीच के इस बड़े अंतर को उजागर किया।

डॉ. अलहाज्जी ने कहा कि भारत "एशिया की एकमात्र ऐसी अर्थव्यवस्था थी जिसने संकट के बाद अपने तेल आयात को पूरी तरह से बहाल किया, अपने भंडार को फिर से भरा और दोबारा निर्यात शुरू किया।"

इस उपलब्धि के महत्व को समझने के लिए, यह देखना जरूरी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था किन चुनौतियों का सामना कर रही थी। फरवरी के अंत से, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) खाड़ी के मुहाने पर समुद्र का एक संकरा हिस्सा जो दुनिया के तेल का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है। काफी हद तक बंद रहा है। इसके बंद होने से न केवल एक देश की रफ़्तार धीमी होती है, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था ठप हो जाती है।

अलहाज्जी इस नाकेबंदी को "अपने जीवनकाल का सबसे बड़ा संकट" कहते हैं और इस बात पर जोर देते हैं कि चिप्स, भोजन और ईंधन सभी उसी रास्ते पर निर्भर हैं। चिप फैक्टरियों के लिए जरूरी हीलियम से लेकर साफ-सुथरे ईंधन के लिए इस्तेमाल होने वाले मेथनॉल तक, होर्मुज के बंद होने पर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं जाम हो जाती हैं। फिर भी, जहां ज्यादातर तेल आयातक देश संकट के समय मुश्किलों से जूझ रहे थे और राशनिंग व आपाधापी में लगे थे, वहीं भारत ने अपनी रिफाइनरियों को पूरी क्षमता से चालू रखा। लगभग अनजाने में ही, भारत ने दुनिया की रिफाइनरी बनने के अपने लंबे समय से चले आ रहे नीतिगत लक्ष्य को हासिल कर लिया।

क्या यह बड़ी जीत कमजोर नींव पर टिकी है?

इस जबरदस्त फायदे के बावजूद, एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि इसे पूरी तरह से साफ और पक्की जीत मानना गलती होगी। भारत की नई ताकत बहुत कमजोर आधार पर टिकी है। देश काफी हद तक खाड़ी देशों पर निर्भर है और चल रहे संकट ने उन क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है जिन पर भारत निर्भर है।

इसके अलावा चिंता की बात होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की दोधारी तलवार जैसी स्थिति है। जिस नाकेबंदी ने भारत को ईंधन की बिक्री से फायदा पहुंचाया, वही अब उसके कृषि क्षेत्र के लिए खतरा बन गई है। भारत के फर्टिलाइजर प्लांट खाड़ी की गैस से चलते हैं, जिसका मतलब है कि ईंधन बेचने के लिए जिस रास्ते की जरूरत है, वही रास्ता अनाज उगाने के लिए भी जरूरी है।

वेनेजुएला से नहीं मिलने वाली है राहत?

इसके अलावा, दुनिया भर में मौजूद दूसरे विकल्प सिर्फ छलावा साबित हुए हैं। वेनेजुएला के तेल के लिए अमेरिका के साथ हुई बहुत चर्चित डील से तुरंत कोई खास राहत नहीं मिलने वाली है। वादे के मुताबिक सप्लाई में ज्यादातर ऐसा तेल शामिल है जो अभी जमीन के नीचे है। कच्चा तेल पेट्रोल बनाने के लिए सही किस्म का नहीं है और इस्तेमाल लायक पहला बैरल मिलने में अभी कई साल लगेंगे। खाड़ी का कोई आसान विकल्प मौजूद नहीं है।

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इस ऐतिहासिक उथल-पुथल से मुख्य सीख यह है कि होर्मुज जैसे अहम रास्तों पर दोबारा दबाव डाला जा सकता है और डाला जाएगा। आखिरकार वही अर्थव्यवस्थाएं आगे रहेंगी जो अपनी रिफाइनिंग क्षमता बनाए रख सकेंगी, अपने सप्लायर्स में विविधता ला सकेंगी और संघर्ष वाले इलाकों से दूर आपातकालीन तेल का भंडार कर सकेंगी।

भारत ने अपनी सूझबूझ से इस संकट का शानदार ढंग से सामना किया। अब चुनौती यह है कि अगले वैश्विक झटके के आने से पहले उस सूझबूझ को एक ठोस योजना में बदला जाए, क्योंकि भारत को अचानक मिला यह फ़ायदा हमेशा के लिए इंतजार नहीं करेगा।

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