न बैंक, न ब्रांच...फिर भी हो जाता था करोड़ों का लेनदेन; भारत के 800 साल पुराने पेमेंट सिस्टम की दिलचस्प कहानी
Hundi Payment System: क्या आप जानते हैं कि भारत का 800 साल पुराना पेमेंट सिस्टम कैसा था? उस वक्त न ...और पढ़ें

अंग्रेजों के आने से पहले ये था भारत का बैंकिंग सिस्टम, 800 साल तक ऐसे होता था रुपए का लेनदेन
HighLights
हुंडी एक प्राचीन भारतीय भुगतान प्रणाली थी, जो भरोसे पर आधारित थी।
बिना बैंक या नकदी के, हवालादार के माध्यम से पैसे भेजे जाते थे।
शाही, दर्शनी, मुद्दती जैसी कई प्रकार की हुंडियां प्रचलित थीं।
यह प्रणाली 800 साल तक चली, कम लागत और गोपनीयता प्रदान करती थी।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली| आज का युग डिजिटल युग है। एक क्लिक और पैसा ट्रांसफर। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब न बैंक होते थे और न ही कोई ब्रांचेस, तब रुपयों का लेन-देन कैसे होता था? एक-दूसरे को पैसे कैसे दिए जाते थे? दरअसल, भारत के पेमेंट सिस्टम का 800 साल पुराना इतिहास है, जो बड़ा ही दिलचस्प है। चलिए समझते पूरी कहानी।
क्या है 800 साल पुराना पेमेंट सिस्टम?
भारत के इतिहास में एक पेमेंट सिस्टम था- हुंडी (Hundi payment system), जिसमें बिना किसी बैंक या औपचारिक कागजी कार्रवाई के पैसे ट्रांसफर किए जाते थे। ये पूरा सिस्टम भरोसे ट्रस्ट और कम्युनिटी नेटवर्क पर टिका होता था, जो व्यक्ति पैसे भेजना चाहता था (जिसे रेमिटर कहते हैं), वो अपने इलाके के हवालादार (जो पूरा नेटवर्क संभालता है) के पास जाता और उसे कैश देता। इसके बाद हवालादार उस व्यक्ति को एक लिखा हुआ दस्तावेज देता, जिसे हुंडी कहा जाता था। इस दस्तावेज पर पैसे से जुड़ी सारी डिटेल्स होती थी।।
इसके बाद पैसे भेजने वाला व्यक्ति या तो खुद या फिर किसी और जरिए उस दस्तावेज यानी हुंडी को वहां पहुंचाता था, जहां उसे पैसे भेजने होते थे। उसके बाद Payee इस हुंडी को अपने इलाके के हवालादार को दिखाकर उतने ही पैसे उससे ले सकता था।
हुंडी कितने तरह की होती है?
पहले के जमाने में जरूरत और स्थिति के हिसाब से हुंडी के कई अलग-अलग प्रकार थे। जैसे कि-
शाही हुंडी: ये सबसे आम थी, जिसमें सीधे एक जगह से दूसरी जगह (या अलग देशों में) फंड ट्रांसफर किए जाते थे।
दर्शनी हुंडी: ये एक तरह की रसीद होती थी, जो बताती थि कि पैसा जमा हो चुका है। इसे बाद में या भविष्य के भुगतानों के लिए उपयोग किया जाता था।
मुद्दती हुंडी: इसमें एक निश्चित तारीख या समय तय होता था। उस तारीख के बाद ही पाने वाला व्यक्ति अपने पैसे क्लेम कर सकता था।
जवाबी हुंडी: जब किसी पुराने हुंडी लेनदेन के बदले या उसका जवाब देने के लिए कोई नई हुंडी जारी की जाती थी, तो उसे जवाबी हुंडी कहा जाता था।
धनी जोग हुंडी: इसमें भेजने वाला जब तक हरी झंडी (पुष्टि) नहीं देता, तब तक हवालादार पाने वाले को पैसे नहीं देता। ये एक्स्ट्रा सुरक्षा के लिए होती थी।
नाम जोग हुंडी: इसमें पैसे लेने वाले को एक सिक्रेट पासवर्ड या कोड बताना पड़ता था, जो भेजने वाले ने तय किया होता था।
क्यों इतनी पॉपुलर थी हुंडी?
हुंडी का चलन करीब 800 साल तक चलता रहा। इसमें बैंकों की लंबी-चौड़ी लाइनों में खड़ा नहीं होना पड़ता था, झट से काम हो जाता था। बैंक के मुकाबले इसकी लागत या फीस काफी कम होती थी। हुंडी का सिस्टम हर इलाके में आसानी से चलाया जा सकता था। साथी ही इसमें व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारी और लेनदेन का ब्योरा पूरी तरह प्राइवेट रहता था।
