जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। भारत अगर अपने आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया को निरंतर बनाए रखता है तो अगले दस वर्षो में वह जापान और जर्मनी को पछाड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। एचएसबीसी के एक अध्ययन के मुताबिक इसके लिए आवश्यक है कि भारत सुधारों की दिशा सामाजिक क्षेत्र की तरफ बनाए रखे। ब्रिटिश ब्रोकरेज एजेंसी एचएसबीसी ने अपनी एक ताजा अध्ययन रिपोर्ट में माना है कि देश में सामाजिक पूंजी का सर्वथा अभाव है। भारत को स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खर्च करने की आवश्यकता है। यह देश के आर्थिक विकास और राजनीतिक स्थिरता के लिए भी बेहद जरूरी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को कारोबार सुगम बनाने (ईज ऑफ डूइंग बिजनेस) के क्षेत्र में अभी काफी कुछ करने की आवश्यकता है। रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले दस वर्षो में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार जापान और जर्मनी से बड़ा हो जाएगा। ऐसा होते ही देश की अर्थव्यवस्था दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। परचेजिंग पावर पैरिटी (खरीदने की क्षमता से जुड़ी तुलना) के मामले में तो यह और पहले हो सकता है। हालांकि रिपोर्ट में पहले दो स्थानों पर आने वाले देशों का जिक्र नहीं है। लेकिन माना जा रहा है कि भारत से पहले इस सूची में चीन और अमेरिका ही रह जाएंगे। एचएसबीसी ने माना है कि मुख्य रूप से देश की ताकत भौगोलिक और मैक्रो स्थिरता रहेगी।

ई-कॉमर्स सेक्टर अगले एक दशक में 1.2 करोड़ रोजगार पैदा करेगा: कभी-कभार उठाए जाने वाले आर्थिक सुधार के कदम नुकसानदायक हो सकते हैं। इसलिए भारत को सतत सुधार की जरूरत है। इसके लिए माहौल और तंत्र विकसित करना आवश्यक है। रिपोर्ट कहती है कि अर्थव्यवस्था में रोजगार की कमी को लेकर काफी चिंता जताई जा रही है। मगर ई-कॉमर्स सेक्टर अगले एक दशक में 1.2 करोड़ रोजगार के अवसर पैदा करेगा। साथ ही सामाजिक क्षेत्र रोजगार सृजन में बड़ी भूमिका निभा सकता है। इस क्षेत्र में स्वास्थ्य और शिक्षा में काफी काम होना अभी बाकी है।

रिपोर्ट कहती है कि यह सेवा आधारित अर्थव्यवस्था आगे भी बनी रहेगी। लेकिन सरकार को मैन्यूफैक्चरिंग और कृषि क्षेत्र पर खास ध्यान देने की आवश्यकता है। बड़े लक्ष्यों को पाने के लिए यह जरूरी है कि सरकार मैन्यूफैक्चरिंग, कृषि और सेवा क्षेत्र के योगदान के मौजूदा स्तर को बनाए रखे।

रिपोर्ट के मुताबिक 2028 तक भारत की अर्थव्यस्था का आकार सात लाख करोड़ डॉलर (सात टिलियन डॉलर) का हो जाएगा। भारतीय मुद्रा में देखें तो यह रकम 448 लाख करोड़ रुपये बैठती है। जबकि जर्मनी की अर्थव्यवस्था छह लाख करोड़ डॉलर से कुछ कम और जापान की पांच लाख करोड़ डॉलर रहने की उम्मीद है। वित्त वर्ष 2016-17 में भारतीय अर्थव्यवस्था 2.3 लाख करोड़ डॉलर की थी। इसलिए अभी इसका दुनिया में पांचवा स्थान है। ब्रोकरेज का मानना है कि जीएसटी के चलते बीते वित्त वर्ष की 7.1 फीसद आर्थिक विकास दर के मुकाबले चालू वर्ष में इसके धीमे रहने की संभावना है। लेकिन अगले वर्ष से इसमें सुधार दिखना शुरू हो जाएगा। 

Posted By: Shubham Shankdhar

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप