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यूपी की ये डेयरी कंपनी रोज बेचती है 11 लाख लीटर दूध, कर्ज में दबे बिजनेस को बनाया दुधारू गाय; अमूल-मदर डेयरी से हो रही टक्कर

Published: Wed, 14 Oct 2026 03:40 PM (IST)

उत्तर प्रदेश की ज्ञान डेयरी ने एक बंद पड़े प्लांट से शुरुआत कर 1500 करोड़ रुपये का विशाल कारोबार खड़ा ...और पढ़ें

कर्ज में दबे बिजनेस को बना दिया दुधारू गाय (ai photot)

 कर्ज में दबे बिजनेस को बना दिया दुधारू गाय (ai photot)

HighLights

  1. ज्ञान डेयरी ने 2007 में बंद पड़े प्लांट से की शुरुआत।

  2. किसानों का भरोसा जीतकर पूर्वी यूपी में बनाई मजबूत पहचान।

  3. 1500 करोड़ रुपये का टर्नओवर, अमूल को दे रही कड़ी टक्कर।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: आपने अमूल का दूध तो खूब पिया होगा, लेकिन क्या आप उत्तरप्रदेश की उस डेयरी कंपनी के बारे में जानते हैं, जिसने बड़े ब्रांड्स के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है। इसकी शुरुआत दो प्रोडक्ट्स से हुई थी, लेकिन आज कंपनी दूध से लेकर घी, दही, पनीर और छाछ तक बेचती है। खास बात यह है कि इस सफर में कंपनी को किसानों का भरोसा जीतने से लेकर दूध की सप्लाई का मजबूत नेटवर्क तैयार करने तक कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। यह कहानी है उत्तर प्रदेश की ज्ञान डेयरी (Gyan dairy) की, जिसे जय अग्रवाल और अनुज अग्रवाल ने आगे बढ़ाया।

बंद डेयरी प्लांट से शुरू हुआ कारोबार

ज्ञान डेयरी की कहानी साल 2007 में शुरू हुई। जय अग्रवाल (Jay agarwal) और उनके भाई अनुज अग्रवाल (anuj agarwal)  पहले परिवार के तंबाकू कारोबार से जुड़े थे। लेकिन वे कुछ नया करना चाहते थे, जहां अपने फैसलों के दम पर कारोबार को आगे बढ़ाया जा सके। दोनों ने रियल एस्टेट में भी अवसर तलाशे, लेकिन बात नहीं बनी।

90 के दशक में यूपी में लोकप्रिय डेयरी कंपनी ज्ञान (Gyan Dairy success story) भारी वित्तीय संकट से गुजर रही थी और उसके मालिक साझेदार की तलाश में थे। जय ने अपने परिवार को इस बिजनेस से जुड़ने की इच्छा बताई और डेयरी बिजनेस में हाथ डालने का निर्णय लिया। ऐसे बिजनेस में उतरने का साहस दिखाया, जिसके बारे में उन्हें कोई ज्ञान, अनुभव या विशेषज्ञता नहीं थी।

पहला झटका और पारिवारिक बिजनेस में वापसी

बिजनेस की दुनिया में कदम रखने वाले जय अग्रवाल को महज 12 महीने में ही भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा। कर्जदाताओं और बैंकों के भारी दबाव के कारण उनका धंधा पूरी तरह ठप हो गया। इस असफलता से सबक लेकर जय वापस अपने पारिवारिक तंबाकू व्यवसाय में लौट आए। एक साल बाद, दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज से ग्रेजुएशन पूरी करके उनके छोटे भाई अनुज अग्रवाल भी उनके साथ बिजनेस में शामिल हो गए। 2004 के आसपास, लोकल तंबाकू कंपनियों ने कम दाम में माल बेचकर उनके पारिवारिक बिजनेस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी। इस समस्या से निपटने के लिए दोनों भाइयों ने कई नए उत्पाद लॉन्च किए और अपना रिटेल नेटवर्क बढ़ाकर स्थिति को संभाला।

ज्ञान डेयरी का अधिग्रहण और परिवार का साथ

इसी बीच ज्ञान डेयरी की माली हालत लगातार बिगड़ रही थी और कंपनी अपने कर्ज चुकाने में असमर्थ थी। इसे देखते हुए जय और अनुज ने ज्ञान डेयरी को खरीद लिया। 2003 की पिछली असफलता को देखते हुए उनके पिता ने इस नए प्रोजेक्ट के लिए फंड देने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि, उनके दादा ने दोनों पोतों का पक्ष लिया और परिवार को इस शर्त पर राजी किया कि अगर यह प्रोजेक्ट भी फेल होता है, तो दोनों वापस अपने पुराने काम में लौटेंगे और कोई नया प्रयोग नहीं करेंगे। परिवार के इस भारी समर्थन से आत्मविश्वास से लबरेज होकर दोनों भाइयों ने 2007 में ज्ञान डेयरी की कमान संभाली। उन्होंने 'B2B' (बिजनेस टू बिजनेस) मॉडल अपनाते हुए मिल्क पाउडर बनाना शुरू किया और दूसरी कंपनियों को आपूर्ति कर अच्छी कमाई की।

2008 की वैश्विक मंदी और B2C मॉडल का फेल होना

2008 में जब लेहमैन ब्रदर्स के पतन से दुनियाभर में मंदी आई, तो इसका असर कंपनियों पर भी पड़ा। इसे देखते हुए जय ने 'B2C' (बिजनेस टू कंज्यूमर) मॉडल की तरफ जाने का फैसला किया। कंपनी ने सीधे ग्राहकों के लिए डेयरी वाइटनर और घी लॉन्च किया और इसकी मार्केटिंग में भारी पैसा लगाया। लेकिन लोगों ने डेयरी वाइटनर को खास तवज्जो नहीं दी और यह प्लान फ्लॉप हो गया। राहत की बात यह रही कि दोनों भाइयों ने अपना B2B काम जारी रखा था, जिससे पैसों का प्रवाह बना रहा।

2011 का अवसर और एक और निराशा

2011 में देश की दो बड़ी डेयरी कंपनियां लखनऊ में अपना प्लांट लगाने की योजना बना रही थीं। अग्रवाल भाइयों को इसमें एक बड़ा मौका दिखा और उन्होंने लिक्विड दूध प्रोसेस करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश कर दिया। लेकिन ऐन मौके पर दोनों कंपनियों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए। चूंकि भारी निवेश हो चुका था, इसलिए दोनों भाइयों ने इसे व्यर्थ नहीं जाने देने की ठानी।

20 रुपये का दूध 40 में और पूर्वी यूपी का मास्टरस्ट्रोक

अपने निवेश को बचाने के लिए कंपनी ने फ्रेश मिल्क पैक लॉन्च करके सीधे ग्राहकों तक पहुंचने का फैसला किया। उस समय अन्य डेयरी कंपनियां पश्चिमी यूपी से दूध खरीदती थीं, लेकिन ज्ञान डेयरी ने पूर्वी यूपी का रुख किया, जो बड़ी कंपनियों की नजरों से दूर था।
अनुज अग्रवाल ने बताया था कि उन्होंने किसानों को 20 रुपये की जगह 40 रुपये प्रति लीटर का भाव दिया। शुरुआत में किसानों को यह बहुत अच्छा लगा, लेकिन एक महीने बाद जब पेमेंट का दिन आया, तो किसानों को लगा कि कंपनी वाले पैसे दिए बिना भाग जाएंगे। डर के मारे उन्होंने गांव के सारे रास्ते बंद कर दिए। लेकिन जब उसी दिन पूरा पेमेंट चुका दिया गया, तो किसानों का भरोसा जीत लिया गया। यहीं से बिजनेस ने रफ्तार पकड़ी और बाद में कंपनी ने पैकेज्ड दही भी लॉन्च कर दिया।

100 करोड़ से 1500 करोड़ रुपये का सफर

2015 तक कंपनी के साथ 5,000 किसान जुड़ चुके थे और कंपनी उन्हें उनके पशुओं के लिए अच्छी क्वालिटी का चारा भी देने लगी थी। दूध का कलेक्शन तेजी से बढ़ा और बिक्री 100 करोड़ रुपये के पार पहुंच गई। क्वालिटी से कोई समझौता न हो, इसके लिए जय अग्रवाल खुद कलेक्शन सेंटरों पर दूध की टेस्टिंग करते थे।

2018 तक कंपनी की सेल बढ़कर 564.54 करोड़ रुपये हो गई। साल 2020 आते-आते ज्ञान डेयरी ने एक विशाल रूप ले लिया था 3,000 गांवों के 1,50,000 किसान इसके साथ जुड़ चुके थे और कंपनी की कुल सेल 901.23 करोड़ रुपये के पार पहुंच गई थी। कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, साल 2023 में उसका सालाना टर्नओवर 1,500 करोड़ रुपये से अधिक था। आज ज्ञान डेयरी के पास हजारों रिटेल स्टोर और 50 से ज्यादा आउटलेट्स का मजबूत नेटवर्क है।

इसके साथ ही कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, उसकी दूध प्रोसेसिंग क्षमता 17.5 लाख लीटर प्रतिदिन है। यह प्रोसेसिंग की क्षमता है, रोजाना वास्तव में बेचे जाने वाले दूध की मात्रा नहीं। कंपनी उत्तर प्रदेश में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के साथ ग्राहकों तक सीधे पहुंचने पर भी काम कर रही है।

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