लंदन। चालू साल की अप्रैल माह में सोने के कीमतों में आई गिरावट के बाद भी महंगाई बड़े पैमाने पर रही। उम्मीद थी कि निरंकुश महंगाई के दौर में सोने की कीमतों में बढ़ोत्तरी की संभावना बढ़ेगी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इसके पीछे विचार यह है कि रिकार्ड-कम ब्याज से पेपर करंसी के मूल्य में कमी आई जिससे कि महंगाई बढ़ती गई।

बढ़ती महंगाई के बीच सोने की गिरती कीमत वित्तीय संकट के कारण हैं। अर्थव्यवस्था से लेकर लोगों के बीच फैशन में सोने की ललक आज भी बरकरार है, इसके बावजूद सोने कीमतों में साल की शुरुआत के बाद से लगभग 20 प्रतिशत गिरावट है और 15 से अधिक सालों में सोना सबसे बड़ी तिमाही गिरावट के लिए रास्ते पर है।

यूरोपीय सेंट्रल बैंक और रॉयल बैंक ऑस्ट्रेलिया ने ब्याज दरों में कटौती की है, जबकि हाल के महीनों में बैंक ऑफ जापान द्वारा प्रोत्साहन कार्यक्रम का चलाया गया।

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने संकेत दिया है कि जल्द ही मात्रात्मक सहजता कार्यक्रम का अंत होने वाला हो सकता है। इसके बावजूद फेडरल रिजर्व में 85 बिलियन डालर का सहयोग अभी भी गिरवी समर्थित प्रतिभूतियों के लिए दिया है। मुद्रास्फीति का दबाव लगातार बना रहा। वहीं पिछले कुछ वर्षो के मुकाबले इस बार जापान व यूरोप और वॉल स्ट्रीट के शेयर बाजारों में अधिक तेजी देखी गई। क्रेडिट सुइस के विश्लेषक टॉम केंडल के मुताबिक मुद्रास्फिति में आई बदलाव से चिंता की कोई वजह नहीं है। यह एक अवसर की तरह लें।

उन्होंने कहा कि विकसित देशों में मुद्रास्फीति का कोई डर नहीं है। पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्रीय बैंकों द्वारा इक्विटी बाजार में सीधे ही बढ़ रही है। माना जाता है सोना मुद्रास्फीति बचाव के रूप में मान्यता प्राप्त है। हालांकि सभी विश्लेषक इसकी क्षमता पर सहमत नहीं है। रॉयटर्स डेटा से पता चलता है कि सोने का एक औंस वर्तमान में तेल की 14.8 बैरल खरीदता है जो लगभग 1960 में 15 के आसपास था। इन वित्तीय संकट 2007 के समय प्रमुख सरकारों द्वारा अपनाई प्रोत्साहन उपायों को देखा गया। मित्सुई प्रेशस मेटल विश्लेषक डेविड जॉली ने कहा कि आज कोई संकेत नहीं हैं कि सतत मुद्रास्फीति क्षितिज पर है।

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