नई दिल्ली, पीटीआइ। भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर चालू वित्त वर्ष में पांच फीसद से भी कम रह सकती है। आईएचएस मार्किट के एक हालिया सर्वेक्षण में इस बात की आशंका जतायी गई है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन के लिए उठाये गए कदमों का असर दिखने में अभी वक्त लगेगा। मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट में कमी की वजह से जुलाई-सितंबर तिमाही में देश की जीडीपी वृद्धि की रफ्तार घटकर 4.5 फीसद रह गई। इस फाइनेंशियल इयर के पहले वित्त वर्ष में जीडीपी वृद्धि की रफ्तार पांच फीसद थी जबकि 2018 की सितंबर तिमाही में देश की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार सात फीसद पर रही थी।

बैंकों पर एनपीए का भार अधिक

आईएचएस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ''सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर एनपीए का भार अधिक है। इससे उनके कर्ज देने की शक्ति पर असर पड़ रहा है।'' रिपोर्ट में कहा गया है कि इकोनॉमी के कमजोर होने के कारण भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार प्रभावित होती रहेगी। उल्लेखनीय है कि चालू वित्त वर्ष के दूसरी तिमाही में देश की जीडीपी वृद्धि की रफ्तार घटकर छह साल के निचले स्तर पर आ गई है। जुलाई-सितंबर में देश की जीडीपी की रफ्तार 4.5 फीसद रह गई। वहीं, इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून के दौरान देश की आर्थिक विकास की रफ्तार पांच फीसद रही थी।   

एनबीएफसी भी चिंता के सबब

इस रपट में नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) को लेकर भी बात की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि एनबीएफसी कंपनियों का असर भी देश के वाणिज्यिक बैंकों के बही खाते पर पड़ सकता है। उसने आगाह करते हुए कहा कि यह कर्ज के विस्तार पर और विपरीत असर डालेगा। रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी बैंकों के एनपीए के उच्च स्तर के कारण नया कर्ज देने में दिक्कत आएगी।

इस रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 4.5 फीसद रही। इसका प्रभाव पूरे वित्त वर्ष की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर पर देखने को मिल सकता है। चालू वित्त वर्ष में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि की रफ्तार पांच फीसद से कुछ नीचे रहने की आशंका है।’’

गौरतलब है कि देश के केंद्रीय बैंक ने भी 2019-20 में देश की आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान को 6.1 फीसद से घटाकर पांच फीसद करने का ऐलान हाल में किया है।

Posted By: Ankit Kumar

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